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समलैंगिक संबंधों को अपराध ठहराने के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट पहुंचे आईआईटी छात्र
एजेंसी, नई दिल्ली
Updated Wed, 16 May 2018 03:42 AM IST
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प्रतीकात्मक तस्वीर
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प्रतिष्ठित भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थानों (आईआईटी) के 20 पूर्व और वर्तमान छात्रों ने सुप्रीम कोर्ट में आईपीसी की धारा 377 को चुनौती दी है, जो एक ही लिंग के दो बालिगों को आपसी सहमति से अप्राकृतिक शारीरिक संबंध बनाने को अपराध ठहराती है।
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विभिन्न आयुवर्गों वाले इन याचिकाकर्ता छात्रों में वैज्ञानिक, अध्यापक, उद्यमी और शोधकर्ता शामिल हैं। इन समेत सभी पुरुष व महिला समलैंगिक और ट्रांसजेंडर्स (एलजीबीटी) का दावा रहा है कि यौन स्थिति का अपराधीकरण ‘शर्म की भावना, आत्म सम्मान को ठेस पहुंचने और कलंक लगने’ के परिणाम के तौर पर सामने आता है।
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इस याचिका को चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा की पीठ द्वारा सुने जाने की संभावना है, जो पहले ही 8 जनवरी को बहुत सारे प्रसिद्ध लोगों व गैर सरकारी संगठन नाज फाउंडेशन की तरफ से शीर्ष न्यायालय के वर्ष 2013 में दिए गए निर्णय के खिलाफ लगाई दर्जनों याचिकाओं को एक 5 जजों की संवैधानिक पीठ के हवाले कर चुके हैं। वर्ष 2013 के निर्णय में सुप्रीम कोर्ट ने व्यस्कों के बीच आपसी सहमति से बनाए गए समलैंगिक यौन संबंधों को फिर से आपराधिक घोषित कर दिया था।
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350 सदस्यों की एलजीबीटी एल्युमनी एसोसिएशन के सदस्य
सुप्रीम कोर्ट में लगाई गई वर्तमान याचिका सभी आईआईटी की एलजीबीटी एल्युमनी एसोसिएशन के प्रतिनिधि के तौर पर लगाई गई है, जिसके देश के सभी आईआईटी में 350 से ज्यादा सदस्य होने का दावा है। याचिकाकर्ताओं में आईआईटी दिल्ली का 19 वर्षीय छात्र सबसे कम उम्र का है तो वर्ष 1982 में आईआईटी से पास आउट हो चुके एक सदस्य सबसे ज्यादा उम्र के हैं।
सरकार से जवाब मांग चुका है शीर्ष न्यायालय
शीर्ष न्यायालय ने 23 अप्रैल को एक होटल के मालिक केशव सूरी की याचिका पर कानून एवं न्याय मंत्रालय, गृह मंत्रालय और स्वास्थ्य मंत्रालय से इस मामले पर उनकी प्रतिक्रिया मांगी थी। एक मई को भी सुप्रीम कोर्ट के सामने ट्रांसजेंडरों के अधिकारों के लिए लड़ने वाले कार्यकर्ता आरिफ जफर, अशोक राव कवि और मुंबई के एनजीओ हमसफर ट्रस्ट समेत कई अन्य की दो याचिकाएं इस मुद्दे पर दाखिल की गई थीं।
दिल्ली हाईकोर्ट कर चुका है वैध घोषित
दिल्ली हाईकोर्ट ने 2 जुलाई, 2009 को अपने एक निर्णय में होमोसेक्सुअल (समान लिंग में सेक्स) गतिविधियों को बालिगों की आपसी सहमति होने पर वैध घोषित किया था। हाईकोर्ट ने इसे गैरकानूनी ठहराने वाले 149 साल पुराने कानून को मूल अधिकारों का हनन बताया था।