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Exclusive: मानव तस्करी रोकने के लिए गृह मंत्रालय और राज्यों में नहीं है तालमेल, कैसे गठित होंगी 800 एंटी ह्यूमन ट्रैफिकिंग यूनिट
Mon, 04 Jan 2021 08:09 PM IST
Harendra Chaudhary
जितेंद्र भारद्वाज, अमर उजाला, नई दिल्ली
जितेंद्र भारद्वाज, अमर उजाला, नई दिल्ली
Published by: Harendra Chaudhary
Updated Mon, 04 Jan 2021 08:09 PM IST
सार
देश में मानव तस्करी से जुड़े मामलों में संवेदनशीलता से काम हो सके, इसके लिए मंत्रालय ने राज्यों से तीन स्तरीय इकाई गठित करने के लिए कहा है। राज्य स्तर पर एडीजी रैंक के अधिकारी मानव तस्करी के मामलों की जांच पर नजर रखेंगे...
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मानव तस्करी निरोधक शाखा का थाना
- फोटो : अमर उजाला (फाइल)
विस्तार
मानव तस्करी के मामले रोकने के लिए जो व्यवस्था बनाई गई है, उस पर केंद्रीय गृह मंत्रालय और विभिन्न राज्यों के बीच तालमेल नहीं बैठ रहा है। गृह मंत्रालय ने अब देश के सभी 800 पुलिस जिलों में एंटी ह्यूमन ट्रैफिकिंग यूनिट 'एएचटीयू' गठित करने के निर्देश दे दिए हैं। साल 2007 में पहली एएचटीयू गठित होने के बाद अब फाइलों में इनकी संख्या 330 है। अधिकांश यूनिटों में ट्रेंड स्टाफ नहीं है। मंत्रालय के अफसरों की दलील है कि मानव तस्करी रोकने के लिए जो काम होना चाहिए, वह नहीं हो पा रहा है।
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केंद्र ने एक दशक में राज्यों को 25.16 करोड़ दिए हैं, जबकि 2019 में निर्भया फंड के तहत अतिरिक्त सौ करोड़ रुपये जारी किए थे। राज्यों से कहा गया था कि सभी पुलिस जिलों में यानी 800 एएचटीयू स्थापित की जाएं। इसके अलावा राज्य, जिला और थाना स्तर पर भी एएचटीयू पर काम शुरू हो। सभी राज्य सक्रियता से तीनों स्तरों पर एएचटीयू स्थापित करते हैं, तो देश में इनकी संख्या 16955 हो जाएगी। हैरानी की बात है कि अभी तक ज्यादातर राज्यों ने इस दिशा में काम प्रारंभ ही नहीं किया। केंद्रीय गृह मंत्रालय ने राज्यों के मुख्य सचिवों और पुलिस महानिदेशकों से इस बारे में रिपोर्ट तलब की है।
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मानव तस्करी को रोकना, एंटी ह्यूमन ट्रैफिकिंग यूनिट का गठन और इसके अन्य विभिन्न आयामों पर अध्ययन कर चुके पूर्व आईपीएस डॉ. पीएम नायर के अनुसार, कोरोना संक्रमण के दौरान भी मानव तस्करी को अंजाम देने वाले गैंग सक्रिय रहे हैं। बाल यौन शोषण सामग्री परोसने वाली वेबसाइट्स की संख्या बढ़ना, इसे मानव तस्करी के नए रूपों के तौर पर देखा जा रहा है। मानव तस्करी का मुख्य उद्देश्य बंधुआ मजदूरी, देह व्यापार और बाल श्रम रहा है। लेकिन ये घटनाएं बढ़ती जा रही है। मतलब साफ है कि केवल यूनिट गठन से काम नहीं चलेगा। इन यूनिटों को काम भी करना होगा। इसके लिए प्रशिक्षित स्टाफ की जरूरत होगी। इस दिशा में गंभीरता से आगे बढ़ना पड़ेगा।
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केंद्रीय गृह मंत्रालय के अधिकारी बताते हैं कि जुलाई 2019 में भी राज्यों को इस बारे में सचेत किया गया था। राज्यों से कहा गया कि वे मानव तस्करी रोकने के लिए अपने सिस्टम को अपग्रेड करें। उसके बाद हालत यह रही कि किसी राज्य ने कुछ यूनिटें गठित कर दीं तो किसी ने इस तरफ ध्यान ही नहीं दिया। केंद्रीय गृह मंत्रालय के डिप्टी सेक्रेटरी अरुण सोबती ने उसके बाद कई बार राज्यों को याद दिलाया। अधिकांश राज्य तो ऐसे हैं, जो मंत्रालय के पत्र का जवाब ही नहीं देते। कुछ राज्यों की तरफ से लिखा आता है कि फलां जिलों में यूनिट गठित कर दी गई हैं। जब पता किया जाता है तो मालूम पड़ता है कि बहुत कुछ फाइलों से बाहर ही नहीं निकल सका है। पिछले माह भी सोबती की ओर से राज्यों के मुख्य सचिवों और पुलिस महानिदेशकों को पत्र भेजा गया है।
इसमें बताया गया है कि राज्य किस तरह से मानव तस्करी के मामलों को रोक सकते हैं। निचले स्तर पर कैसे काम करें, आदि बातों का जिक्र किया गया है। विक्टिम सेंट्रिक अप्रोच और संगठित गैंग को किस तरह खत्म करना है, ये जानकारी भी दी गई है। सौ करोड़ रुपये की अतिरिक्त सहायता मुहैया कराई गई है। इसकी मदद से सभी पुलिस थानों में एंटी ह्यूमन ट्रैफिकिंग यूनिट गठित की जाए।
महाराष्ट्र, तेलंगाना, यूपी, बिहार, झारखंड, जम्मू कश्मीर, राजस्थान, आंध्र प्रदेश, असम, दिल्ली और उड़ीसा से देश के भीतर ही नहीं, बल्कि बाहर भी मानव तस्करी के मामले देखने को मिले हैं। इसके लिए बॉर्डर पर बीएसएफ और एसएसबी को भी एंटी ह्यूमन ट्रैफिकिंग यूनिट गठित करने के लिए कहा गया है। वकीलों के अलावा मनोवैज्ञानिकों और सिविल सोसायटी के लोगों की टीम को ऐसे मामलों की जांच में शामिल करने की बात कही गई है।
देश में मानव तस्करी से जुड़े मामलों में संवेदनशीलता से काम हो सके, इसके लिए मंत्रालय ने राज्यों से तीन स्तरीय इकाई गठित करने के लिए कहा है। राज्य स्तर पर एडीजी रैंक के अधिकारी मानव तस्करी के मामलों की जांच पर नजर रखेंगे। जिला स्तर पर एसपी या डीएसपी इन मामलों को देखेंगे। सभी राज्यों से कहा गया है कि वे इस आदेश को अधिसूचित कर गृह मंत्रालय को सूचित करें। मंत्रालय ने आईबी और सीबीआई की उन रिपोर्ट का हवाला भी दिया है, जिसमें मानव तस्करी के नए रूपों का जिक्र किया गया है। पुलिस प्रशासन यह सुनिश्चित करे कि हर गांव में पंचायत नए लोगों पर नजर रखे। गांव में कौन कहां से आया है, इसकी जानकारी एजेंसियों को मिलनी चाहिए। यहीं से मानव तस्करी और देह व्यापार का धंधा शुरू होता है। जब तक लोकल पुलिस को पता चलता है, आरोपी, पीड़ित महिला या बच्चों को लेकर भाग जाते हैं।
महाराष्ट्र, उत्तर प्रदेश और जम्मू-कश्मीर सहित कई राज्यों को एडवाइजरी जारी कर चेताया गया था कि वे ठीक से काम नहीं कर रहे हैं। इन राज्यों में यूनिटों को गठन को लेकर लापरवाही बरती गई। उत्तर प्रदेश और महाराष्ट्र के आधे से ज्यादा जिले ऐसे थे, जहां यूनिट का गठन तक नहीं हुआ। करीब 13 राज्य ऐसे हैं, जहां पर नौकरी का लालच, बेहतरीन जीवन स्तर और परिवार को आर्थिक मदद जैसा भरोसा देकर मानव तस्करी की घटना को अंजाम दिया जा रहा है।
साल 2017 में ऐसे मामलों की संख्या 5900 थी, 2018 में करीब 5800 और 2019 में इन केसों का ग्राफ 6600 के पार पहुंच गया था। इनमें महाराष्ट्र में 946 केस, राजस्थान में 653, तेलंगाना में 322, आंध्रप्रदेश में 316 और दिल्ली में 608 मामले दर्ज किए गए थे। बहुत से मामले ऐसे भी हैं, जिन्हें मानव तस्करी की धाराओं में न दर्ज कर उन्हें लापता वाले कॉलम में डाल दिया जाता है। स्थानीय पुलिस कर्मियों को महिला एवं बाल विकास मंत्रालय के साथ मिलकर काम करने के लिए कहा गया है।