सुप्रीम कोर्ट की अहम टिप्पणी, पूर्व में व्यक्त विचार किसी समिति की सदस्यता में बाधक नहीं
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सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को एक मामले की सुनवाई करते हुए अहम टिप्पणी की कि किसी व्यक्ति द्वारा पूर्व में व्यक्त किए गए विचारों का यह मतलब नहीं है कि उसे उस मुद्दे से जुड़ी समिति में नियुक्त नहीं किया जा सकता है, क्योंकि विचार बदल भी सकते हैं।
सुप्रीम कोर्ट की इस टिप्पणी का इसलिए महत्व है कि नए कृषि कानूनों पर किसानों और केंद्र के बीच जारी गतिरोध का समाधान करने के लिए हाल में गठित समिति के कुछ सदस्य पहले इस विषय पर अपने विचार व्यक्त कर चुके थे।भारतीय किसान यूनियन के राष्ट्रीय अध्यक्ष और समिति के सदस्य भूपेन्द्र सिंह मान ने पिछले हफ्ते कहा था कि वह चार सदस्यीय समिति से खुद को अलग कर रहे हैं।
बहरहाल एक अन्य मामले की सुनवाई कर रही प्रधान न्यायाधीश एस. ए. बोबडे की पीठ ने कहा, ‘‘एक समिति गठित की गई है और अगर व्यक्ति ने मुद्दे पर पहले अपने विचार व्यक्त किए हैं तो इसका यह मतलब नहीं है कि वह व्यक्ति समिति में नहीं रह सकता है।’’
पीठ ने कहा, ‘‘समिति गठित करने के बारे में समझ की अजीब कमी है।’’ पीठ में न्यायमूर्ति एल. नागेश्वर राव और न्यायमूर्ति विनीत शरण भी थे, जो आपराधिक मामलों की सुनवाई में खामियों से जुड़ी याचिका पर गौर कर रहे थे। पीठ ने कहा कि समिति का सदस्य बनने से पहले किसी व्यक्ति का किसी मुद्दे पर कुछ विचार हो सकता है लेकिन विचार बदल सकते हैं।
उच्चतम न्यायालय ने 12 जनवरी को एक अंतरिम आदेश में नए कृषि कानूनों के कार्यान्वयन पर अगले आदेश तक रोक लगा दी थी और शिकायतों पर सुनवाई करने तथा गतिरोध समाप्त करने के लिए अनुशंसा करने की खातिर चार सदस्यीय एक समिति का गठन किया था। तीनों कृषि कानूनों के खिलाफ पंजाब, हरियाणा और पश्चिमी उत्तरप्रदेश सहित देश के अलग-अलग हिस्से के किसान दिल्ली की विभिन्न सीमाओं पर एक महीने से अधिक समय से प्रदर्शन कर रहे हैं।
निजी राय अलग रखेंगे : समिति के सदस्य
कृषि कानूनों को लेकर 'सरकार समर्थक' राय व्यक्त करने के लिए प्रदर्शनकारी किसानों के हमले का सामना कर रहे उच्चतम न्यायालय द्वारा गठित समिति के सदस्यों ने मंगलवार को कहा कि वे विभिन्न हितधारकों से चर्चा के दौरान अपनी विचारधारा एवं रुख को अलग रखेंगे।
मामले को सुलझाने के लिए शीर्ष अदालत द्वारा गठित समिति के सदस्यों ने इसके बावजूद संकेत दिया कि इन कानूनों को पूरी तरह से रद्द करना लंबे समय में जरूरी कृषि सुधार के लिए उचित नहीं होगा।
समिति के अहम सदस्य एवं महाराष्ट्र में सक्रिय शेतकारी संगठन के अध्यक्ष अनिल घनवट ने कहा कि कृषि क्षेत्र में सुधार की बहुत जरूरत है और कोई भी राजनीतिक पार्टी अगले 50 साल में इसकी कोशिश नहीं करेगी अगर इन कानूनों को वापस लिया जाता है।
हालांकि, इसके साथ ही घनवट ने कहा कि समिति कानून का विरोध करने वाले और समर्थन करने वाले सहित सभी किसानों की सुनेगी और उस के अनुरूप रिपोर्ट तैयार शीर्ष अदालत में जमा करेगी।
70 साल से लागू कानून किसानों के हित में नहीं
उन्होंने कहा कि पिछले 70 साल से लागू कानून किसानों के हित में नहीं थे और करीब 4.5 लाख किसानों ने आत्महत्या की। उन्होंने कहा कि किसान गरीब हो रहे हैं और कर्ज में डूब रहे हैं। कुछ बदलाव करने की जरूरत है। वे बदलाव हो रहे हैं लेकिन विरोध शुरू हो गया है।
यहां हुई समिति की पहली बैठक के बाद घनवट ने कहा कि किसानों और अन्य हितधारकों के साथ पहली बैठक बृहस्पतिवार को प्रस्तावित है। उन्होंने कहा कि समिति की सबसे बड़ी चुनौती प्रदर्शनकारी किसानों को हमसे बातचीत के लिए तैयार करने की होगी।
घनवट ने कहा कि इसके बावजूद उन्हें प्राथमिकता दी जायेगी क्योंकि समिति लंबे समय से जारी प्रदर्शन को यथाशीघ्र खत्म कराना चाहती है। कृषि अर्थशास्त्री अशोक गुलाटी और प्रमोद कुमार जोशी समिति के अन्य दो सदस्य हैं जो पहली बैठक में शामिल हुए।
बुधवार को 10वें दौर की वार्ता
उल्लेखनीय है कि उच्चतम न्यायालय ने 11 जनवरी को चार सदस्यीय समिति का गठन किया था लेकिन प्रदर्शनकारी किसानों ने नियुक्त सदस्यों द्वारा पूर्व में कृषि कानूनों को लेकर रखी गई राय पर सवाल उठाए। इसके बाद एक सदस्य भूपिंदर सिंह मान ने खुद को इससे अलग कर लिया है।
केंद्र सरकार और प्रदर्शन कर रहे किसान संगठनों के प्रतिनिधियों के बीच भी नौ दौर की अलग से बात हुई थी लेकिन मुद्दे को सुलझाने की यह पहल बेनतीजा रही अब 10वें दौर की वार्ता बुधवार को प्रस्तावित है।
बता दें कि दिल्ली की सीमा पर हजारों की संख्या में किसान करीब दो महीने से नए कृषि कानूनों के खिलाफ प्रदर्शन कर रहे हैं जिन्हें सितंबर में लागू किया गया है। प्रदर्शनकारी किसानों का आरोप है कि इन कानूनों से मंडी व्यवस्था और न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) पर खरीद की प्रणाली समाप्त हो जाएगी और किसानों को बड़े उद्योग घरानों की 'कृपा' पर रहना पड़ेगा। हालांकि, सरकार इन आशंकाओं को खारिज कर चुकी है।
21 जनवरी को समिति सदस्यों के साथ होगी किसानों की बैठक
समिति की पहली बैठक के बाद मीडिया को जानकारी देते हुए घनवट ने बताया कि आज की बैठक में हमने 21 जनवरी सुबह 11 बजे किसानों और सभी हितधारकों के साथ बैठक करने का फैसला किया। हम यह बैठक आमने-सामने और डिजिटल दोनों माध्यम से किसानों की सुविधा अनुसार करेंगे।
उन्होंने बताया कि किसानों, केंद्र और राज्य सरकारों के अलावा समिति किसान संगठनों और अन्य हितधारकों जैसे कृषि उत्पाद निर्यातक, व्यापारी, मिल मालिक, डेयरी और पॉल्ट्री उद्योग से भी इन कृषि कानूनों पर उनकी राय लेगी। घनवट ने कहा कि सुझावों को आमंत्रित करने के लिए जल्द वेबसाइट लांच की जाएगी।
घनवट ने कहा कि सबसे बड़ी चुनौती प्रदर्शनकारी किसानों को बातचीत के लिए आने और हमसे बात करने के लिए मनाने की है। हम उनसे बात करने के लिए हर संभव प्रयास करेंगे। उन्होंने कहा कि अभी तक स्पष्ट नहीं है कि प्रदर्शनकारी किसानों के वार्ता के लिए हमारे पास नहीं आने पर क्या उच्चतम न्यायालय द्वारा गठित समिति प्रदर्शन स्थल पर जाकर वार्ता करेगी लेकिन समिति के सदस्य उनसे बात करने को इच्छुक हैं और उन्हें राजी करने की कोशिश करेंगे।
आरोपों पर क्या बोले समिति सदस्य
प्रदर्शन कर रहे किसान संगठनों और विपक्षी पार्टियों द्वारा सदस्यों के सरकार समर्थक होने के आरोपों पर घनवट ने कहा कि यह उनकी राय है। हमारी कोई भी विचारधारा हो, लेकिन अब हम उच्चतम न्यायालय द्वारा गठित समिति के सदस्य हैं। हम एकतरफा नहीं हैं।
उन्होंने कहा कि समिति के सदस्य उच्चतम न्यायालय में जमा करने के लिए रिपोर्ट तैयार करने के दौरान कृषि कानून पर अपनी निजी राय अलग रखेंगे। यह हमारा कर्तव्य है कि हम दोनों पक्षों को सुने और अपनी विचारधारा नहीं थोपे।
मान के स्थान पर किसी अन्य को समिति में शामिल करने के सवाल पर उन्होंने कहा कि इसका गठन उच्चतम न्यायालय ने किया है और शीर्ष अदालत ही तय करेगी कि किसे नियुक्त करना है। गुलाटी ने कहा कि समिति में सभी सदस्य बराबर हैं और उन्होंने समिति का अध्यक्ष नियुक्त करने की संभावना को खारिज कर दिया।
जब अदालत जिम्मेदारी देती है तो...
जोशी ने कहा कि हमारी राय अलग हो सकती है लेकिन जब इस तरह की जिम्मेदारी अदालत देती है तो हमें निष्पक्ष और पारदर्शी तरीके से काम करना होता है। रिपोर्ट में हम अपनी राय नहीं देंगे यह बहुत स्पष्ट है। उन्होंने कहा कि समिति को उम्मीद है कि वह शीर्ष अदालत के निर्देश के अनुरूप दो महीने में रिपोर्ट तैयार कर लेगी।
घनवट ने कहा कि हमें जिम्मेदारी दी गई है और हम उसका ठीक से निर्वहन कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि समिति के समक्ष आने को अनिच्छुक उन प्रदर्शनकारी किसानों से हम कहना चाहते हैं कि न तो हम किसी के पक्ष में है और न ही सरकार की ओर से हैं। हम सभी उच्चतम न्यायालय की ओर से हैं।