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चिंताजनक: प्रकृति के साथ इन्सानों का जुड़ाव 60 फीसदी हुआ कम, नई पीढ़ी पर्यावरण को सामान्य मान रही

Sun, 14 Sep 2025 05:30 AM IST
दीपक कुमार शर्मा अमर उजाला नेटवर्क, नई दिल्ली
अमर उजाला नेटवर्क, नई दिल्ली Published by: दीपक कुमार शर्मा Updated Sun, 14 Sep 2025 05:30 AM IST
सार

रिपोर्ट बताती है कि धरती पर मानव-निर्मित वस्तुओं का भार अब सभी जीवित प्राणियों के कुल वजन से अधिक हो चुका है। यह वही पलटाव है जिसे वैज्ञानिक अनुभव के विलुप्त होने और प्रकृति पर उपनिवेश जमाने के रूप में देख रहे हैं।
 

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Humans connection with nature decreased by 60 percent new generation taking environment for granted
सांकेतिक तस्वीर - फोटो : अमर उजाला प्रिंट

विस्तार

क्या हम अब भी प्रकृति का हिस्सा हैं या उससे अलग होकर अपनी राह चुन चुके हैं? इस संदर्भ में यूनिवर्सिटी ऑफ डर्बी (यूके) के नेचर कनेक्टेडनेस अध्ययन से खुलासा हुआ है कि पिछले ढाई सौ वर्षों में इन्सानों का प्रकृति से जुड़ाव 60 प्रतिशत तक घट चुका है।

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दूसरी ओर इजरायल के वीजमैन इंस्टीट्यूट ऑफ साइंस की रिपोर्ट बताती है कि धरती पर मानव-निर्मित वस्तुओं का भार अब सभी जीवित प्राणियों के कुल वजन से अधिक हो चुका है। यह वही पलटाव है जिसे वैज्ञानिक अनुभव के विलुप्त होने और प्रकृति पर उपनिवेश जमाने के रूप में देख रहे हैं। मानव सभ्यता की कहानी हमेशा से प्रकृति के साथ जुड़ाव और उस पर निर्भरता की रही है। लेकिन हाल के शोध बताते हैं कि यह रिश्ता कमजोर होता जा रहा है।
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प्रोफेसर माइल्स रिचर्डसन (यूनिवर्सिटी ऑफ डर्बी) ने अपने अध्ययन में पाया कि 1800 से अब तक इंसानों का प्रकृति से जुड़ाव लगभग 60% घटा है। उन्होंने अनुभव के विलुप्त होने (एक्सटिंक्शन का एक्सपीरियंस) की अवधारणा के आधार पर यह नतीजा निकाला। यानी जब लोग प्रकृति से कम जुड़ते हैं तो अगली पीढ़ियां भी उससे और अधिक दूर होती चली जाती हैं। इस शोध में नदी, फूल, बाग बगीचे, पेड़ों के झुरमुट, पगडंडी जैसे शब्दों के साहित्य में प्रयोग की आवृत्ति को संकेतक माना गया। परिणाम दिखाते हैं कि औद्योगिकीकरण और शहरीकरण के बाद प्रकृति से जुड़ी भाषा और अनुभव दोनों तेजी से गायब होने लगे।


जेन जी प्रकृति के उपहारों से वंचित
जब नई पीढ़ियां (जेनरेशन जेड-जेन जी) बचपन से ही प्रकृति के सीधे अनुभवों जैसे मिट्टी में खेलना, पेड़ों में चढ़कर फल तोड़ना, कच्चे रास्तों पर चलना या दौड़ना, खुले आसमान के नीचे समय बिताना या ऋतु-परिवर्तन को महसूस करने से वंचित रहती हैं, तो उनकी सोच में प्रकृति एक संकल्पना मात्र बन जाती है, अनुभवजन्य सच नहीं। नतीजा यह है कि निर्णय लेने और भविष्य की योजनाओं में प्रकृति और पर्यावरण का स्थान पीछे खिसक जाता है, जबकि उपभोग और नियंत्रण की प्रवृत्ति आगे बढ़ जाती है।

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नई पीढ़ी पर्यावरण को सामान्य मान रही
अमेरिकी मनोवैज्ञानिक पीटर एच. कान जूनियर ने इसे एनवायरमेंटल जेनरेशनल एमनेसिया कहा है यानी हर नई पीढ़ी उस पर्यावरण को सामान्य मान लेती है जिसमें वह बड़ी होती है, चाहे वह पिछली पीढ़ियों की तुलना में अधिक कृत्रिम और प्रदूषित ही क्यों न हो। नतीजतन, इंसानी सोच में प्रकृति का स्थान एक संकल्पना भर रह जाता है। टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ सोशल साइंसेज मुंबई से जुड़ीं डॉ. नीना डेविड ने भी यह रेखांकित किया है कि शहरीकरण के चलते बच्चों और युवाओं की विचार-प्रक्रिया में प्रकृति अब मूलभूत जीवनाधार की बजाय वैकल्पिक सुख-सुविधा बन गई है।

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