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लोकसभा में उठी न्यायपालिका में आरक्षण व्यवस्था में संविधान संशोधन की मांग

Thu, 04 Aug 2016 11:20 PM IST
ब्यूरो/ अमर उजाला, नई दिल्ली
ब्यूरो/ अमर उजाला, नई दिल्ली Updated Thu, 04 Aug 2016 11:20 PM IST
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 in the Parliament sought to amend the Constitution in the judiciary system of  cast reservation
लोक सभा - फोटो : fjfjhhg

लोकसभा में गुरूवार को उच्च न्यायपालिका में जवाबदेही-पारदर्शिता लाने, दलित-आदिवासी वर्ग का प्रतिनिधित्व सुनिश्चित करने के लिए आरक्षण की व्यवस्था लागू करने की मांग उठी।

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सदस्यों ने दलितों-आदिवासियों को कई मौकों पर न्याय न मिलने और अदालतों के खुद ही गेंदबाज, बल्लेबाज और अंपायर की भूमिका निभाने का आरोप लगाया।

सरकार ने जवाब में राष्टीय न्यायिक नियुक्ति आयोग के गठन की संभावना सुप्रीम कोर्ट द्वारा निरस्त किए जाने का हवाला देते हुए कहा कि इसका उद‍्देश्य ही जवाबदेही लाने के साथ सभी वर्गों की भागीदारी बढ़ाने का था।
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हालांकि विपक्षी सदस्यों ने सरकार से इस मामले में संविधान संशोधन करने की मांग करते हुए कहा कि महज सलाह और भाषण से स्थिति में बदलाव नहीं आने वाला।

भाजपा के अनुराग ठाकुर ने कहा कि अदालतों में करोड़ों की संख्या में मुकदमे लंबित हैं। अदालतें एक साथ गेंदबाज, बल्लेबाज और अंपायर की भूमिका निभा रही हैं।
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जब तक जवाबदेही और पारदर्शिता तय नहीं होगी, तब तक स्थिति में बदलाव नहीं होगा। सांसद नागेंद्र प्रधान और संतोख चौधरी ने कहा कि उच्च न्यायपालिका में दलित-आदिवासी वर्ग के जजों की संख्या लगभग नगय होने के कारण यह बड़ा वर्ग कई बार न्याय से वंचित रह जाता है।


इन सांसदों ने कहा कि सरकार को सुझाव देने और भाषण की जगह आरक्षण का रास्ता साफ करने केलिए संविधान में संशोधन करना चाहिए। 

इसके जवाब में कानून मंत्री रविशंकर प्रसाद ने कहा कि बतौर मंत्री उन्होंने कई बार सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट को पत्र लिख कर दलित, आदिवासी और पिछड़ों की भागीदारी बढ़ाने की अपील की है।

प्रसाद ने कहा कि स्थिति में बदलाव लाने के लिए इसी सदन ने सर्वसम्मति से राष्टीय न्यायिक नियुक्ति आयोग बिल को मंजूरी दी थी।

इसमें चयन समिति में अनुसूचित जाति वर्ग के एक सदस्य का रखा जाना अनिवार्य किया गया था। मगर सुप्रीम कोर्ट ने इसे निरस्त कर दिया। 

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