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मेरी एक बेटी भारतीय, एक पाकिस्तानी

Thu, 01 Jun 2017 04:14 PM IST
amarujala.com-Presented by- आनंद
amarujala.com-Presented by- आनंद Updated Thu, 01 Jun 2017 04:14 PM IST
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I have a Indian daughter and a Pakistani
मैं तब महज 20 साल की थी जब इनके अब्बा पाकिस्तान से आए और एलओसी पर मेरे अब्बा से मिले। फिर हमारे घर आए और अपने बेटे के लिए मेरा हाथ मांग लिया। मेरे पति के पिता रिश्ते में मेरे दादा लगते हैं तो एक तरह से ये शादी रिश्तेदारी में ही हो रही थी। हालांकि इससे पहले हमारे परिवार में किसी ने पाकिस्तान की तरफ वाले कश्मीर में शादी नहीं की थी।
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मैं वहां कभी नहीं गई थी। अब्बा गए थे और बताते थे कि वहां उनके दूर के कितने ही रिश्तेदार हैं। अब्बा ने जो तय कर दिया उस पर सवाल उठाने का मुझे कोई हक नहीं था। कभी रहा भी नहीं था। सब बस बहुत अचानक हो गया। मैं ना अपने होने वाले पति से मिली थी, ना बात की थी।
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अंदाजा नहीं था मुश्किलों का

I have a Indian daughter and a Pakistani
जब ये सब हुआ तो मुझे अंदाजा भी नहीं था कि भारत के कश्मीर आना-जाना इतना मुश्किल होगा। मैं भारत की नागरिक हूं और वीजा पर मुजफ्फराबाद में रहने लगी। यहां सब अलग है। इस्लामी तौर-तरीके कहीं ज्यादा शिद्दत से अमल में लाए जाते हैं। ये मुझे अच्छा लगता है। जैसे भारत के कुपवाड़ा में जहां मैं रहती थी, अक्सर औरतें बुर्का नहीं ओढ़ती थीं। यहां ये लगभग जरूरी है। भाषा, खान-पान, रीत-रिवाज सब फर्क हैं।

पर अब आदत पड़ गई है। सब अच्छा लगने लगा है। शुरू में मां-बाप के बिना घबराहट होती थी, घर की बहुत याद आती थी। कुपवाड़ा में हमारा परिवार बहुत फैला हुआ है और सबके मकान नजदीक बने हैं मानो पूरा मोहल्ला हमारा ही है। वहां मेरी कई सहेलियां हैं। पर यहां घर के अंदर रहने का ही रिवाज है। औरत को घर में ही सुकून से रहना चाहिए। शादी से पहले मैं स्कूल छोड़, मदरसे में पढ़ने लगी थी। पांच साल महाराष्ट्र के मालेगांव में मैंने अपनी पढ़ाई पूरी की। फिर मदरसे में पढ़ाना भी शुरू कर दिया था। यहां आई तो परिवार में लग गई। तो सब छूट गया। शायद आगे जाकर फिर पढ़ा सकूं।

वीजा की दिक्कत

I have a Indian daughter and a Pakistani
शादी के करीब नौ महीने बाद भारत वापस जाने को मिला। तब मैं पेट से थी। मेरी पहली बेटी वहीं पैदा हुई। वो भारत की नागरिक है। दूसरी बेटी यहां मुजफ्फराबाद में हुई। वो पाकिस्तान की नागरिक है। यही उनकी तकदीर है। जैसे मेरी तकदीर में यहां बसना है।

अच्छा लगता है कि यहां सब अपनी कौम के हैं। यहां बहुत आजादी भी है। घर से बाहर निकलने में डर नहीं लगता। सेना की चेकपोस्ट, हड़तालें, कर्फ्यू, स्कूल-बंद... वो सब जो कुपवाड़ा में आम था, वो सब यहां नहीं है। पर मां-बाप से मिलने के लिए वीजा और आने-जाने की दिक्कत बहुत है।

...तो बिछड़े लोग मिल जाते

बार-बार यही लगता है कि कि रास्ते आसान हो जाते तो बिछड़े लोग मिल जाते। कभी सोचती हूं कि मां-बाप भी यहीं आकर बस जाएं तो सुख-दुख में फिर उनका साथ हो। मैं घर की सबसे बड़ी हूं। मेरी शादी सबसे पहले हुई है। मुझसे छोटे पांच भाई-बहन पूछेंगे तो यही कहूंगी कि उधर ही रहें, अपनों के करीब रहना ही बेहतर है।
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