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2012 के UGC नियमों से कितने अलग 2026 के नियम: नए दिशा-निर्देशों और पुराने में क्या अंतर; विरोध क्यों हुआ?

Fri, 30 Jan 2026 08:20 PM IST
संध्या स्पेशल डेस्क, अमर उजाला
स्पेशल डेस्क, अमर उजाला Published by: संध्या Updated Fri, 30 Jan 2026 08:20 PM IST
सार

विश्वविद्यालय कैंपसों में भेदभाव खत्म करने के लिए अगर 2012 में नियम मौजूद थे तो नए नियम लाने की जरूरत क्यों पड़ी? दोनों नियमों में क्या अंतर है? क्या वाकई इन नियमों में सामान्य वर्ग की अनदेखी की गई थी? शैक्षणिक संस्थानों में भेदभाव के आंकड़े क्या हैं? आइये जानते हैं...

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how 2012 UGC equity guidelines different from 2026 regulations explained news
यूजीसी - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

यूजीसी की तरफ से उच्च शिक्षण संस्थानों में इसी महीने के मध्य में ‘समता विनियम 2026’ लाया गया। यूजीसी ने इसके तहत दिए गए दिशा-निर्देशों के जरिए शिक्षण संस्थानों में जाति आधारित भेदभाव को खत्म करने का लक्ष्य रखा। हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने अब इन नियमों पर रोक लगा दी। सुप्रीम कोर्ट ने इन नियमों पर सवाल उठाए, साथ ही इसे लेकर यूजीसी को नोटिस भी जारी किया। 

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गौरतलब है कि यूजीसी इन नियमों को 13 जनवरी 2026 को लेकर आई। इन नियमों में सामान्य वर्ग को छोड़कर बाकी वर्गों के छात्रों को सुरक्षा देने के लिए कठोर नियम तय किए गए। इसी मुद्दे को लेकर सामान्य वर्ग के लोगों ने नियमों का गलत इस्तेमाल होने के डर जताया और इसे वापस लेने के लिए विरोध प्रदर्शन किया। इस तरह का एक नियम 2012 में मौजूद था, लेकिन उसे हटाकर यूजीसी ये नियम लेकर आई थी।

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सामान्य वर्ग ने नियमों को लेकर क्या आरोप लगाया?

जातिगत आधारित भेदभाव से पीड़ितों के रूप में केवल एससी, एसटी और ओबीसी को ही परिभाषित किया गया है। सामान्य वर्ग को बाहर रखने का मतलब वे केवल उत्पीड़क करने वाली श्रेणी में रहेंगी। शिकायतकर्ता से उत्पीड़न का कोई सबूत नहीं मांगा जएगा। बल्कि जिस पर आरोप लगा है उसे ही खुद को निर्दोष साबित करना होगा। चाहे उस पर लगे आरोप झूठे ही क्यो न हो। 

झूठी शिकायतों पर कोई कार्रवाई का प्रावधान नहीं था। इसका मतलब है कि लोगों को बिना किसी डर के झूठी शिकायत दर्ज करने की खुली छूट दी गई थी। 

शिकायतों पर कार्रवाई के लिए बहुत कम समय होगा। पूरी बात का मतलब ये है कि सामान्य वर्ग को इन नियमों में केवल उत्पीड़क माना गया था। इसी के कारण सामान्य वर्ग ने ‘ROLLBACK UGC’ नाम से विरोध प्रदर्शन किया। 



लेकिन सवाल ये है कि अगर 2012 में नियम मौजूद थे तो नए नियम लाने की जरूरत क्यों पड़ी, दोनों नियमों में क्या अंतर है, क्या वाकई इन नियमों में सामान्य वर्ग की अनदेखी की गई थी, शैक्षणिक संस्थानों में भेदभाव के आंकड़े क्या है चलिए जानते हैं….

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यूजीसी के 2012 और 2026 के नियमों में क्या अंतर?

1. भेदभाव की परिभाषा 

2012 के नियमों में 3(1)(e) में सिर्फ भेदभाव की परिभाषा की गई थी। जिसमें जाति, धर्म, भाषा, नस्ल, लिंग, विकलांगता के आधार पर किसी के भी साथ भेदभाव न करने का प्रावधान था। इसमें किसी भी जाति का नाम या उसे परिभाषित नहीं किया गया था। 

2026 के नियमों में 'भेदभाव' (सेक्शन 3(1)(e)) और 'जाति-आधारित भेदभाव' (सेक्शन 3(1)(c)) को अलग-अलग परिभाषित किया गया है। जाति आधारित भेदभाव में अनुसूचित जातियों, अनुसूचित जनजातियों और अन्य पिछड़े वर्गों को रखा गया है। मतलब इनमें से किसी के भी साथ भेदभाव के जातिगत भेदभाव माना जाएगा। 

(सेक्शन 3(1)(e)) में भेदभाव की परिभाषा करते हुए कहा गया है कि किसी भी छात्र, फैकल्टी मेंबर, स्टाफ, और मैनेजिंग कमेटी के सदस्य, के साथ धर्म, नस्ल, जाति, लिंग, जन्म स्थान, विकलांगता के आधार पर भेदभाव नहीं किया जा सकता। 

2012 के नियम एससी एसटी छात्रों को शामिल किया गया था। लेकिन इसमें विशेष रूप से ओबीसी यानी अन्य पिछड़ा वर्ग का जिक्र नहीं था। 


2. शिकायत निवारण केंद्रों में बदलाव 

2012 के नियमों में केवल एक समान अवसर सेल बनाया गया था। इसके द्वारा किसी किसी भी तरह के भेदभाव की शिकायत के देखा जाना था। इसमें एक अधिकारी को नियुक्त किया गया था। ये अधिकारी किसी भी विश्वविद्यालय में प्रोफेसर के पद से नीचे नहीं होना चाहिए था। किसी कॉलेज के मामले में यह एसोसिएट प्रोफेसर के पद से नीचे का नहीं होना चाहिए था। इनमें सेल की बनावट और कामों, या भेदभाव की स्थिति में अपनाई जाने वाली प्रक्रिया के बारे में कुछ नहीं बताया गया था। 

2026 में समान अवसर केंद्र अनिवार्य किए गए हैं, जिनमें 'इक्विटी कमेटियां' होंगी, जिनमें ओबीसी, दिव्यांग व्यक्ति, एससी, एसटी और महिलाओं का प्रतिनिधित्व होना चाहिए। इस नियमों में शिकायतों के बाद ये कैसे काम करेंगे इसका भी जिक्र किया गया है। संस्थानों को इक्विटी हेल्पलाइन, इक्विटी स्क्वॉड और इक्विटी एंबेसडर भी बनाए गए हैं। 


3. दायरा बढ़ाया गया 

2012 में भेदभाव के उपाय पूरी तरह से छात्रों के हित में केंद्रित थे। ये छात्रों को जाति, पंथ, धर्म, भाषा, नस्ल, लिंग और विकलांगता से जुड़े भेदभाव से बचाने पर ध्यान केंद्रित करते थे। 2012 के इन नियमों में केवल छात्रों को किसी भी तरह के भेदभाव से बचाने पर ध्यान देना था। 

2026 के उपाय सभी स्टेकहोल्डर्स को शामिल करने के लिए बढ़ाए गए हैं, जिसका मतलब है कि ये छात्रों, फैकल्टी मेंबर्स और स्टाफ सभी पर लागू होते हैं। 2026 में इसके दायरे को बढ़ाकर इसमें अध्यापकों कर्मचारियों को भी शामिल किया गया है। 
 

4. भेदभाव के क्षेत्रों का विवरण

2012 के नियमों में इस चीज को काफी विस्तार के बताया गया था कि कहां कहां भेदभाव नहीं करना है। इसमें दाखिले के दौरान आरक्षण नीति का उल्लंघन, दाखिले के प्रोसेस में भेदभाव, वंचित छात्रों को मिलने वाले फायदों को मना करना, छात्रों का जाति, धर्म और क्षेत्र का नाम बताया, कक्षा में कमजोर प्रदर्शन को लेकर छात्रों की जाति, सामाजिक, क्षेत्रीय, नस्लीय या धार्मिक पृष्ठभूमि से जोड़कर आपत्तिजनक टिप्पणियां करना, छात्रों के लिए अलग-अलग बैठने की व्यवस्था तय करना, परीक्षा उत्तर पुस्तिकाओं के मूल्यांकन में पक्षपात करना, हॉस्टल, मेस और कॉमन रूम जैसी सुविधाओं में भेदभावपूर्ण व्यवहार करना तथा छात्रों के कुछ समूहों को विशेष रूप से निशाना बनाकर रैगिंग पर सख्त नियम शामिल थे। 

लेकिन 2026 में इन भेदभाव के इस रूपों को विस्तृत परिभाषित नहीं किया गया है। इन नियमों में 'समान अवसर केंद्र' को ऐसे कामों की एक उदाहरण सूची तैयार करने और फैलाने का काम सौंपते हैं जिन्हें भेदभाव माना जाएगा। इसमें केवल हॉस्टल, कक्षा या मेंटरशिप ग्रुप के लिए कोई भी चुनाव या आवंटन प्रक्रिया निष्पक्ष, पारदर्शी और पूरी तरह से भेदभाव रहित होने का बात की गई है। 

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अगर 2012 में नियम मौजूद थे तो नए नियम लाने की जरूरत क्यों पड़ी?

यूजीसी के मुताबिक, इन नियमों को लागू करने के पीछे राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 के मकसद को पूरा करना है। यह नियम राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 के उस दृष्टिकोण पर आधारित है जो 'पूर्ण समता और समावेशन' को सभी शैक्षिक निर्णयों की आधारशिला मानता है।

यूजीसी का कहना है कि इन नियमों से यह सुनिश्चित करने में मदद मिलेगी कि वंचित छात्र शिक्षा प्रणाली में बिना किसी डर के बेहतर प्रदर्शन कर सकें। इन नियमों का प्राथमिक उद्देश्य अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति , सामाजिक और शैक्षिक रूप से पिछड़े वर्गों और आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों के सदस्यों के खिलाफ भेदभाव को खत्म करना है। 

ये नियम राधिका वेमुला और आबिदा सलीम तड़वी द्वारा दायर जनहित याचिका के बाद तैयार किए गए हैं। इन दोनों ने अपने बच्चों को कॉलेज में जाति-आधारित भेदभाव के कारण खो दिया था। समर्थकों का तर्क है कि ऐसे नियम भविष्य में ऐसी त्रासदियों को रोकने के लिए जरूरी हैं। ये घटनाएं 2016 और 2019 में हुई थी। 

क्या वाकई इन नियमों में सामान्य वर्ग की अनदेखी की गई थी?

इस बीच चीफ जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्या बागची की बेंच ने फिलहाल यूजीसी के नए नियमों पर रोक लगा दी। कोर्ट ने कहा कि भेदभाव की परिभाषा और ज्यादा समावेशी होनी चाहिए। 2026 के रेगुलेशन में भेदभाव की भाषा अस्पष्ट है। कोर्ट ने कहा कि उसे यह देखना होगा कि नए नियम समानता के अधिकार के हिसाब से सही हैं या नहीं।

मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने कहा कि हमें जातिविहीन समाज की ओर बढ़ना चाहिए या हम पीछे जा रह हैं। जस्टिस सूर्यकांत ने कहा कि क्या हम उल्टी दिशा में जा रहे। जिन्हें सुरक्षा चाहिए, उनके लिए व्यवस्था होनी चाहिए।

सुप्रीम कोर्ट ने पूछे सवाल

सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई के दौरान यूजीसी से पूछा कि क्या 2026 के इन नियमों में ‘जाति-आधारित भेदभाव’ को अलग से परिभाषित करना सही और जरूरी है, जब इन नियमों में ऐसे भेदभाव से निपटने के लिए कोई अलग प्रक्रिया तय नहीं की गई है? खासकर तब, जब नियम 3(ई) में भेदभाव की एक व्यापक परिभाषा पहले से दी गई है, जिसमें सभी तरह के भेदभाव शामिल हैं।

क्या इन विवादित नियमों में ‘जाति-आधारित भेदभाव’ को लागू करने से अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और अन्य पिछड़ा वर्ग की सबसे पिछड़ी जातियों के लिए बने मौजूदा संवैधानिक और कानूनी वर्गीकरण पर कोई असर पड़ेगा? 

क्या विवादित विनियमों के ढांचे में भेदभाव के एक विशिष्ट रूप के रूप में "रैगिंग" शब्द का उल्लेख न करना, जबकि यह विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (उच्च शिक्षा संस्थानों में समानता को बढ़ावा देना) विनियम, 2012 में मौजूद है? क्या से गलती नहीं है? अगर है तो क्या इससे न्याय तक पहुंच मुश्किल नहीं होगी। 

 

शैक्षणिक संस्थानों में भेदभाव के आंकड़े

यूजीसी ने सुप्रीम कोर्ट में  यूनिवर्सिटी और कॉलेजों में जाति के आधार पर भेदभाव की शिकायतों कों लेकर एक डाटा दिया था। इस डाटा में 2019 से 2024 तक के आंकड़ें दिए गए थे। इस रिपोर्ट में सामने आया कि पांच वर्षों में लगातार शिकायतों के आंकड़े 118.4 प्रतिशत बढ़े। 

  • 2019-20 और 2023-24 के बीच, यूजीसी को 704 यूनिवर्सिटी और 1,553 कॉलेजों में समान अवर सेल और एससी/एसटी सेल से 1,160 शिकायतें मिलीं।
  • 1,052 शिकायतों में 90.68% को निपटा लिया गया था। हालांकि, पेंडिंग मामलों की संख्या 2019-20 में 18 से बढ़कर 2023-24 में 108 हो गई।


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