CIC Controversy: इमामों के वेतन पर बयान को लेकर घिरे CIC माहुरकर, वकील ने मांगी अवमानना केस की इजाजत
वकील तपन कुमार देव ने एजी के समक्ष याचिका में सीआईसी के लिए कहा है कि ' कथित अवमाननाकर्ता, कानून की बारीकियों को समझने के लिए लॉ ग्रेजुएट भी नहीं है। उन्होंने सुप्रीम कोर्ट द्वारा पारित निर्णय को संविधान का उल्लंघन और गलत मिसाल कायम करने वाला बताया है।
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मस्जिदों के इमामों को वेतन देने के सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर टिप्पणी को लेकर देश के सूचना आयुक्त (CIC) उदय माहुरकर की मुश्किलें बढ़ सकती हैं। सुप्रीम कोर्ट के एक वकील ने माहुरकर के खिलाफ आपराधिक अवमानना की कार्यवाही शुरू करने की मांग की है। इसके लिए वकील ने अटॉर्नी जनरल Attorney General की सहमति के लिए उनके समक्ष याचिका दायर की है।
वकील तपन कुमार देव ने एजी के समक्ष याचिका में सीआईसी के लिए कहा है कि ' कथित अवमाननाकर्ता, कानून की बारीकियों को समझने के लिए लॉ ग्रेजुएट भी नहीं है। उन्होंने सुप्रीम कोर्ट द्वारा पारित निर्णय को संविधान का उल्लंघन और गलत मिसाल कायम करने वाला बताया है।
UPDATE : A Supreme Court lawyer files a petition before the Attorney General seeking consent to initiate criminal contempt proceedings against CIC Uday Mahurkar over his comments against the Supreme Court judgment.
विज्ञापन विज्ञापन— Live Law (@LiveLawIndia) November 29, 2022
सुप्रीम कोर्ट ने 1993 में अखिल भारतीय इमाम संगठन के अध्यक्ष मौलाना जमील इलियासी की याचिका पर दिल्ली वक्फ बोर्ड को उसके अधीन संचालित मस्जिदों के इमामों को वेतन देने का निर्देश दिया था। दिल्ली की तरह ही हरियाणा और कर्नाटक समेत कुछ अन्य राज्यों में मस्जिदों के इमाम को वक्फ बोर्ड वेतन देता है।
बता दें, केंद्रीय सूचना आयुक्त उदय माहुरकर ने बीते दिनों एक आरटीआई कार्यकर्ता सुभाष अग्रवाल की ओर से दाखिल आवेदन पर सुनवाई के बाद इमामों के वेतन के सुप्रीम कोर्ट के फैसले को असंवैधानिक बताया था। उन्होंने कहा था कि करदाताओं के पैसे का इस्तेमाल किसी एक धर्म को बढ़ावा देने के लिए नहीं किया जा सकता। माहुरकर ने अपने आदेश की प्रति केंद्रीय कानून मंत्री को भेजने का निर्देश दिया, ताकि संविधान के अनुच्छेद 25 से 28 तक का सही अर्थों में पालन सुनिश्चित हो सके।
सूचना आयुक्त माहुरकर ने आदेश में कहा, 13 मई,1993 को सुप्रीम कोर्ट के फैसले ने मस्जिदों के इमाम और मुअज्जिनों को सरकारी खजाने से वित्तीय लाभ पहुंचाने की राह खोल दी। आयोग का मानना है कि शीर्ष अदालत का फैसला संविधान के अनुच्छेद 27 का उल्लंघन था। केवल मस्जिदों के इमामों व अन्य लोगों को पारिश्रमिक देना, न केवल हिंदू समुदाय और अन्य गैर-मुस्लिम अल्पसंख्यक धर्मों के सदस्यों के साथ विश्वासघात है।
इमामों को 18 हजार पुजारी को दो हजार
सूचना आयुक्त माहुरकर ने कहा कि दिल्ली वक्फ बोर्ड को दिल्ली सरकार से लगभग 62 करोड़ रुपये का वार्षिक अनुदान मिलता है, जबकि स्वतंत्र स्रोतों से इसकी अपनी मासिक आय लगभग 30 लाख रुपये है। दिल्ली में वक्फ मस्जिदों के इमामों और मुअज्जिनों को 18 हजार रुपये और 16 हजार रुपये का मासिक मानदेय, वस्तुत: दिल्ली सरकार की ओर से करदाताओं के पैसे से दिया जा रहा है। इसके उलट एक हिंदू मंदिर के पुजारी को मंदिर को नियंत्रित करने वाले ट्रस्ट से प्रति माह सिर्फ 2000 रुपये मिल रहे हैं।