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क्या कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी के पास जादू की छड़ी है, जिसे घुमाते ही पार्टी में जान डाल देंगी?

Thu, 05 Sep 2019 07:30 PM IST
Harendra Chaudhary शशिधर पाठक, अमर उजाला
शशिधर पाठक, अमर उजाला Published by: Harendra Chaudhary Updated Thu, 05 Sep 2019 07:30 PM IST
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How the congress president sonia gandhi to strength the party, party leaders should learn from BJP
कांग्रेस दफ्तर

हरियाणा, झारखंड और महाराष्ट्र विधानसभा के चुनाव सिर पर हैं। भाजपा अध्यक्ष अमित शाह के हौसले बुलंद हैं, वहीं कांग्रेस पार्टी संगठन की अंदरूनी लड़ाई में ही उलझी है। कांग्रेस पार्टी के एक पूर्व महासचिव और सोनिया गांधी के करीबी रहे एक सूत्र का कहना है कि क्या सोनिया गांधी के पास कोई जादू की छड़ी है? वरिष्ठ नेता का कहना है कि पहली जिम्मेदारी कांग्रेस के नेताओं की बनती है। वरिष्ठ और कनिष्ठ नेता दोनों कई राज्यों में अपनी मर्यादा लांघ रहे हैं। वह बताते हैं कि महाराष्ट्र, हरियाणा, झारखंड, दिल्ली, म.प्र. समेत कई राज्यों में पार्टी संक्रमण के दौर से गुजर रही है।

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न जादू की छड़ी है, न संजीवनी बूटी

कांग्रेस अध्यक्ष के पास न तो संजीवनी बूटी है और न ही जादू की छड़ी। उनके अध्यक्ष पद की कमान संभालेने के बाद पार्टी नेताओं का भरोसा बढ़ा है, इसलिए पार्टी के भीतर भगदड़ कम हो गई है। लेकिन चुनौतियां विकराल रूप लिए खड़ी है। कभी पार्टी के रणनीतिकारों में गिने जाने वाले कांग्रेस की कार्यकारिणी के एक सदस्य का कहना है कि इस समय पार्टी में शीर्ष स्तर के बड़े प्रयास किए जाने की जरूरत है। कांग्रेस अध्यक्ष को भी कुछ कड़े निर्णय लेने होंगे। यह समय जोखिमभरे कदम उठाने का है, लेकिन दुर्भाग्य से कड़े निर्णय लेने के बाद की जिम्मेदारी संभालने के लिए उनका स्वास्थ्य तैयार नहीं है।

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एकजुट नहीं कर सके राहुल गांधी

कांग्रेस पार्टी में धार नेताओं की एकजुटता से ही आ सकती है। कांग्रेस मुख्यालय स्थित एक विभाग के प्रमुख का कहना है कि पूर्व कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने एकजुटता के लिए खूब हाथ-पैर पटके लेकिन सफलता नहीं पा सके। सूत्रों का कहना है कि आप इसे राहुल गांधी की असफलता भी कह सकते हैं। उनके इस्तीफा देने तक म.प्र., दिल्ली, हरियाणा, महाराष्ट्र, कर्नाटक, राजस्थान समेत कई राज्यों में पार्टी के नेताओं के भीतर काफी टकराव बढ़ गया। राहुल गांधी की तमाम कोशिश के बाद भी इन राज्यों में नेताओं टकराव बढ़ता ही रहा। दिल्ली में अजय माकन-शीला दीक्षित, म.प्र. में दिग्विजय सिंह-कमलनाथ-ज्योतिरादित्य सिंधिया, पंजाब में कैप्टन अमरिंदर सिंह-नवजोत सिंह सिद्धू, राजस्थान में सचिन पायलट-अशोक गहलोत, हरियाणा में भूपेन्द्र हुड्डा-अशोक तंवर-शैलजा-रणदीप सुरजेवाला के बीच तनातनी चलती रही।

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न जाने पाए बिखराव का संदेश

1989 के आम चुनाव में कांग्रेस पार्टी के प्रचार अभियान में अहम भूमिका निभाने वाले नेता का कहना है कि राजनीतिक पार्टी में बिखराव का संदेश नहीं जाना चाहिए। इससे कार्यकर्ता प्रभावित होता है, जिसका खामियाजा राजनीतिक दल को भुगतना पड़ता है। सूत्र कहते हैं कि 1996 में कांग्रेस को इसी का नुकसान हुआ था। 2003 तक कांग्रेस इसी तरह के राजनीतिक संकटों में उलझी हुई थी। लेकिन 2003 में कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी ने पूरी पार्टी में एकजुटता का संदेश देकर पार्टी में जान डाल दी थी। गुडगांव में रह रहे सूत्र का कहना है कि सोनिया गांधी को नेता और जनता दोनों का समर्थन मिला है। कांग्रेस पार्टी की इस मजबूती के कारण ही कांग्रेस विपक्षी एकता को भी खड़ा कर सकी थी।

भाजपा से लें अनुशासन की सीख

बनारस से जुड़े कांग्रेस के एक नेता नाम न प्रकाशित करने की शर्त पर कहते हैं कि बिना अनुशासन के राजनीतिक दल नहीं चल सकता। आप भाजपा का उदाहरण सामने है, तमिलनाडु से लेकर जम्मू-कश्मीर तक भाजपा नेता प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और भाजपा अध्यक्ष अमित शाह की ताल पर चल रहे हैं। लेकिन कांग्रेस के नेता इससे कोई सीख नहीं ले रहे हैं। सूत्रों का कहना है कि उन्होंने अपनी चिंताओं से कांग्रेस पार्टी के शीर्ष नेताओं को अवगत करा दिया है।



लोकसभा में कांग्रेस पार्टी के एक सांसद का कहना है कि हमारे नेता अधीर रंजन चौधरी सदन में क्या बोलते हैं, बाहर क्या बोलते हैं, सोचिए? पार्टी का बौद्धिक वर्ग टकरा रहा है। शशि थरुर, जयराम रमेश, आनंद शर्मा के बयानों का तालमेल देखिए? आखिर हम किस सूरत में यह मान लेते हैं कि इसके बाद भी जनता साथ देगी। आखिर इससे बुरा क्या होगा कि हमारे राज्यसभा सदस्य तक पार्टी छोड़कर भाजपा में चले गए?

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