साक्षात्कार: ICMR कोरोना टास्कफोर्स के अध्यक्ष का दावा- 15 मई तक बनी रह सकती है तेजी, जल्द लगवाएं टीका
कोविड-19 नेशनल टास्क फोर्स (ऑपरेशनल रिसर्च ग्रुप), ICMR के अध्यक्ष डा. नरेन्द्र कुमार अरोड़ा मानते हैं कि कोरोना संक्रमण की रफ्तार अभी और तेज होगी और बेहतर यही है कि खुद को बचाने के लिए टीका जरूर लगवाया जाए। डॉ. अरोड़ा WHO जैसी तमाम अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं से जुड़े हैं। पेश है मौजूदा स्थितियों और कोविड के तमाम पहलुओं पर डॉ अरोड़ा से खास बातचीत....
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
विस्तार
सवाल- कोरोना की दूसरी लहर और इससे पैदा हो रही गंभीर स्थितियों के कब तक बने रहने की आशंका है?
मेरे विचार में अगले तीन-चार सप्ताह तक इसका प्रकोप रहेगा। 15 मई तक संक्रमण में लगातार तेजी बनी रह सकती है और इसके बाद धीरे-धीरे नीचे आने की संभावना है। जैसा पिछली बार हुआ था। वैसे मैं कोई ज्योतिषी नहीं कि भविष्यवाणी कर सकूं।
सवाल- ऐसे समय में जहां लोगों को अभी ऑक्सीजन, दवा, अस्पताल में बिस्तर, समुचित इलाज नहीं मिल पा रहा है, आप क्या सलाह देना चाहेंगे? ताकि बहुत दर्दनाक स्थिति से बचा सके।
हां, अभी तो संक्रमण की भयावहता की शुरुआत है। यह स्थिति कहां तक जाएगी, अंदाजा नहीं लगाया जा सकता। लोगों के लिए सलाह यही है कि वह पूरी सावधानी, सख्ती और सतर्कता के साथ कोरोना वायरस के संक्रमण से बचाव वाला व्यवहार करें। जहां तक और जितना संभव हो लोगों से दूरी बनाए रखें। चेहरे पर मास्क लगाएं। हाथों को सैनिटाइज करें, उसे बार-बार धोते रहें। यही एक कारगर रास्ता है। लोगों ने लापरवाही दिखाई है और अब नतीजा सामने आ रहा है।
सवाल- लेकिन कोरोना वायरस म्यूटेट कर रहा है, इसके नए-नए स्वरूप सामने आ रहे हैं?
देखिए, वायरस संक्रमण में इससे कोई फर्क नहीं पड़ता। वायरस की प्रकृति संक्रमण का फैलाव करने की है। यह चाहे साधारण वायरस हो या फिर म्यूटेंट वैरिएंट। संक्रमण से बचाव का उपाय ही इसका सबसे नायाब तरीका है। लोगों को कोरोना से बचाव के जो उपाय बताएं जा रहे हैं, उन्हें गंभीरता से लेकर लोग उसका पालन करें। टीका लगवाने में उत्साह दिखाएं।
सवाल- टीका संक्रमण से बचा सकेगा? जिसे टीका लगा है, वह भी तो संक्रमित हो रहे हैं?
दुर्भाग्य की बात है कि आज लगभग 12 करोड़ लोगों को ही टीका मिल सका है। जबकि टीकाकरण के 60 हजार से अधिक सेंटर हैं। हमारा लक्ष्य 45 साल के ऊपर वाले 40 करोड़ लोगों का टीकाकरण करने का है। यही वह आयु वर्ग है जो कोरोना संक्रमण का न केवल तेजी से शिकार होता है, बल्कि अस्पताल जाने और मृत्यु का शिकार होने वालों में भी शामिल है। दूसरे, संक्रमण से मरने वालों में टीका लगवाने वाला शायद ही कोई व्यक्ति शामिल हो। लेकिन बेहद चिंतनीय है कि अभी तक 45 साल से ऊपर के केवल 12 करोड़ लोगों ने ही टीका लगवाया।
एक बात और। टीका लगने के बाद संक्रमित के गंभीर स्थिति में पहुंचने, अस्पताल में दाखिल होने और उसकी मृत्यु होने की संभावना नगण्य हो जाती है। मुझे पता है कि टीका इस संक्रमण का उपचार नहीं है। वह केवल संक्रमण की तीव्रता कम कर रहा है।
सवाल- आपने कहा लोगों कि लापरवाही ने संक्रमण को खतरनाक स्तर पर पहुंचाया। यह लापरवाही करने वाले लोगों में कौन-कौन आते हैं?
आपने-हमने सभी ने लापरवाही की है। फरवरी 2021 में ही देखिए, टीकाकरण अभियान को लेकर बहुत से लोगों ने आवाज उठाई। सवाल खड़े कर दिए। मीडिया ने भी शोर मचाया। लोगों ने कहा कि कोरोना समाप्त हो रहा है और अब टीकाकरण की जरूरत क्या है? लेकिन हमारे मन में इसके संक्रमण को लेकर भय था। हम सतर्क और सावधान थे। इसलिए हम टीकाकरण पर जोर दे रहे थे। हमें 'सुरक्षा गार्ड' चाहिए था। इस लापरवाही का नतीजा देखिए कि कितनी बड़ी दुर्घटना घट रही है। यह तो अभी शुरुआत है। अभी दुर्घटना की तीव्रता आनी बाकी है।
मैं कहूंगा कि लापरवाही केवल यहीं नहीं हुई। लोगों ने सामाजिक समारोह, शादी-ब्याह, धार्मिक कार्यक्रम, राजनीतिक और चुनावी कार्यक्रम, भीड़-भाड़, मास्क से परहेज को भी जारी रखा। बड़े पैमाने पर लापरवाही हुई। इसे नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
सवाल- प्रधानमंत्री या गृहमंत्री की राजनीतिक जनसभाएं और रोड शो जैसे तमाम राजनीतिक कार्यक्रमों को इस लापरवाही को बढ़ाने में कितना जिम्मेदार मानते हैं आप, क्योंकि यह देश के जिम्मेदार लोग हैं?
इस पर कोई टिप्पणी नहीं। मुझे जो कहना था, कह दिया। मैं एक टेक्निकल आदमी हूं और अपने क्षेत्र के सवाल पर ही उत्तर दे सकता हूं।
सवाल- टीकाकरण का निर्णय लेने में भी दो-तीन महीने की देरी क्यों हुई? वैक्सीन की एक्सपायरी की तारीख नजदीक आता देखकर टीकाकरण करने का निर्णय लिया गया?
आपने सवाल बहुत अच्छा उठाया है। एक तरफ पर्दे के पीछे कई चीजें बहुत अच्छी होती हैं.....आप देखिए न। कोवैक्सीन को जब टीकाकरण की अनुमति दी गई, तब कितना हा-हाकार मचा था। कई लोगों ने तो कह दिया कि वह कोवैक्सीन नहीं लगवाएंगे। कोवीशील्ड को अनुमति देने में तो कोई देरी नहीं की गई। इसका फेजिंग ट्रायल ही दिसंबर 2020 के आखिरी सप्ताह में समाप्त हुआ था। 03 जनवरी 2021 को इसके टीकाकरण की अनुमति दे दी गई।
मैं टेक्निकल आदमी हूं। वैक्सीन के मामले में हम जितना तेजी से सफलता के मुकाम पर पहुंचे, बहुत कम देश वहां तक पहुंच पाए थे।
सवाल- लेकिन निर्णय लेने में देरी तो हुई?
आज देश के 60 हजार टीका केन्द्रों में हर रोज एक करोड़ लोग टीका ले सकते हैं, लेकिन अभी तक का सबसे बड़ा आंकड़ा एक दिन में बमुश्किल 20-25 लाख लोगों का ही है। अभी तो 20-25 फीसदी लोगों ने ही लगवाया। लोगों को पहले भरोसा ही नहीं हुआ कि यह टीका किसी काम का है।
मुझे बताइए आप नीति निर्धारकों पर सवाल उठा रहे हैं, लेकिन जिन्हें टीका लगना चाहिए था, अभी तक नहीं लगा। जितना लगना चाहिए, उतना नहीं लगा। अब इसपर क्या कहेंगे? अब कह रहे हैं कि जवान आदमियों को लगा दिया जाए। जबकि पहले इसे बीमार या उस आदमी को लगाया जाना चाहिए, जिसकी जिंदगी खतरे में है। मुझे मालूम है कि यह टीका संक्रमण नहीं रोकता। यह संक्रमण की तीव्रता कम करता है। केवल अस्पताल में दाखिल होने, मृत्यु होने से बचाता है।
सवाल- महामारी टीकाकरण अभियान जिस तरीके से, जिस तेजी और उत्साह से शुरू होना चाहिए था, क्या शुरू हो पाया? क्या आपको इसमें कोई खामी तो नहीं दिखाई देती?
कोई खामी नहीं है। टीकाकरण सही तरीके से शुरू हुआ। इसमें मुझे कोई संदेह नहीं है। शुरू में तीन हजार टीकाकरण केन्द्र थे। इसमें रोजाना 60 हजार लोगों को टीका लगना चाहिए था। हमने पहले चरण में फ्रंटलाइन वर्कर (चिकित्सा क्षेत्र) को विश्वास पैदा करने के लिए ही टीका लगाने की रणनीति बनाई। लेकिन हर रोज केवल दो-ढाई हजार लोगों ने टीका लगवाया। शेष आगे नहीं आए। अब जाकर धीरे-धीरे तेज हो हुआ है। आज हम दुनिया में एक दिन में सबसे अधिक लोगों को टीका लगाने का सबसे बड़ा अभियान (60 हजार केन्द्र) चला रहे हैं। निजी क्षेत्र ने कहा था कि हम इस अभियान में बड़ा योगदान देंगे, लेकिन 20 हजार केन्द्र का वादा करके बमुश्किल पांच हजार निजी टीका केन्द्र ही चल पा रहे हैं। इसके मुकाबले अमेरिका में देखिए तो वहां लोग टीका लगवाने तेजी से आगे आए।
सवाल- टीकाकरण में तेजी तो प्रधानमंत्री को पहली डोज लगने के बाद आई, लोगों में भरोसा जगा? अन्य देशों के राष्ट्राध्यक्षों की तरह यह पहले हो सकता था?
मैं इससे सहमत नहीं हूं। मैं पूरी दुनिया में प्राथमिकता के आधार पर तय होने वाले अभियान समूह का अध्यक्ष हूं। प्रधानमंत्री पहले लगवा लेते तो फिर राजनेताओं को भी पहले लगना चाहिए था। यह कोई बात नहीं हुई। देखिए, टीकाकरण में चिकित्सा क्षेत्र के लोगों और फ्रंटलाइन वर्कर को पहले प्राथमिकता विश्वास पैदा करने के लिए ही दी गई थी। 16 जनवरी को एम्स में वहां के निदेशक डा. रणदीप गुलेरिया ने कोवैक्सिन का टीका लगवाया था। नीति आयोग के सदस्य डा. विनोद कुमार पॉल ने लगवाया और मैंने भी 16 जनवरी 2021 को पलवल में कोविशील्ड का टीका लगवाया।
सवाल- कोरोना काल के पहले चरण में हमने ताली और घंटे बजवाए?
सवाल उठाना आसान है, लेकिन आप देखिए इस अभियान में देश के लोगों की सहभागिता कितनी शानदार थी। पूरी दुनिया में 2020 में इसकी चर्चा हुई कि भारत के लोगों ने अपनी सरकार का लॉकडाउन, ताली बजाने, दीया जलाने, घंटी बजाने में कितना साथ दिया। यह लोगों में जागरूकता पैदा करने का ही नतीजा था। अभी 2021 में देख लीजिए। आप लोगों ने कोरोना को लेकर जागरूकता फैलाने में कितना साथ दिया है। पूरे दमखम से मीडिया अपनी जिम्मेदारी निभा रहा है। वरना लोग तो लापरवाह हो चुके थे। हमें पहली बार स्वास्थ्य से अर्थव्यवस्था, सामाजिक ढांचा, कारोबार आदि का संबंध समझ में आया है।
सवाल- क्या हमने जो तैयारी की जानी थी, उसमें ढील नहीं दी?
इस देश में पिछले साल मार्च में आरटीपीसीआर टेस्ट करने वाली केवल एक प्रयोगशाला थी। 21 मार्च 2021 को यह बढ़कर 2376 प्रयोगशालाएं हो गईं। हर राज्य, क्षेत्र में आरटीपीसीआर टेस्ट हो रहा है। देश में जांच किट्स, एंटीजन किट बनने लगी। पहले सब आयात हो रही थी। दो दिन पहले एक दिन में 15 लाख टेस्ट हुए हैं। इतना प्रयास दुनिया में इतने कम समय में कहीं नहीं हुआ। अब दोबारा कोई ऐसी महामारी आएगी तो प्रयोगशाला को स्थापित नहीं करना पड़ेगा। इसमें निजी क्षेत्र और सार्वजनिक क्षेत्र दोनों ने बहुत बड़ी भूमिका निभाई है।
सवाल- क्या हम कोरोना संक्रमण को लेकर अक्तूबर के बाद बहुत शिथिल नहीं होते गए। मार्च 2021 में जब 10 लाख सक्रिय मामले हो गए तब भी हम नहीं जागे, अब हाहाकार मचने के बाद हम सब बेबस नजर आ रहे हैं?
ऐसा नहीं है। हमेशा सक्रियता बरती गई। आप बताइए क्या सप्लाई चेन, टीका केन्द्र, प्रयोगशालाएं, प्रशिक्षण सब रातोंरात हो जाते हैं? हम जुलाई 2020 से सक्रिय थे। टीका आएगा तो कैसे लगेगा, इसकी योजना में जुटे थे। लोगों को सावधान कर रहे थे। अपनी चिंताएं जाहिर कर रहे थे।
सवाल- विदेशी टीके को अब अनुमति दी जा रही है। आखिर यह आएगा कब और लगेगा कब?
रेग्युलेटरी सिस्टम के बारे में हम सभी को पता होना चाहिए। एक सप्ताह पहले रूस की स्पूतनिक-वी वैक्सीन को अनुमति मिली है। इसका क्लीनिकल ट्रायल 28 मार्च को समाप्त हुआ था। रेग्युलेटरी सिस्टम को भी तेज किया गया है। इसका मूल्यांकन नियमावली के आधार पर किया जा रहा है।
सवाल- अन्य विदेशी टीकों की क्या स्थिति है?
देखिए, अनुमति उनको भी उसी दिन दे दी गई। जब इसको दिया गया तो दूसरो को भी। मैं डब्ल्यूएचओ में कोवैक्स फैसिलिटी का चेयरमैन हूं। मुझे मालूम है कि दुनिया में कितनी वैक्सीन मिल रही है? विश्व में वैक्सीन का स्टॉक है ही नहीं। इसलिए मिलेगी नहीं। यह कहना बहुत आसान हो जाता है कि भाई इसको क्यों नहीं दिया?
सवाल- जब वैक्सीन मिलेगी नहीं तो अनुमति का क्या मतलब है?
देखिए, दायरे से बाहर जाकर अनुमति दे दी गई है। एक स्थिति आप और समझिए। जॉनसन एंड जॉनसन कंपनी अब जाकर भारत में वैक्सीन बनाने के लिए तैयार हुई है। शायद वह यहां काम शुरू होने के बाद हमें थोड़ी बहुत वैक्सीन दे दें। लेकिन आपको यह पता नहीं होगा कि अमेरिका में जॉनसन एंड जॉनसन का टीका प्रतिबंधित कर दिया गया है। ऐसे में यदि हमारे देश में लोगों को जॉनसन एंड जॉनसन का टीका लगने लगेगा तो लोग उल्टा हल्ला मचाएंगे कि अमेरिका में टीका बंद कर दिया गया तो यहां क्यों लग रहा है?
सवाल- फिर अनुमति क्यों दे दी गई?
अभी सिर्फ परीक्षण की अनुमति दी गई है। क्लीनिकल परीक्षण के बाद देखा जाएगा। हम पहले किसी विदेशी वैक्सीन को अनुमति देते तो वह बहुत गलत होता। क्योंकि हर देश की वैक्सीन वहां की परिस्थिति के आधार पर तैयार होती है और लोगों में अलग-अलग प्रभाव लेकर आती है। इसलिए हर वैक्सीन का परीक्षण किया जाता है।
सवाल- देश में वैक्सीन की कमी है? क्या ऑक्सीजन, दवा की भी कमी है?
नहीं। टीका पर्याप्त संख्या में उपलब्ध है। इसे कुछ लोगों द्वारा जानबूझकर समस्या का रूप दिया जा रहा है। ऑक्सीजन की कमी के बारे में नहीं बता पाऊंगा। इस बारे में जानकारी नहीं है। रहा सवाल रेमडेसिविर दवा को, तो यह चिकित्सकों द्वारा जरूरत के समय पर उपयोग की जाती है। इसलिए इसकी कोई समस्या नहीं है।