I.N.D.I.A.: सरकार के विरोध के बहाने मजबूत हो रहा विपक्ष, मनोवैज्ञानिक बढ़त को कितना भुना पाएगा विपक्ष
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विस्तार
संसद में केंद्र सरकार के विरोध के बहाने विपक्षी एकता को लेकर बना गठबंधन इंडिया लगातार मजबूत हो रहा है। मणिपुर के मुद्दे पर सरकार को घेरने में विपक्षी दलों ने अब तक अच्छी एकता दिखाई है। सरकार के विरोध पर सदन की कार्यवाही से निष्कासित संजय से मिलने में जिस तरह सोनिया गांधी ने पहल की है, उससे भी विपक्षी दलों के ज्यादा करीब आने के संकेत मिल रहे हैं। अविश्वास मत के बहाने विपक्ष ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को मणिपुर के मुद्दे पर बोलने के लिए मजबूर कर भी मनोवैज्ञानिक बढ़त हासिल की है। प्रश्न है कि विपक्ष इस बढ़त को कितना आगे ले जा पाएगा? लोकसभा चुनावों में उसे इसका कितना लाभ मिल पाएगा?
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दरअसल, देश की भौगोलिक और सांस्कृतिक परिस्थितियां ऐसी हैं कि यहां राष्ट्रीय स्तर पर किसी बड़े गठबंधन के बनने की संभावना बहुत कमजोर होती है। यदि किसी कारण गठबंधन बन भी जाता है, तो सहयोगी दल एक दूसरे को लाभ पहुंचाने की स्थिति में नहीं होते। इसका सबसे बड़ा कारण है कि सभी क्षेत्रीय दल एक-दो राज्यों तक अपना असर रखते हैं। ऐसे में किसी दूसरे राज्य में अपने सहयोगी दल को वे बहुत ज्यादा लाभ पहुंचाने की स्थिति में नहीं होते।
जैसे वर्तमान इंडिया गठबंधन में ही पश्चिम बंगाल की तृणमूल कांग्रेस उत्तर प्रदेश की समाजवादी पार्टी को किसी तरह लाभ पहुंचाने की स्थिति में नहीं होगी, तो जम्मू-कश्मीर की नेशनल कांफ्रेंस तमिलनाडु में किसी सहयोगी दल को कोई लाभ पहुंचाने की स्थिति में नहीं होगी।
तो क्या इंडिया गठबंधन के सदस्य दल एक दूसरे को कोई लाभ नहीं पहुंचा पाएंगे और एनडीए के उनके विरोध का कोई असर नहीं दिखाई पड़ेगा? राजनीतिक विश्लेषक धीरेंद्र कुमार ने अमर उजाला से कहा कि इंडिया गठबंधन का सबसे बड़ा लाभ मनोवैज्ञानिक स्तर पर मिलने की संभावना है।
सभी दल अपने मतदाताओं के बीच यह प्रचारित करने की कोशिश करेंगे कि उनके साथ पूरे देश की पार्टियां एकजुट हैं। ऐसे में सरकार में बदलाव की मंशा रखने वाले सभी मतदाता गठबंधन की पार्टियों के झंडे के नीचे अलग-अलग राज्यों में एकत्र हो जाएंगे। गठबंधन को इसका लाभ मिल सकता है।
चूंकि, महंगाई और बेरोजगारी जैसे मुद्दे सभी राज्यों के मतदाताओं की प्राथमिकता में होते हैं, और संसद में इंडिया गठबंधन के सभी विपक्षी दल काले कपड़ों में सरकार का विरोध कर रहे हैं, ये अपने राज्यों में मतदाताओं को यह विश्वास दिलाने की कोशिश कर सकते हैं कि जनता के मुद्दों के लिए सभी लोग एक हैं। ऐसे में अलग-अलग दल होने के बाद भी वे एक दूसरे को सहयोग दे सकते हैं। एक ही राज्य में दो या ज्यादा दलों के होने पर सीटों में बेहतर तालमेल होने पर इसका ज्यादा असर दिखाई पड़ सकता है।
एकजुटता बनाए रखनी होगी
धीरेंद्र कुमार ने कहा कि इस मनोवैज्ञानिक बढ़त का लाभ लेने के लिए सभी विपक्षी दलों को एकजुट रखना समय की आवश्यकता है। केंद्र सरकार के विरुद्ध अविश्वासमत का प्रस्ताव लाने में जिस तरह कांग्रेस ने केवल अपने सांसद गौरव गोगोई को आगे कर दिया, उससे इंडिया के सहयोगी दलों में नाराजगी बढ़ी है। यदि विपक्ष के सभी 26 सांसदों की तरफ से अविश्वास प्रस्ताव गया होता, तो इसका कहीं ज्यादा प्रचार होता और उसका लाभ विपक्ष को मिलता। कांग्रेस को इस तरह की गलतफहमी पैदा होने से बचने की कोशिश करनी चाहिए।