{"_id":"5733091f4f1c1b932f919878","slug":"human-brain-will-use-kept-in-the-refrigerator","type":"story","status":"publish","title_hn":"बरसों बाद काम आएगा फ्रीजर में रखा दिमाग ","category":{"title":"India News","title_hn":"भारत","slug":"india-news"}}
बरसों बाद काम आएगा फ्रीजर में रखा दिमाग
रशेल नुवेर
Updated Wed, 11 May 2016 03:58 PM IST
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अमेरिका और रूस में इस वक्त तीन सौ लोग हमेशा के लिए गुमनामी में खोने वाले हैं। उन्हें इस वक्त बेहद सर्द माहौल में रखा गया है। इसे ''क्रायोप्रेजर्वेशन'' कहा जाता है। ये तीन सौ लोग उस वक्त इस सर्द माहौल में रखे गए, जब उनके दिलों ने धड़कना बंद कर दिया था। पूरी तरह से मरने से पहले उनके दिमाग को फ्रीज कर दिया गया था। इसे ''विट्रीफिकेशन'' कहा जाता है।
कानूनी तौर पर ये सभी मर चुके हैं लेकिन अगर वो बोल सकते तो कहते कि उनके शरीर अभी लाश में तब्दील नहीं हुए हैं। डॉक्टरी जबान में कहें तो वो लोग सिर्फ बेहोश हुए हैं। किसी को नहीं मालूम कि इन लोगों को फिर से जिंदा किया जा सकता है या नहीं, लेकिन बहुत से लोग ये मानने लगे हैं कि मरकर हमेशा खत्म होने से ये बेहतर विकल्प है।
अभी दुनिया में करीब 1250 ऐसे लोग हैं जो कानूनी तौर पर जिंदा हैं, वो ऐसी हालत में रखे जाने का इंतजार कर रहे हैं यानी क्रायोप्रेजर्वेशन का इंतजार कर रहे हैं। अमेरिका के अलावा ऑस्ट्रेलिया और यूरोप के दूसरे देशों में अब ऐसे केंद्र खोले जा रहे हैं, जहां लोगों के शरीर को बेहद सर्द माहौल में रखा जा रहा है। इस उम्मीद में कि शायद वो कभी जिंदा हो जाएं।
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अमेरिका के मिशीगन के क्रायोनिक्स इंस्टीट्यूट के डेनिस कोवाल्स्की कहते हैं किसी को जमा देना, मौत के बाद किसी इंसान के साथ होने वाली दूसरी सबसे बुरी घटना है। मिशीगन का ये इंस्टीट्यूट दुनिया की सबसे बड़ी क्रायोनिक्स सुविधा वाला केंद्र है।
डेनिस कहते हैं कि कोई भरोसे से नहीं कह सकता कि सर्द माहौल में जमा दिए गए ये लोग फिर से जी उठेंगे। लेकिन ये पक्के तौर पर कहा जा सकता है कि अगर मरने के बाद आप जला दिए गए या दफन कर दिए गए तो फिर कभी नहीं जी सकेंगे।
यूं तो ''डिमॉलिशन मैन'' या ''वनीला स्काई'' जैसी हॉलीवुड फिल्मों में इस संभावना को तलाशने की कोशिश की गई थी। बहुत से वैज्ञानिक ये मानते हैं कि किसी को बेहद सर्द माहौल में जमा देने के बाद उसे फिर से जिंदा किए जाने की संभावना है।
कुछ ऐसे तजुर्बे किए गए हैं। एक खरगोश के दिमाग को क्रायोनिक्स तकनीक से बेहद सर्द माहौल में रखा गया था। कई हफ्तों बाद भी दिमाग सुरक्षित था। हालांकि खरगोश का शरीर अभी भी मुर्दा था।हालांकि मरे हुए खरगोश का दिमाग फिर से चलाना और किसी मरे इंसान को जिंदा करने में बहुत फर्क है।
लेकिन, बहुत से वैज्ञानिक ये मानते हैं कि आगे चलकर, ''क्रायोप्रेजर्वेशन'' या किसी को बहुत की ठंडे माहौल में रखकर फिर से उसमें जान फूंकना, बेहद आम हो जाएगा। कुछ इस तरह जैसे लोग सर्दी-जुकाम का इलाज करते हैं।
अमरिका के कैलिफोर्निया में सेंस रिसर्च फाउंडेशन है। ये फाउंडेशन उम्र की वजह से होने वाली बीमारियों के बारे में रिसर्च करता है। इसकी प्रमुख ऑब्रे डे ग्रे कहती हैं कि ''क्रायोप्रेजर्वेशन'' एक तरह की दवा ही है।
मान लीजिए कि ''क्रायोप्रेजर्वेशन'' की वजह से कुछ लोग आगे चलकर जिंदा हो जाते हैं। तो उनके पास उस दौर में लोगों को सुनाने के लिए सिर्फ कहानियां नहीं होंगी। मगर उन्हें एक अजनबी दौर में अजनबियों के बीच अपनी जिंदगी की इमारत फिर से खड़ी करने की चुनौती होगी।
ये इस बार पर तय करेगा कि वो किस दौर में फिर से जी उठेंगे। उस वक्त समाज की हालत कैसी होगी। इन सवालों के जवाब कोरी कल्पना ही है।
''क्रायोप्रेजर्वेशन'' के जरिए जिंदा होने वाले इंसान का तजुर्बा कैसा होगा, ये इस बात पर निर्भर करेगा कि वो मरने या जमा दिए जाने के कितने वक्त बाद फिर से जी उठेगा। कुछ लोग कहते हैं कि इसमे तीस से चालीस बरस लगेंगे। हो सकता है कि इतने वक्त बाद उस इंसान के जिंदा होने पर उसके पोते-पोती ही उसके स्वागत के लिए खड़े हों।
लेकिन, अगर फिर से जिंदा होने में सौ बरस या इससे ज्यादा वक्त लगेंगे तो कम से कम परिजन और रिश्तेदार तो उस शख्स को भूल चुके होंगे।
इन हालात से निपटने के लिए डेनिस कोवाल्सकी जैसे लोग खुद के अलावा अपनी बीवी और बच्चों को भी मरने के बाद ''क्रायोप्रेजर्वेशन'' में रखने का रजिस्ट्रेशन करा रहे हैं। ताकि कोई न कोई परिजन फिर से जिंदा हुए शख्स का स्वागत करने को तो हो।
लेकिन, अगर कोई परिजन नहीं भी होगा तो इतनी बुरी बात नहीं होगी। डेनिस कहते हैं कि आप किसी विमान से कहीं जा रहे हों। जिसमें आपके सारे परिजन-रिश्तेदार हों। विमान हादसे में सारे के सारे मारे जाएं, सिवा आपके। तो क्या आप खुदकुशी कर लेंगे? नहीं न! आप अपनी जिंदगी को फिर से पटरी पर लाने की कोशिश करेंगे।
तो ऐसा ही ''क्रायोप्रेजर्वेशन'' से फिर से जिंदा हुए लोग भी करेंगे। नए दोस्त बनाएंगे। नया घर बसाएंगे। परिवार बढ़ाएंगे। कुछ जानकार कहते हैं कि अगर ऐसे मर चुके लोग फिर से जिंदा होंगे और उनके पास कुछ नहीं होगा। तो, उन्हें दूसरों की मदद की जरूरत होगी। हालांकि सवाल वही कि उनकी मदद करेगा कौन?
इस सवाल के जवाब में लोगों को सर्द माहौल में रखने का काम करने वाली संस्थाएं कुछ पैसे बाजार में लगा रही हैं। ताकि भविष्य में अगर इंसान जिंदा हो तो उसकी मदद के लिए कुछ रकम तैयार हो।
हालांकि ये भी हो सकता है कि जब तक ये लोग जिंदा होंगे पैसे का अस्तित्व ही खत्म हो जाए। शायद उस वक्त लोगो को जीने के लिए काम करने की जरूरत ही न हो। तमाम बीमारियों से लड़कर जीतने का फन आ जाएगा। तो ऐसे समाज के लोगों को काम करने की जरूरत ही नहीं रहेगी। लोगों के रहने खाने का पर्याप्त इंतजाम होगा।
हालांकि ऐसे दौर में भी जिंदा होने वाले लोगों को दूसरी चुनौतियों का सामना करना होगा। जैसे बदले हुए दौर में खुद को एडजस्ट करने की चुनौती। समाज में फिर से अपनी जगह बनाने, सम्मान हासिल करने की चुनौती।
नए माहौल से तालमेल बिठाने में उन्हें बड़ी मुश्किल होगी। उन्हें अपने शरीर के साथ तालमेल बिठाने में भी दिक्कत हो सकती है। क्योंकि ''क्रायोप्रेजर्वेशन'' में तो सिर्फ दिमाग को जमाया जाएगा।
ऐसे लोग जिंदा होंगे तो खुद से सवाल करेंगे कि आखिर मैं हूं तो कौन?
हालांकि कुछ जानकार ये भी कहते हैं कि ये सब मामूली दिक्कतें हैं। क्योंकि एकदम अनजान माहौल में पैदा होकर भी इंसान, खुद को हर तरह से ढाल लेता है। डेनिस उन लोगों की मिसाल देते हैं जो गरीब देशों से अमीर मुल्कों में जाकर बसते हैं। वो एकदम अलग माहौल में खुद को ढाल ही लेते हैं।
हालांकि सवाल ये भी है कि पुराने दौर के लोग, नए जमाने के इंसानों के साथ कैसे तालमेल बिठाएंगे? क्योंकि बदलते दौर के साथ इंसान की सोच, उसके तजुर्बे एकदम अलग हो जाते हैं। अलग दौर के लोगों में तालमेल बिठाना बहुत मुश्किल होता है।
वैज्ञानिक कहते हैं कि ''क्रायोप्रेजर्वेशन'' से जिंदा लोगों के दौर में सौ दो सौ सालों का फर्क हुआ तो तालमेल बिठाना बहुद मुश्किल होगा। सब-कुछ इतना बदल जाएगा कि लगेगा कि हम किस दुनिया में आ गए आखिर।
ये भी हो सकता है कि दिमाग को फ्रीज करने से पहले उसमें आने वाले दौर की कुछ चीजें अंदाज से डाल दी जाएं। ताकि जब इंसान जिंदा हो तो उसे बदले दौर में तालमेल बिठाने में ज्यादा दिक्कत न हो।
अमर होना बड़ी चुनौती भी बन जाएगा। फिर से जिंदा हुए दिमाग का मतलब है कि मौत को हरा दिया जाना। मौत, इंसानों के अस्तित्व का अहम हिस्सा है। उसका खात्मा, नए सिरे से नए तरह के सवाल खड़े करेगा।
''क्रायोप्रेजर्वेशन'' से फिर से जिंदा किया गया इंसान क्या वाकई वही इंसान माना जाएगा जिसका वो दिमाग था। क्योंकि बदन तो बदल चुका होगा। तो वैसा ही इंसान फिर से जिंदा हो गया है, ये दावा करना ही गलत होगा।
इन तमाम सवालों के बावजूद बहुत से लोग फिर से जिंदा होने के विचार को एक मौका देने के हक में हैं। मरकर हमेशा के लिए गुमनाम होने से बेहतर तो यही है कि दिमाग के तौर पर ही सही, किसी का अस्तित्व तो रहेगा।
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कानूनी तौर पर ये सभी मर चुके हैं लेकिन अगर वो बोल सकते तो कहते कि उनके शरीर अभी लाश में तब्दील नहीं हुए हैं। डॉक्टरी जबान में कहें तो वो लोग सिर्फ बेहोश हुए हैं। किसी को नहीं मालूम कि इन लोगों को फिर से जिंदा किया जा सकता है या नहीं, लेकिन बहुत से लोग ये मानने लगे हैं कि मरकर हमेशा खत्म होने से ये बेहतर विकल्प है।
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अभी दुनिया में करीब 1250 ऐसे लोग हैं जो कानूनी तौर पर जिंदा हैं, वो ऐसी हालत में रखे जाने का इंतजार कर रहे हैं यानी क्रायोप्रेजर्वेशन का इंतजार कर रहे हैं। अमेरिका के अलावा ऑस्ट्रेलिया और यूरोप के दूसरे देशों में अब ऐसे केंद्र खोले जा रहे हैं, जहां लोगों के शरीर को बेहद सर्द माहौल में रखा जा रहा है। इस उम्मीद में कि शायद वो कभी जिंदा हो जाएं।
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अमेरिका के मिशीगन के क्रायोनिक्स इंस्टीट्यूट के डेनिस कोवाल्स्की कहते हैं किसी को जमा देना, मौत के बाद किसी इंसान के साथ होने वाली दूसरी सबसे बुरी घटना है। मिशीगन का ये इंस्टीट्यूट दुनिया की सबसे बड़ी क्रायोनिक्स सुविधा वाला केंद्र है।
डेनिस कहते हैं कि कोई भरोसे से नहीं कह सकता कि सर्द माहौल में जमा दिए गए ये लोग फिर से जी उठेंगे। लेकिन ये पक्के तौर पर कहा जा सकता है कि अगर मरने के बाद आप जला दिए गए या दफन कर दिए गए तो फिर कभी नहीं जी सकेंगे।
यूं तो ''डिमॉलिशन मैन'' या ''वनीला स्काई'' जैसी हॉलीवुड फिल्मों में इस संभावना को तलाशने की कोशिश की गई थी। बहुत से वैज्ञानिक ये मानते हैं कि किसी को बेहद सर्द माहौल में जमा देने के बाद उसे फिर से जिंदा किए जाने की संभावना है।
कुछ ऐसे तजुर्बे किए गए हैं। एक खरगोश के दिमाग को क्रायोनिक्स तकनीक से बेहद सर्द माहौल में रखा गया था। कई हफ्तों बाद भी दिमाग सुरक्षित था। हालांकि खरगोश का शरीर अभी भी मुर्दा था।हालांकि मरे हुए खरगोश का दिमाग फिर से चलाना और किसी मरे इंसान को जिंदा करने में बहुत फर्क है।
लेकिन, बहुत से वैज्ञानिक ये मानते हैं कि आगे चलकर, ''क्रायोप्रेजर्वेशन'' या किसी को बहुत की ठंडे माहौल में रखकर फिर से उसमें जान फूंकना, बेहद आम हो जाएगा। कुछ इस तरह जैसे लोग सर्दी-जुकाम का इलाज करते हैं।
अमरिका के कैलिफोर्निया में सेंस रिसर्च फाउंडेशन है। ये फाउंडेशन उम्र की वजह से होने वाली बीमारियों के बारे में रिसर्च करता है। इसकी प्रमुख ऑब्रे डे ग्रे कहती हैं कि ''क्रायोप्रेजर्वेशन'' एक तरह की दवा ही है।
मान लीजिए कि ''क्रायोप्रेजर्वेशन'' की वजह से कुछ लोग आगे चलकर जिंदा हो जाते हैं। तो उनके पास उस दौर में लोगों को सुनाने के लिए सिर्फ कहानियां नहीं होंगी। मगर उन्हें एक अजनबी दौर में अजनबियों के बीच अपनी जिंदगी की इमारत फिर से खड़ी करने की चुनौती होगी।
ये इस बार पर तय करेगा कि वो किस दौर में फिर से जी उठेंगे। उस वक्त समाज की हालत कैसी होगी। इन सवालों के जवाब कोरी कल्पना ही है।
''क्रायोप्रेजर्वेशन'' के जरिए जिंदा होने वाले इंसान का तजुर्बा कैसा होगा, ये इस बात पर निर्भर करेगा कि वो मरने या जमा दिए जाने के कितने वक्त बाद फिर से जी उठेगा। कुछ लोग कहते हैं कि इसमे तीस से चालीस बरस लगेंगे। हो सकता है कि इतने वक्त बाद उस इंसान के जिंदा होने पर उसके पोते-पोती ही उसके स्वागत के लिए खड़े हों।
लेकिन, अगर फिर से जिंदा होने में सौ बरस या इससे ज्यादा वक्त लगेंगे तो कम से कम परिजन और रिश्तेदार तो उस शख्स को भूल चुके होंगे।
इन हालात से निपटने के लिए डेनिस कोवाल्सकी जैसे लोग खुद के अलावा अपनी बीवी और बच्चों को भी मरने के बाद ''क्रायोप्रेजर्वेशन'' में रखने का रजिस्ट्रेशन करा रहे हैं। ताकि कोई न कोई परिजन फिर से जिंदा हुए शख्स का स्वागत करने को तो हो।
लेकिन, अगर कोई परिजन नहीं भी होगा तो इतनी बुरी बात नहीं होगी। डेनिस कहते हैं कि आप किसी विमान से कहीं जा रहे हों। जिसमें आपके सारे परिजन-रिश्तेदार हों। विमान हादसे में सारे के सारे मारे जाएं, सिवा आपके। तो क्या आप खुदकुशी कर लेंगे? नहीं न! आप अपनी जिंदगी को फिर से पटरी पर लाने की कोशिश करेंगे।
तो ऐसा ही ''क्रायोप्रेजर्वेशन'' से फिर से जिंदा हुए लोग भी करेंगे। नए दोस्त बनाएंगे। नया घर बसाएंगे। परिवार बढ़ाएंगे। कुछ जानकार कहते हैं कि अगर ऐसे मर चुके लोग फिर से जिंदा होंगे और उनके पास कुछ नहीं होगा। तो, उन्हें दूसरों की मदद की जरूरत होगी। हालांकि सवाल वही कि उनकी मदद करेगा कौन?
इस सवाल के जवाब में लोगों को सर्द माहौल में रखने का काम करने वाली संस्थाएं कुछ पैसे बाजार में लगा रही हैं। ताकि भविष्य में अगर इंसान जिंदा हो तो उसकी मदद के लिए कुछ रकम तैयार हो।
हालांकि ये भी हो सकता है कि जब तक ये लोग जिंदा होंगे पैसे का अस्तित्व ही खत्म हो जाए। शायद उस वक्त लोगो को जीने के लिए काम करने की जरूरत ही न हो। तमाम बीमारियों से लड़कर जीतने का फन आ जाएगा। तो ऐसे समाज के लोगों को काम करने की जरूरत ही नहीं रहेगी। लोगों के रहने खाने का पर्याप्त इंतजाम होगा।
हालांकि ऐसे दौर में भी जिंदा होने वाले लोगों को दूसरी चुनौतियों का सामना करना होगा। जैसे बदले हुए दौर में खुद को एडजस्ट करने की चुनौती। समाज में फिर से अपनी जगह बनाने, सम्मान हासिल करने की चुनौती।
नए माहौल से तालमेल बिठाने में उन्हें बड़ी मुश्किल होगी। उन्हें अपने शरीर के साथ तालमेल बिठाने में भी दिक्कत हो सकती है। क्योंकि ''क्रायोप्रेजर्वेशन'' में तो सिर्फ दिमाग को जमाया जाएगा।
ऐसे लोग जिंदा होंगे तो खुद से सवाल करेंगे कि आखिर मैं हूं तो कौन?
हालांकि कुछ जानकार ये भी कहते हैं कि ये सब मामूली दिक्कतें हैं। क्योंकि एकदम अनजान माहौल में पैदा होकर भी इंसान, खुद को हर तरह से ढाल लेता है। डेनिस उन लोगों की मिसाल देते हैं जो गरीब देशों से अमीर मुल्कों में जाकर बसते हैं। वो एकदम अलग माहौल में खुद को ढाल ही लेते हैं।
हालांकि सवाल ये भी है कि पुराने दौर के लोग, नए जमाने के इंसानों के साथ कैसे तालमेल बिठाएंगे? क्योंकि बदलते दौर के साथ इंसान की सोच, उसके तजुर्बे एकदम अलग हो जाते हैं। अलग दौर के लोगों में तालमेल बिठाना बहुत मुश्किल होता है।
वैज्ञानिक कहते हैं कि ''क्रायोप्रेजर्वेशन'' से जिंदा लोगों के दौर में सौ दो सौ सालों का फर्क हुआ तो तालमेल बिठाना बहुद मुश्किल होगा। सब-कुछ इतना बदल जाएगा कि लगेगा कि हम किस दुनिया में आ गए आखिर।
ये भी हो सकता है कि दिमाग को फ्रीज करने से पहले उसमें आने वाले दौर की कुछ चीजें अंदाज से डाल दी जाएं। ताकि जब इंसान जिंदा हो तो उसे बदले दौर में तालमेल बिठाने में ज्यादा दिक्कत न हो।
अमर होना बड़ी चुनौती भी बन जाएगा। फिर से जिंदा हुए दिमाग का मतलब है कि मौत को हरा दिया जाना। मौत, इंसानों के अस्तित्व का अहम हिस्सा है। उसका खात्मा, नए सिरे से नए तरह के सवाल खड़े करेगा।
''क्रायोप्रेजर्वेशन'' से फिर से जिंदा किया गया इंसान क्या वाकई वही इंसान माना जाएगा जिसका वो दिमाग था। क्योंकि बदन तो बदल चुका होगा। तो वैसा ही इंसान फिर से जिंदा हो गया है, ये दावा करना ही गलत होगा।
इन तमाम सवालों के बावजूद बहुत से लोग फिर से जिंदा होने के विचार को एक मौका देने के हक में हैं। मरकर हमेशा के लिए गुमनाम होने से बेहतर तो यही है कि दिमाग के तौर पर ही सही, किसी का अस्तित्व तो रहेगा।