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SC: महिला को सुप्रीम कोर्ट से राहत, पालतू कुत्ते के पड़ोसी को काटने से नहीं बन पा रही थीं जज, जानें पूरा मामला

Thu, 16 Nov 2023 07:09 AM IST
यशोधन शर्मा अमर उजाला ब्यूरो, नई दिल्ली
अमर उजाला ब्यूरो, नई दिल्ली Published by: यशोधन शर्मा Updated Thu, 16 Nov 2023 07:09 AM IST
सार

याचिकाकर्ता अपूर्वा पाठक को पहली बार 2017 में कुत्ते के काटने से संबंधित आपराधिक मामले का खुलासा नहीं करने के कारण नियुक्ति देने से इन्कार कर दिया गया था और दूसरी बार 2019 में 2017 में उनकी नियुक्ति की अस्वीकृति का खुलासा नहीं करने के कारण नियुक्ति नहीं दी गई।

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If woman dog bit her neighbour, she would not have been able to become a judge in Supreme Court
सुप्रीम कोर्ट - फोटो : ANI

विस्तार

सुप्रीम कोर्ट ने चयन प्रक्रिया में उत्तीर्ण होने के बावजूद मध्य प्रदेश सिविल जज (जूनियर डिवीजन) के पद पर दो बार नियुक्ति से वंचित रहने वाली महिला उम्मीदवार को बड़ी राहत दी। उनकी रिट याचिका पर सुनवाई करते हुए जस्टिस संजय किशन कौल और जस्टिस सुधांशु धूलिया की पीठ ने मध्य प्रदेश हाईकोर्ट की पूर्ण अदालत की ओर से लिए गए फैसले को रद्द कर दिया। पीठ ने कहा, हमारे मन में बिल्कुल भी संदेह नहीं है कि हाईकोर्ट का प्रशासनिक पक्ष से लिया गया फैसला भले ही नेक इरादे से लिया गया हो, लेकिन इससे याचिकाकर्ता के साथ गंभीर अन्याय हो रहा है।

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याचिकाकर्ता अपूर्वा पाठक को पहली बार 2017 में कुत्ते के काटने से संबंधित आपराधिक मामले का खुलासा नहीं करने के कारण नियुक्ति देने से इन्कार कर दिया गया था और दूसरी बार 2019 में 2017 में उनकी नियुक्ति की अस्वीकृति का खुलासा नहीं करने के कारण नियुक्ति नहीं दी गई। याचिकाकर्ता बीए एलएलबी में गोल्ड मेडलिस्ट है और उनके पास एलएलएम की डिग्री है। उनके कुत्ते ने पड़ोसी को काटा था जिसके बाद 2018 में प्राथमिकी दर्ज कराने के बाद उसे कठिन दौर का सामना करना पड़ा।
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हाईकोर्ट की आपत्तियां सही नहीं
याचिकाकर्ता के वकील नमित सक्सेना को सुनने के बाद पीठ ने कहा कि हाईकोर्ट की ओर से उठाई गई आपत्तियां सही नहीं हैं। पीठ ने कहा, याचिकाकर्ता के खिलाफ अपराध की प्रकृति भारतीय दंड संहिता(आईपीसी) के तहत अपने आप में एक बेहद छोटा अपराध है। इस अपराध का खुलासा न करने के कारण उसे पहले ही वर्ष 2017 के चयन के पहले दौर में काफी नुकसान उठाना पड़ा है। उसका चयन हुआ था, लेकिन उन्हें नियुक्ति नहीं दी गई थी और वह सुप्रीम कोर्ट तक में अपना केस हार गईं थीं।
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चयन की तिथि से वरिष्ठता क्रम से नियुक्ति देने का आदेश
सुप्रीम कोर्ट ने याची को उसके चयन की तिथि से योग्यता क्रम में वरिष्ठता के साथ नियुक्ति देने का निर्देश दिया है। पीठ ने अपने विस्तृत आदेश में कहा कि अगली चयन प्रक्रिया में उसी कारण से उन्हें दोबारा दंडित करना उचित नहीं है। पीठ ने कहा, सीधे शब्दों में कहें तो याचिकाकर्ता पर आईपीसी की धारा 289 के तहत अपराध का आरोप लगाया गया था, लेकिन उसे वर्ष 2018 में बरी कर दिया गया था। इस तथ्य का उसने वर्तमान चयन प्रक्रिया में खुलासा किया था, इस तथ्य को हाईकोर्ट ने स्वीकार किया है। इन परिस्थितियों में उनकी नियुक्ति को अस्वीकार करना सही नहीं है, जो उन्होंने अपनी योग्यता के आधार पर हासिल की है।

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