I.N.D.I Alliance: बेंगलुरु बैठक के बाद ही तय हो गई थी ममता की ये रणनीति, बंगाल में अंदरखाने ये है फॉर्मूला!
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विस्तार
ममता बनर्जी ने पश्चिम बंगाल में अकेले चुनाव लड़ने का फैसला कर लिया है। उन्होंने घोषणा कर दी है कि उनकी बात न मानने के कारण वे अकेले चुनाव में उतरने का फैसला कर रही हैं। लेकिन तृणमूल कांग्रेस सूत्रों के अनुसार, इंडिया गठबंधन की बेंगलुरु बैठक के समय ही ममता बनर्जी ने यह साफ कर दिया था कि वे पश्चिम बंगाल में वामदलों के साथ चुनाव में नहीं उतर सकतीं। कांग्रेस से भी उनका सीटों को लेकर मतभेद सामने आ गया था। तीनों दलों के बीच उसी समय यह तय हो गया था कि पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी के साथ कांग्रेस या वामदलों का खुले तौर पर कोई समझौता नहीं होगा।
लेकिन तीनों दलों के नेताओं में इस बात पर सहमति बन गई थी कि बंगाल में 'बैकडोर पॉलिटिक्स' उपयोग में लाई जाएगी। तय फॉर्मूले के अनुसार, ममता बनर्जी करीब 30 सीटों पर अपने मजबूत उम्मीदवार उतारेगी। इन सीटों पर कांग्रेस या वाम दल कमजोर उम्मीदवार उतारेंगे, जिससे तृणमूल कांग्रेस के उम्मीदवारों की जीत की राह आसान हो सके। जबकि शेष 12 सीटें ममता बनर्जी कांग्रेस और वामदलों के लिए छोड़ेंगी। इन 12 सीटों पर तृणमूल कांग्रेस के डमी कैंडिडेट चुनाव में उतारे जाएंगे, जिससे कांग्रेस और वाम दलों के जीत की राह आसान हो सके। सीटों का चयन जीतने की संभावना के आधार पर लेने का निर्णय किये जाने पर सहमति बनी थी। यानी इंडिया गठबंधन ने एक बदली रणनीति के साथ भाजपा से लड़ने की रणनीति बनाई है।
क्यों नहीं हुआ था समझौता?
तृणमूल कांग्रेस के एक शीर्ष नेता के अनुसार, ममता बनर्जी ने अपनी पार्टी की नींव वाम दलों के कुशासन, भ्रष्टाचार और हिंसा से लड़कर ही बनाया है। ऐसे में उनके लिए जनता को यह समझाना आसान नहीं होगा कि वे किन कारणों से वाम दलों के साथ मिलकर लोकसभा चुनाव में उतर रहे हैं। जबकि बाद में विधानसभा चुनाव में उन्हें एक बार फिर उन्हीं दलों के साथ मुकाबला करना है। ऐसे में ममता बनर्जी के लिए यह आसान नहीं है कि वे चुनाव में कांग्रेस या वाम दलों के साथ चुनाव में उतरें।
सीटों पर भी था विवाद
ममता बनर्जी का कांग्रेस या अन्य दलों के साथ गठबंधन न हो पाने का एक बड़ा कारण सीटों पर आपसी तालमेल न बन पाना भी रहा है। नेता के मुताबिक, ममता बनर्जी कांग्रेस को मध्य और दक्षिण की सीटें देने के लिए तैयार नहीं थीं, जहां पार्टी ने 2019 के लोकसभा चुनाव में बेहतर प्रदर्शन किया था। जबकि कांग्रेस उन्हीं लोकसभा क्षेत्रों की मांग कर रही थी। ऐसे में दोनों दलों के बीच सीटों पर तालमेल नहीं हुआ और अंततः पर्दे के पीछे से चुनाव में उतरने का निर्णय लिया गया।