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चिंताजनक: हर 10 साल में 0.2 डिग्री सेल्सियस की दर से गर्म हो रही दुनिया, वैज्ञानिकों ने दी चेतावनी
Wed, 05 Jul 2023 06:03 AM IST
गुलाम अहमद
अमर उजाला नेटवर्क, नई दिल्ली
अमर उजाला नेटवर्क, नई दिल्ली
Published by: गुलाम अहमद
Updated Wed, 05 Jul 2023 06:03 AM IST
सार
अध्ययन के अनुसार, जलवायु परिवर्तन के कारण तापमान में हर एक डिग्री सेल्सियस की वृद्धि पर हिमालय और उत्तरी गोलार्ध के अन्य पहाड़ों में 15 फीसदी अधिक बारिश होने के आसार हैं।
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प्रतीकात्मक तस्वीर
- फोटो : iStock
विस्तार
ग्रीन हाउस गैस उत्सर्जन के बढ़ते स्तर से पृथ्वी का तापमान लगातार बढ़ रहा है। दुनिया के 50 शीर्ष वैज्ञानिकों ने बढ़ते तापमान से जलवायु पर पड़ने वाले असर को लेकर चेतावनी दी है। अध्ययन के मुताबिक, 2013-2022 तक तापमान में हर दशक 0.2 डिग्री सेल्सियस से अधिक की दर से वृद्धि हुई। यह धरती के लिए खतरनाक संकेत हैं। इससे दुनियाभर की मौसम संबंधी चक्रीय प्रणाली बुरी तरह प्रभावित होगी, जो आगे चलकर मानवजाति, वनस्पति और जीवजंतुओं के लिए परेशानी का भारी सबब बन सकती है।
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अध्ययन के अनुसार, इसी अवधि में कार्बन डाइऑक्साइड का औसत वार्षिक उत्सर्जन 54 अरब टन यानी अन्य गैसों के मुकाबले अपने सबसे उच्च स्तर पर पहुंच गया है। यह प्रति सेकंड लगभग 1,700 टन के बराबर है। लीड्स विश्वविद्यालय में प्रोफेसर और प्रमुख अध्ययनकर्ता पियर्स फोस्टर ने कहा, भले ही अभी तक धरती का तापमान 1.5 डिग्री सेल्सियस नहीं बढ़ा है, लेकिन वृद्धि इस तरह जारी रही तो यह सीमा भी पार हो जाएगी।
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उठाए जा रहे कदम पर्याप्त नहीं...
सह-अध्ययनकर्ता और वैज्ञानिक मैसा रोजस कोराडी ने कहा कि दुनियाभर में जलवायु परिवर्तन को रोकने के लिए की जा रही कार्रवाई और पैमाना जलवायु संबंधी खतरों को बढ़ाने से रोकने के लिए पर्याप्त नहीं है। 2000 के बाद से महासागरों को छोड़कर धरती के सतहों के तापमान में भारी वृद्धि हुई है। सहसत्राब्दी के पहले दशक के तापमान 1.22 डिग्री सेल्सियस की तुलना में पिछले 10 वर्षों में जमीन का औसत वार्षिक अधिकतम तापमान 0.5 डिग्री से 1.72 डिग्री सेल्सियस तक अधिक गर्म हुआ है।
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एक डिग्री तापमान बढ़ने से 15% अधिक होगी बरसात
अध्ययन के अनुसार, जलवायु परिवर्तन के कारण तापमान में हर एक डिग्री सेल्सियस की वृद्धि पर हिमालय और उत्तरी गोलार्ध के अन्य पहाड़ों में 15 फीसदी अधिक बारिश होने के आसार हैं। नेचर नामक पत्रिका में प्रकाशित अध्ययन के मुताबिक, बर्फबारी के बजाय बारिश होने के इस बदलाव के कारण बाढ़, भूस्खलन और मिट्टी कटाव जैसी आपदाओं का खतरा बढ़ सकता है।
बर्फ का एक-चौथाई हिस्सा हो सकता है नष्ट
आंकड़ों से पता चलता है कि हिमालय में अन्य पर्वतीय क्षेत्रों की तुलना में अधिक बारिश के आसार हैं। उच्च उत्सर्जन परिदृश्य के तहत बर्फ का एक-चौथाई हिस्सा नष्ट हो सकता है। रिपोर्ट में एक अध्ययन का हवाला दिया गया है जिसमें अनुमान लगाया गया है कि औसत बर्फबारी में 1971 से 2000 की तुलना में 2070 से 2100 के बीच सिंधु बेसिन में बर्फबारी 30 से 50 फीसदी, गंगा में 50 से 60 फीसदी और ब्रह्मपुत्र में 50 से 70 फीसदी की गिरावट आएगी और घनघोर बारिश की संभावना बढ़ेगी।