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Hindi News ›   India News ›   How Naib Subedar became natural shooter This is how the dream of Siachen to Olympics 2024 came true with Daag

Exclusive: कैसे नायब सूबेदार बना 'नेचुरल शूटर'? 'दाग' के साथ सियाचिन से ओलंपिक 2024 तक का सपना ऐसे हुआ साकार

Tue, 21 May 2024 07:00 PM IST
Harendra Chaudhary हरेंद्र चौधरी
Updated Tue, 21 May 2024 07:00 PM IST
सार

अपने सफर के बारे में बताते हुए संदीप कहते हैं कि पंजाब के फरीदकोट के पास बहबल खुर्द गांव में पले-बढ़े और सेना में भर्ती की चाह में वे एक क्रॉस-कंट्री एथलीट बन गए। जन्म बेहद गरीब परिवार में हुआ।

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How Naib Subedar became natural shooter This is how the dream of Siachen to Olympics 2024 came true with Daag
नायब सूबेदार संदीप सिंह - फोटो : Amar Ujala

विस्तार

भारतीय सेना में नायब सूबेदार संदीप सिंह ने कभी सोचा नहीं था कि जिंदगी उन्हें क्रॉस-कंट्री एथलीट से सीधे शूटिंग का चैंपियन बना देगी। बचपन से ही गांव की सड़कों पर दौड़ लगाते-लगाते संदीप सेना में भर्ती हो गए और यहां सेना ने उन्हें वह 'शौक' दिया, जिसने उन्हें शूटिंग का दुनिया का 'नेचुरल शूटर' बना दिया। पिछले हफ्ते भोपाल के मध्यप्रदेश शूटिंग रेंज में पेरिस ओलंपिक 2024 के लिए शूटिंग ओलंपिक सिलेक्शन ट्रायल का फाइनल हुआ, जिसे संदीप बेहद कम 'दबाव' के साथ क्वालीफाई कर गए। आमतौर पर शूटिंग जैसे खेलों में खिलाड़ियों के ऊपर जबरदस्त मानसिक दबाब होता है, लेकिन संदीप के साथ ऐसा नहीं था। उनके ऊपर बस एक ही दबाव था कि उनके करियर पर लगा 2019 का 'दाग' मिट जाए, ताकि वे लोगों को मुंह बंद कर सकें। 

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'मेरे पास खोने के लिए कुछ नहीं था'
अमर उजाला से खास बातचीत में 28 वर्षीय नायब सूबेदार संदीप सिंह बताते हैं कि भारतीय ओलंपिक टीम में जब जगह बनाने की बात आती है, तो अच्छे-अच्छे खिलाड़ियों का 'पसीना' छूट जाता है। लेकिन जब वे पुरुषों की 10 मीटर एयर राइफल श्रेणी में शूटिंग ओलंपिक सिलेक्शन का ट्रायल दे रहे थे, तो वे बड़ी इत्मीनान में थे। संदीप के मुताबिक वह शूटिंग के दौरान ओलंपिक के बारे में बिल्कुल भी नहीं सोच रहे थे। "मेरे पास खोने के लिए कुछ नहीं था और इसलिए दिमाग पर कोई दबाव भी नहीं था। मैं बस अपना काम करना चाहता था और उसे अच्छे से करना चाहता था। मुझे किसी और की परवाह नहीं थी। लेकिन मुझे लगता है कि मैं कुछ ज्यादा ही निश्चिंत हो गया हूं। आपको थोड़े से दबाव की जरूरत होती है। बहुत कम दबाव भी बहुत अच्छा नहीं है।
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संदीप बताते हैं कि इस ट्रायल में उन्हें 628.3 का स्कोर हासिल हुआ। इससे पहले भोपाल में हुए ट्रायल में उन्हें 631.6 का स्कोर हासिल किया था। जबकि दिल्ली में हुए ट्रायल में उन्हें 634.4 और 632.6 का स्कोर मिला। पेरिस ओलंपिक 2024 में अपनी जगह बनाने के लिए उन्होंने ओलंपिक कोटा विजेता अर्जुन बाबुता और वर्ल्ड चैंपियन रुद्राक्ष पाटिल, दोनों को पीछे छोड़ दिया। लेकिन यह तक पहुंचना इतना आसान नहीं था। अब चारों ट्रायल का स्कोर मिला कर फाइनल सिलेक्शन होगा।
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मजदूरी करते हैं पिता
अपने सफर के बारे में बताते हुए संदीप कहते हैं कि पंजाब के फरीदकोट के पास बहबल खुर्द गांव में पले-बढ़े और सेना में भर्ती की चाह में वे एक क्रॉस-कंट्री एथलीट बन गए। जन्म बेहद गरीब परिवार में हुआ। पिता बलजिंदर सिंह मजदूरी करते हैं, उन्हें तो शूटिंह के बारे में दूर-दूर तक नहीं पता था। गांव में बस फौज में भर्ती होने की कहानियां सुनते आए हैं। 2014 में भारतीय सेना की सिख लाइट इन्फैंट्री में एक सिपाही के तौर पर भर्ती हो गया। लेकिन एक एथलीट के रूप में उनका करियर जल्द ही खत्म हो गया। यहां सेना ने उन्हें शूटिंग की प्रैक्टिस शुरू करने के लिए कहा। वह कहते हैं, “किसी ने मुझसे मेरी राय नहीं पूछी। आते ही मुझे गोली मार दी।" (उन्होंने मुझे तुरंत शूटिंग में लगा दिया)। मैं उस समय सिर्फ 18 साल का था, मेरा शूटिंग में मन नहीं लगता था। लेकिन मैंने मेहनत करनी शुरू की और कुछ ही महीनों में मैंने स्टेट चैंपियनशिप जीती और दो साल में मैंने नेशनल चैंपियनशिप में कांस्य पदक जीता। वह बताते हैं, एक बार जब वह शूटिंग शुरू कर देते हैं, तो उनका ध्यान भटकता नहीं है। उनका फोकस केवल अपनी राइफल पर होता है। वह कहते हैं कि उनके कोच और साथी उन्हें 'नेचुरल शूटर' के नाम से बुलाते हैं। 

ओलंपिक रिजर्व टीम का हिस्सा भी बने
वह बताते हैं कि इसके बाद उन्होंने महू में होने वाली यंग ब्लड चैंपियनशिप में सिल्वर मेडल जीता और 2018 में उन्होंने नेशनल चैंपियनशिप में उन्हें गोल्ड मेडल मिला। जिसके बाद उन्हें 2018 में ही सेना में प्रमोशन भी मिला। 2020 में वे शूटिंग में ओलंपिक की रिजर्व टीम का हिस्सा भी बने। वह कहते हैं, शूटिंग एक ऐसा खेल है जहां आपको बिल्कुल स्थिर रहना पड़ता है। मुझे धीरे-धीरे इसकी आदत पड़ रही थी। अब एक नौजवान लड़के से आप इससे ज्यादा क्या ही उम्मीद कर सकते हो। वह कहते हैं कि मुझे निशानेबाजी में मानसिक रूप से मजबूत होना था, मैं दोबारा से एथलीट नहीं बनना चाहता था। पहले मुझे गुस्सा आता था, तो मैं इसे मैदान पर उतार देता था, लेकिन अब ऐसा हीं कर सकता था। क्योंकि मुझे शांत रहना था। 

डोप टेस्ट में हुए फेल
लेकिन जिंदगी हमेशा एक जैसी नहीं चलती। कुछ सरप्राइजेज भी मिलते हैं। संदीप बताते हैं कि 2020 में वे अपने गांव गए हुए थे, आते ही उनका डोप टेस्ट हुआ। वे उसमें फेल हो गए। संगी-साथियों ने मुंह मोड़ लिया। पीठ पीछे लोग कहते थे कि ड्राग्स लेकर शूटिंग करता है, इसलिए जीतता है। वह कहते हैं कि यह पल बेहद हताशा भरे थे। वह कहते हैं कि मुझे यह भी नहीं पता का कि मेरे केस की सुनवाई कहां होगी। यह भी नहीं पता था कि मुझे एक वकील लाना होगा। किसी ने मेरा साथ नहीं दिया। मुझे विश्वास ही नहीं हो रहा था कि मेरे साथ क्या हुआ। डेढ़ साल तक मैंने केस लड़ा। इसी बीच मुझे महू में आर्मी मार्क्समैनशिप यूनिट से बर्खास्त कर दिया गया, जहां मैं ट्रैनिंग ले रहा था। 

दो साल तक नहीं कर पाया था शूटिंग
वह बताते हैं कि 2021 में मुझे वापस अपनी यूनिट सिख लाइट इन्फैंट्री में भेज दिया गया, जो उस समय सियाचिन में तैनात थी। लेकिन वहां मेरा मन नहीं लगता था। मैंने अपने अफसरों से कहा कि मुझे शूटिंग करनी है, मुझे वापस जाना है। सियाचिन में वरिष्ठ अफसर को लगा कि उनके स्किल्स का उपयोग हिमालय के बर्फीले कचरे के बजाय शूटिंग रेंज में बेहतर किया जा सकता है। संदीप बताते हैं, मुझे दिल्ली में ट्रेनिंग के लिए वापस भेज दिया गया। उन्हें लगा कि मैं एक अच्छा निशानेबाज बन सकता हूं, क्योंकि मेरे पास राष्ट्रीय पदक था। लेकिन मुझे यकीन नहीं था कि मैं तालमेल कैसे बिठा पाऊंगा क्योंकि डोप टेस्ट में फेल होने के बाद मैंने लगभग दो साल तक शूटिंग नहीं की थी। वह बताते हैं कि उन्हें अटैचमेंट कर दिया गया। नई दिल्ली में एयर फोर्स शूटिंग रेंज में अपने पहले क्वालिफिकेशन राउंड में 636 का स्कोर किया और जो कभी-कभी 637 से 640 तक भी पहुंच गया। 

दिन में ड्यूटी, रात को प्रैक्टिस
वह कहते हैं कि इस ब्रेक ने मुझे एक बेहतर निशानेबाज बना दिया। मुझे सिख ली के यूपी स्थित फतेहगढ़ सेंटर बुला लिया गया। यहां मैं दिन में ड्यूटी करता और रात को प्रैक्टिस करता था। इसी बीच मुझे केरल में हुई कुमार सुरेंद्र सिंह शूटिंग मुकाबले में हिस्सा लिया, जहां मुझे गोल्ड मिला। वह कहते हैं, जब मैंने पिछले साल राष्ट्रीय खेलों में शूटिंग की, तो मैंने कांस्य पदक जीता, इससे मेरा आत्मविश्वास और भी बढ़ गया। आखिरकार मेरी फिर से राष्ट्रीय टीम में एंट्ररी हो गई और मैंने 630 से ऊपर स्कोर करना जारी रखा। मुझे नहीं पता कि इतने लंबे समय तक ट्रेनिंग से दूर रहने के बाद भी मेरे स्कोर इतने ऊंचे कैसे हैं। उन्हें पहली बार राष्ट्रीय टीम के लिए 2023 में रियो डी जनेरियो में हुए वर्ल्ड कप में उन्हें आठवां स्थान मिला। इसी साल जनवरी में हुई जकार्ता चैंपियनशिप में उन्हें दूसरा स्थान मिला। इस साल की शुरुआत में उनका क्वालीफिकेशन स्कोर 633.4 था। वहीं इजिप्ट चैंपियनशिप में उन्हें 7वां स्थान मिला, तो इस साल फरवरी में हुई स्पेन चैंपियनशिप में वे 14वें स्थान पर रहे।  


उस खाली फ्रेम में लिखना चाहता हूं अपना नाम
संदीप कहते हैं कि उन्होंने अभी तक अपने माता-पिता को अपनी हाल की उपलब्धियों के बारे में नहीं बताया है। वे यह भी नहीं जानते कि ओलंपिक क्या होते हैं। उन्हें बस इतना पता है कि मैं फौज में हूं। लेकिन जब मेरा ओलंपिक में चयन होगा, तो मैं उन्हें कुछ दिनों में बताऊंगा। वह कहते हैं कि जब मैं शूटिंग करता हूं, तो किसी की नहीं सुनता। बस अपने मन की करता हूं। जहां मैं महू में आर्मी मार्क्समैनशिप यूनिट में ट्रेनिंग लेता हूं, वहां एक कमरा है जहां ओलंपिक में हिस्सा लेने वाले सेना के शूटरों की फ्रेम मढ़ी तस्वीरें हैं और वहां एक खाली फ्रेम है जिस पर 'आपका नाम यहां' लिखा है। अब मैं वहां अपना नाम चाहता हूं।

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