नीरज चोपड़ा का संदेश: सोशल मीडिया पर देश के लिए प्रेम दिखाकर क्या होगा?
- इतने पदक पहली बार आए, इससे यह बात तो पक्की है कि देश में सुधर रहा है खेलों का स्तर
- देश में युवा साथी नए संकट के शिकार हैं, सोशल मीडिया को बहुत ज्यादा गंभीरता से लेते हैं
- कई एथलीट पदक के बेहद पास आकर चूके, महिला हॉकी ने भी खुद को साबित किया
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सोशल मीडिया पर देश के लिए प्रेम दिखाकर क्या हासिल होगा? अपने काम से देश-प्रेम दिखाइए। आप कोई छोटे से छोटा काम कर रहे हों, उसमें देश के लिए सोचिए। सोशल मीडिया नकली दुनिया है, इसके लाइक-फॉलो से खुद को मत आंकिए।
क्यो ओलंपिक में अतुल्य भारत का प्रदर्शन उत्सव सरीखा है। इतने पदक पहली बार आए, इससे यह बात तो पक्की है कि देश में खेलों का स्तर सुधर रहा है। कई एथलीट पदक के बेहद पास आकर चूके। हॉकी में टीम इंडिया ने फिर चमत्कार दिखाया, चार दशक बाद पदक भी जीता। महिला हॉकी ने भी खुद को साबित किया। हमारे एथलीट केवल ओलंपिक खेलने नहीं, पदक जीतने का जज्बा रखते हुए ट्रेनिंग करते हैं। उनकी सोच विश्व के किसी भी देश के एथलीटों जैसी है। हमें भी ऐसा ही करना पड़ेगा, तभी तो आगे बढ़ेंगे।
लेकिन, देश में युवा साथी नए संकट के शिकार हैं, सोशल मीडिया को बहुत ज्यादा गंभीरता से लेते हैं। कुछ भी पोस्ट करते हैं, फिर सारा ध्यान इसी पर रहता है कि कितने लोगों ने उसे देखा, पसंद किया? स्टेटस पर ज्यादा लाइक और कमेंट्स आ जाएं, तो सोचने लगते हैं कि जिंदगी गुलजार है। चाहे वास्तविक जीवन में कुछ नहीं कर रहे हों। यह बेहद खतरनाक है, इस पर गंभीरता से सोचने की जरूरत है। सोशल मीडिया जिंदगी नहीं है, न महज सोशल मीडिया से जिंदगी है। यह एक नकली दुनिया है।
सोशल मीडिया पर देश के लिए प्रेम दिखाकर क्या हासिल होगा? अपने काम से देश-प्रेम दिखाइए। आप चाहे कोई छोटे से छोटा काम कर रहे हों, उसमें देश के लिए सोचिए। अपने आसपास साफ-सफाई रखकर भी देश केलिए योगदान दे सकते हैं। कुछ भी खा-पीकर जब यहां-वहां कचरा फेंक देते हैं, क्या यह देश का भला करना होगा? सोशल मीडिया के लाइक-फॉलो से खुद को मत आंकिए। अपने काम से देश-प्रेम प्रकट कीजिए, नकली दुनिया का प्रेम खतरनाक है। मोबाइल फोन, बाइक, गाड़ी की अहमियत, पढ़ाई या जीवन के लक्ष्य से कम ही रहेगी।
मजे लो और बस! यह सोच सही नहीं
कामयाबी का मंत्र...दिल से काम करें तो संघर्ष, समस्या, मुश्किलें महसूस नहीं होते
जो काम आपको पसंद है, आप जब दिल से उसे करते हैं, तो महसूस होता है कि आप इसी के लिए बने हैं। जब मैंने जेवलिन शुरू किया था, तो मुझे नहीं पता था कि मैं इस स्तर तक खेलूंगा, लेकिन उसकी ट्रेनिंग करके मुझे सुकून मिलता था, मजा आता था। मेरा परिवार बेहद साधारण था। ट्रेनिंग के दौरान स्टेडियम के लिए बस से जाता था। बस के लिए गांव में एक घंटे इंतजार करता। वहां से पानीपत जाता, जहां बस स्टैंड पर उतरने के बाद दो किमी पैदल चलकर स्टेडियम पहुंचता। फिर इंतजार करता ताकि मेरे सीनियर एथलीट आएं, तो उनके साथ ट्रेनिंग कर सकूं।
ट्रेनिंग खत्म होने के बाद वापस जाने के लिए भी संघर्ष करना होता था। शाम सात बजे आखिरी बस होती थी, वो निकल जाती थी तो लिफ्ट लेकर लौटना पड़ता था। लेकिन यह सब करके भी बहुत मजा आ रहा था। दिमाग में एक बार भी यह ख्याल नहीं आता था कि इतना कुछ चल रहा है या मैं तंग हो रहा हूं। बस, जेवलिन थ्रो करने में मजा आ रहा था, उसके लिए मैं जिंदगी को इंजॉय कर रहा था। समस्याएं कम नहीं थीं, आर्थिक रूप से कमजोर घर से था। लंबा मुश्किल सफर करके जब स्टेडियम जाता था, तो यह भी सोच सकता था कि इतना तंग क्यों हो रहा हूं? घर पर भी तो आराम से बैठ सकता हूं। मेरे पास विकल्प था। लेकिन, जो कर रहा था, उससे प्यार था। मुझे लगता है कि युवा आरामतलब न हों, उससे बाहर निकलें, तब ही आप एक स्तर तक पहुंच सकते हैं।
मेहनत ही आराम, ट्रेनिंग से खुशी, यही दिलाते हैं निराशा से मुक्ति
निराशा से छुटकारा पाना हमारे अपने हाथ में है। आप चीजों को कैसे ले रहे हैं, दिमाग में उनके बारे में क्या महसूस करते हैं? अपना तनाव दूर करने के लिए अपने काम को दिल से करता हूं। ट्रेनिंग करके खुश रहता हूं। लगता है कि जिंदगी निर्बाध और अच्छी चल रही है। मेहनत और अपनी ट्रेनिंग से मुझे सकारात्मक ऊर्जा मिलती है और मैं खुश रहता हूं।
भारतीय सेना सर्वश्रेष्ठ, लेकिन मैं अपने फौजी भाइयों से बहुत नीचे हूं
भारतीय सेना को मैं हमेशा से पसंद करता था, ये दुनिया की सबसे अच्छी फौज है। बॉर्डर और कारगिल जैसी फिल्में देखते थे, तो फौजियों जैसा जज्बा आ जाता था। आज फौज में हूं, तो जज्बे के मायने समझ सकता हूं। देखता हूं कि परिवार से दूर रहते हुए फौजी सुबह जल्दी उठकर अपने काम खुद करते हैं, मेहनत करते हैं, खतरनाक कहे जाने वाले माहौल में भी खुश रहते हैं। बहुत शानदार योद्धा हैं। 2016 में मैंने विश्व जूनियर खेला था, उसके बाद सेना से जुड़ा।
लेकिन, मैं अपने फौजी भाइयों से बहुत नीचे हूं। अनुशासन व प्रशिक्षण में वे मुझसे बहुत ऊपर है। हालांकि, सेना ने मुझे बोल रखा है कि जैसे फौजी देश के लिए लड़ता है, खिलाड़ी भी देश के लिए खेलता है, दोनों अपनी जगह देश का नाम ऊंचा करते हैं। मुझे फौजी भाइयों से अभी बहुत कुछ सीखना है।
कामयाबी के पीछे कई लोग
हर कामयाबी के पीछे कई लोग होते हैं। ओलंपिक में भारत के प्रदर्शन के पीछे देश एकाकार होकर खड़ा था। मैं भी जब लौटकर घर पहुंचा और मां की आंखों में आंसू देखे, तो उनके त्याग को समझ पाया। हमें छोटी उम्र में घर से दूर भेजना उनके लिए कितना मुश्किल रहा होगा?
वे जब भावुक हो गईं और मैंने उनके गले में पदक पहना दिया, तो उसकी सार्थकता दिखी। याद भी नहीं कि वो क्या-क्या बोल रहीं थीं, इमोशंस ही ऐसे थे। शायद ‘अच्छा किया बेटा’ कहा था उन्होंने। दोस्तों से बात हुई, तो उन्होंने कहा, मैंने उनका सपना पूरा किया है।....और देश कह रहा है, मैंने देश का सपना पूरा किया है।