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इंडियन एकेडमी ऑफ साइंसेज ने उठाए सवाल, कहा- कोरोना वैक्सीन पर जल्दबाजी उचित नहीं
Mon, 06 Jul 2020 02:45 AM IST
अवधेश कुमार
अमर उजाला नेटवर्क, नई दिल्ली
अमर उजाला नेटवर्क, नई दिल्ली
Published by: अवधेश कुमार
Updated Mon, 06 Jul 2020 02:45 AM IST
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कोरोना वायरस (फाइल फोटो)
- फोटो : पीटीआई
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कोरोना वैक्सीन को आगामी 15 अगस्त तक लॉन्च किए जाने के पत्र को लेकर भारतीय वैज्ञानिकों के संगठन इंडियन एकेडमी ऑफ साइंसेज ने सवाल उठाए हैं। संगठन का कहना है कि कोरोना वैक्सीन को प्राथमिकता देना जरूरी है लेकिन इसे लेकर किसी भी प्रकार की जल्दबाजी उचित नहीं है। वैक्सीन परीक्षण में लंबा वक्त वैज्ञानिक अध्ययन में लगता है। पहले और दूसरे चरण के पूरा होने के बाद तीसरे चरण का परीक्षण भी जरूरी है। तभी इसे आम जनता के लिए इस्तेमाल में लाया जा सकता है।
दो दिन पहले ही भारतीय आयुर्विज्ञान अनुसंधान परिषद (आईसीएमआर) के महानिदेशक डॉ. बलराम भार्गव ने 15 अगस्त से पहले मानव परीक्षण को पूरा करने के लिए कहा था। इसे लेकर वैज्ञानिकों और डॉक्टरों ने जब सवाल खड़े किए तो शनिवार को आईसीएमआर ने बयान जारी करते हुए कहा कि वह सिर्फ इतना चाहता है कि परीक्षण में किसी भी प्रकार से समय की बर्बादी न हो। परीक्षण से जुड़ी अनुमति इत्यादि कार्यों को सर्वोच्च प्राथमिकता पर लिया जाए ताकि जल्द परीक्षण पूरा हो सके।
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दो दिन पहले ही भारतीय आयुर्विज्ञान अनुसंधान परिषद (आईसीएमआर) के महानिदेशक डॉ. बलराम भार्गव ने 15 अगस्त से पहले मानव परीक्षण को पूरा करने के लिए कहा था। इसे लेकर वैज्ञानिकों और डॉक्टरों ने जब सवाल खड़े किए तो शनिवार को आईसीएमआर ने बयान जारी करते हुए कहा कि वह सिर्फ इतना चाहता है कि परीक्षण में किसी भी प्रकार से समय की बर्बादी न हो। परीक्षण से जुड़ी अनुमति इत्यादि कार्यों को सर्वोच्च प्राथमिकता पर लिया जाए ताकि जल्द परीक्षण पूरा हो सके।
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इंडियन एकेडमी ऑफ साइंसेज की ओर से जारी बयान में कहा है कि संक्रमण से लड़ने के लिए मानव शरीर में एंटीबॉडी बनने में भी समय लगता है। इसके बाद इनका असर, डाटा रिपोर्टिंग इत्यादि में एक लंबा वक्त चाहिए होता है। हर चरण के परिणाम की समीक्षा के आधार पर ही उसे अगले दौर में प्रवेश दिया जाता है। अगर इसमें किसी भी तरह की कोताही बरती गई तो बड़ा नुकसान हो सकता है।
उदाहरण देते हुए यह भी कहा है कि अगर पहले या दूसरे चरण में परीक्षण का परिणाम संतोषजनक नहीं आता है तो उस अध्ययन को आगे नहीं बढ़ाया जा सकता। इन्हीं कारणों के चलते ऐसे परीक्षणों को समयसीमा में बांधना गलत है। इस तरह के आदेशों से देश के नागरिकों में उम्मीद जगेगी जोकि अगर पूरी नहीं हुई तो उनका विश्वास टूट सकता है।
उदाहरण देते हुए यह भी कहा है कि अगर पहले या दूसरे चरण में परीक्षण का परिणाम संतोषजनक नहीं आता है तो उस अध्ययन को आगे नहीं बढ़ाया जा सकता। इन्हीं कारणों के चलते ऐसे परीक्षणों को समयसीमा में बांधना गलत है। इस तरह के आदेशों से देश के नागरिकों में उम्मीद जगेगी जोकि अगर पूरी नहीं हुई तो उनका विश्वास टूट सकता है।