दक्षिण भारत में तेजी से बढ़ रहे हिंदी बोलने वाले, देश के 44 फीसदी लोगों की बनी भाषा

न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Updated Thu, 28 Jun 2018 12:37 PM IST
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देश में हिंदी बोलने वालों की संख्या लगातार बढ़ रही है।  इसकी बड़ी वजह उत्तर भारत आने वाले दक्षिण भारतीयों का हिंदी से रुझान है। 2011 की जनगणना के अनुसार भारतीयों भाषाओं  में सबसे ज्यादा पढ़ी और बोले जाने वाली भाषा हिंदी हो गई है। देश के करीब 44 फीसदी लोगों ने अपनी मातृभाषा हिंदी बताई है। 
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जबकि 2001 की जनगणना के मुताबिक उसदौरान हिंदी को अपनी मातृभाषा बताने वालों की संख्या 41.3 फीसदी थी। दूसरे नंबर पर बोले जाने वाली भाषा बंगाली है जबकि तेलुगू को पीछे छोड़कर मराठी तीसरे नंबर की बोले जाने वाली भाषा हो गई है। 2011 की जनगणना में यह भी खुलासा हुआ है कि हर पांचवां बंगाली बोलने वाला व्यक्ति बंगाल से बाहर रहता है। टाइम्स की रिपोर्ट के मुताबिक इसका सबसे बड़ा कारण दक्षिणी राज्यों के लोगों का उत्तर भारत की ओर पलायन है। 
पिछले कुछ वर्षों में दो दक्षिणी राज्यों के लोग बड़ी संख्या में दक्षिण की ओर प्रवास कर रहे हैं। जबकि कर्नाटक में महत्वपूर्ण बदलाव देखने को मिला है। 2011 में हुई जनगणना में एक बात और सामने आई वह यह है कि दिल्ली में एक समय में तमिल और मलयाली बड़ी संख्या में रहते थे लेकिन  2001- 2011 के बीच दिल्ली में तमिल और मलयाली बोलने वालों की संख्या में भारी गिरावट देखी गई है। 
 यही नहीं एक समय में मुंबई की वजह से दक्षिण भारतीयों की पहली पसंद महाराष्ट्र माना जाता था। वहां भी कन्नड़, तेलुगु, तमिल और मलयालम बोलने वालों की संख्या में भारी गिरावट देखी गई है। 2001से 2011 के बीच उत्तर प्रदेश में मलयाली लोगों की संख्या बढ़ी है। इसकी बड़ी वजह है नोएडा में तेजी से बढ़ता आईटी सेक्टर जबकि वहीं गुरुग्राम की वजह से हरियाणा में तमिल लोगों की संख्या में भारी बढ़ोतर देखी गई है।    

अब बात देश की सबसे पुरानी भाषा संस्कृत की तो देश में सूचीबद्ध 22 भाषाओं में संस्कृत सबसे कम बोली जाने वाली भाषा  हो गई है। देश में महज 24,821 लोग ही बोलते हैं और उन्होंने इसे अपनी मातृभाषा बताया है।  मजेदार बात यह है कि इसे बोलने वाले लोगों की संख्या बोडो, मणिपुरी, कोंकणी और डोगरी बोले जाने वाले लोगों से भी कम है।

 जबकि गैर-सूचीबद्ध भाषाओं में लगभग 2.6 लाख लोगों ने अंग्रेजी को अपनी मातृभाषा बताया, इनमें से सबसे अधिक 1.06 लाख लोग महाराष्ट्र में रहते हैं।  तमिलनाडु और कर्नाटक इस मामले में क्रमश: दूसरे और तीसरे नंबर पर हैं। 
 
हिंदी और प्रादेशिक भाषाओं के बढ़ने का बड़ा कारण भारतीय भाषाओं का तेजी से इंटरनेट पर बढ़ता उपयोग भी है। यह भारतीय भाषाओं का बढ़ता प्रभाव ही है कि गूगल साउथ ईस्ट एशिया और भारत के वाइस प्रेसिडेंट राजन आनंदन ने कहा कि 2021 तक भारतीय भाषाओं का बाजार तेजी से बढ़ने वाला है।

उनका कहना है कि भारतीय भाषाओं का ऑन लाइन बाजार 10,000 करोड़ का होगा। वहीं भारतीय भाषाओं का इंटरनेट बाजार तेजी से बढ़ेगा। गूगल इंडिया का मानना है कि महज चार वर्षों में भारतीय भाषा में इंटरनेट का उपयोग करने वालों की संख्या में जबरदस्त उछाल देखा जाएगा और यह महज चार वर्षों में  53.6 करोड़ के आंकड़े को पार कर लेगा।

वहीं भारतीय भाषाओं के लिए खुशखबरी भी है। भारत में कुल डिजिटल विज्ञापन व्यय अभी 2 अरब डालर है। इसमें भारतीय भाषाओं का हिस्सा सिर्फ 5% है। यह 2021 तक 35% हो जाने की संभावना है। कुल व्यय तब तक 4.4 अरब डालर होगा। क्या भारतीय भाषाएं इसका लाभ उठाने के लिए तैयार हैं? यह अच्छी सामग्री से ही होगा।
 
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