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Hindi Diwas: गुलामी के कठिन दौर में भी भारतीय भाषाएं बनीं प्रतिरोध की आवाज, हिंदी ने पूरे किए 76 गौरवशाली वर्ष
Sun, 14 Sep 2025 10:53 AM IST
राहुल कुमार
डिजिटल ब्यूरो, अमर उजाला, नई दिल्ली
डिजिटल ब्यूरो, अमर उजाला, नई दिल्ली
Published by: राहुल कुमार
Updated Sun, 14 Sep 2025 10:53 AM IST
सार
पिछले एक दशक में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भारतीय भाषाओं और संस्कृति के पुनर्जागरण का एक स्वर्णिम कालखंड आया है। चाहे संयुक्त राष्ट्रसंघ का मंच हो, चाहे जी-20 का सम्मेलन हो, एससीओ में संबोधन हो, पीएम मोदी ने हिंदी और भारतीय भाषाओं में संवाद कर भारतीय भाषाओं का स्वाभिमान बढ़ाया है। पी
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केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह
- फोटो : ANI
विस्तार
हिन्दी दिवस पर केन्द्रीय गृह एवं सहकारिता मंत्री अमित शाह ने कहा है कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में भारतीय भाषाओं और संस्कृति के पुनर्जागरण का एक स्वर्णिम कालखंड चल रहा है। हिन्दी और अन्य भारतीय भाषाएं तकनीक, विज्ञान, न्याय, शिक्षा और प्रशासन की धुरी बनें। मिलकर चलो, मिलकर सोचो, मिलकर बोलो, यही हमारी भाषाई सांस्कृतिक चेतना का मूल मंत्र रहा है। डिजिटल इंडिया, ई-गवर्नेंस, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और मशीन लर्निंग के इस युग में मोदी सरकार भारतीय भाषाओं को भविष्य के लिए सक्षम बना रही है।
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शाह ने अपने संदेश में कहा, गुलामी के कठिन दौर में भी भारतीय भाषाएं प्रतिरोध की आवाज बनीं। आजादी के आंदोलन के राष्ट्रव्यापी बनने में हमारी भाषाओं की बड़ी भूमिका रही। हमारे स्वाधीनता सेनानियों ने जनपदों की भाषाओं में, ग्राम-देहात की भाषाओं को आजादी के आंदोलन से जोड़ा। हिंदी के साथ ही सभी भारतीय भाषाओं के कवियों, साहित्यकारों और नाट्यकारों ने लोकभाषाओं में, लोककथाओं में, लोकगीतों और लोकनाटकों के माध्यम से हर आयु, वर्ग और समाज के भीतर स्वाधीनता के संकल्प को प्रबल बनाया। वन्दे मातरम् और जय हिंद जैसे नारे हमारी भाषाई चेतना से ही उपजे और स्वतंत्र भारत के स्वाभिमान के प्रतीक बने।
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अपना भारत मूलतः भाषा-प्रधान देश है। हमारी भाषाएं सदियों से संस्कृति, इतिहास, परंपराओं, ज्ञान-विज्ञान, दर्शन और अध्यात्म को पीढ़ी दर पीढ़ी आगे बढ़ाने की सशक्त माध्यम रही हैं। हिमालय की ऊंचाइयों से लेकर दक्षिण के विशाल समुद्र तटों तक, मरुभूमि से लेकर बीहड़ जंगलों और गांव की चौपालों तक, भाषाओं ने हर परिस्थिति में मनुष्य को संवाद और अभिव्यक्ति के माध्यम से संगठित रहने और एकजुट होकर आगे बढ़ने का मार्ग दिखाया है। मिलकर चलो, मिलकर सोचो और मिलकर बोलो, यही हमारी भाषाई-सांस्कृतिक चेतना का मूल मंत्र रहा है।
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भारत की भाषाओं की सबसे बड़ी विशेषता यह रही है कि उन्होंने हर वर्ग और समुदाय को अभिव्यक्ति का अवसर दिया। पूर्वोत्तर में बीहू का गान, तमिलनाडु में ओवियालू की आवाज, पंजाब में लोहड़ी के गीत, बिहार में विद्यापति की पदावली, बंगाल में बाउल संत के भजन, कजरी गीत, भिखारी ठाकुर की 'बिदेशिया', इन सबने हमारी संस्कृति को जीवन्त और लोककल्याणकारी बनाया है।
अमित शाह ने कहा, मेरा स्पष्ट मानना है कि भाषाएं एक दूसरे की सहचर बनकर, एकता के सूत्र में बंधकर आगे बढ़ रही हैं। संत तिरुवल्लुवर को जितनी भावुकता से दक्षिण में गाया जाता है, उतनी ही रुचि से उत्तर में पढ़ा जाता है। कृष्णदेवराय जितने लोकप्रिय दक्षिण में हुए, उतने ही उत्तर में भी हुए। सुब्रमण्यम भारती की राष्ट्रप्रेम से ओत-प्रोत रचनाएं हर क्षेत्र के युवाओं में राष्ट्रप्रेम को प्रबल बनाती है। गोस्वामी तुलसीदास को हर एक देशवासी पूजता है, संत कबीर के दोहे तमिल, कन्नड़ और मलयालम अनुवादों में भी पाए जाते हैं। सूरदास की पदावली दक्षिण भारत के मंदिरों और संगीत परंपराओं में आज भी प्रचलित है। श्रीमंत शंकरदेव, महापुरुष माधवदेव को हर एक वैष्णव जानता है। और, भूपेन हजारिका को हरियाणा का युवा भी गुनगुनाता है।
जब देश आजाद हुआ, तब हमारे संविधान निर्माताओं ने भाषाओं की क्षमता और महत्ता को देखते हुए इस पर विस्तार से विचार-विमर्श किया और 14 सितम्बर 1949 को देवनागरी लिपि में लिखित हिंदी को राजभाषा के रूप में अंगीकृत किया। संविधान के अनुच्छेद 351 में यह दायित्व सौंपा गया है कि हिंदी का प्रचार-प्रसार हो और वह भारत की सामासिक संस्कृति का प्रभावी माध्यम बने।
पिछले एक दशक में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भारतीय भाषाओं और संस्कृति के पुनर्जागरण का एक स्वर्णिम कालखंड आया है। चाहे संयुक्त राष्ट्रसंघ का मंच हो, चाहे जी-20 का सम्मेलन हो, एससीओ में संबोधन हो, पीएम मोदी ने हिंदी और भारतीय भाषाओं में संवाद कर भारतीय भाषाओं का स्वाभिमान बढ़ाया है। पीएम मोदी ने आजादी के अमृत काल में गुलामी के प्रतीकों से देश को मुक्त करने के लिए जो पंच प्रण लिए थे, उसमें भाषाओं की बड़ी भूमिका है। हमें अपनी संवाद और आपसी संपर्क भाषा के रूप में भारतीय भाषा को अपनाना चाहिए। राजभाषा हिंदी ने 76 गौरवशाली वर्ष पूरे किए हैं। राजभाषा विभाग ने अपनी स्थापना के स्वर्णिम 50 वर्ष पूर्ण कर हिंदी को जनभाषा और जनचेतना की भाषा बनाने का अद्भुत कार्य किया है। 2014 के बाद से सरकारी कामकाज में हिंदी के प्रयोग को निरंतर बढ़ावा दिया गया है।
2024 में हिंदी दिवस पर ‘भारतीय भाषा अनुभाग’ की स्थापना हुई, जिसका उद्देश्य सभी प्रमुख भारतीय भाषाओं के बीच सहज अनुवाद सुनिश्चित करना है। हमारा लक्ष्य यह है कि हिंदी और अन्य भारतीय भाषाएँ केवल संवाद का माध्यम न रहकर तकनीक, विज्ञान, न्याय, शिक्षा और प्रशासन की धुरी बनें। डिजिटल इंडिया, ई-गवर्नेंस, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और मशीन लर्निंग के इस युग में हम भारतीय भाषाओं को भविष्य के लिए सक्षम, प्रासंगिक और वैश्विक तकनीकी प्रतिस्पर्धा में भारत को अग्रणी बनाने वाली शक्ति के रूप में विकसित कर रहे हैं।
भाषा सावन की उस बूँद की तरह है, जो मन के दुःख और अवसाद को धोकर नई उर्जा और जीवन शक्ति देती है। बच्चों की कल्पना से गढ़ी गई अनोखी कहानियों से लेकर दादी-नानी की लोरियों और किस्सों तक, भारतीय भाषाओं ने हमेशा समाज को जिजीविषा और आत्मबल का मंत्र दिया है।
मिथिला के कवि विद्यापति जी ने ठीक ही कहा:
“देसिल बयना सब जन मिट्ठा।”
अर्थात् अपनी भाषा सबसे मधुर होती है।
राजभाषा सम्मेलन में न्याय संहिता का विमोचन करते गृह मंत्री शाह व कानून मंत्री अर्जुन राम मेघवाल।
- फोटो : एएनआई
भाषाओं में कोई टकराव नहीं, विज्ञान व न्यायपालिका की भी भाषा बने हिंदी : शाह
गृह मंत्री ने गुजरात के गांधी नगर में एक अन्य कार्यक्रम में भी देश की भाषाओं पर विस्तार से बात की। 5वें अखिल भारतीय राजभाषा सम्मेलन में गृह मंत्री ने अभिभावकों से अपील करते हुए बच्चों के साथ मातृभाषा में बात करने पर जोर दिया। हिंदी और अन्य भारतीय भाषाओं में कोई संघर्ष नहीं है। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि हिंदी को सिर्फ बोलचाल की भाषा ही नहीं, बल्कि इसे विज्ञान, प्रौद्योगिकी, न्यायपालिका और पुलिस की भाषा भी बनना चाहिए।
पांचवें अखिल भारतीय राजभाषा सम्मेलन के उद्घाटन सत्र को संबोधित करते हुए, शाह ने कहा कि भारतीयों को अपनी भाषाओं को संरक्षित कर उन्हें अमर बनाना चाहिए। उन्होंने अभिभावकों से बच्चों से उनकी मातृभाषा में बात करने का आग्रह किया।
संस्कृत ने हमें ज्ञान की गंगा दी है और हिंदी ने इस ज्ञान को घर-घर पहुंचाया
शाह ने कहा, यह बच्चे के भविष्य के लिए बेहद अहम है। क्योंकि कई मनोवैज्ञानिकों और शिक्षाविदों ने पुष्टि की है, बच्चा अपनी मातृभाषा में सोचता है। जैसे ही आप बच्चे पर मातृभाषा के अलावा कोई अन्य भाषा थोपते हैं, तो उसकी मानसिक क्षमता का 25 से 30 प्रतिशत हिस्सा अनुवाद करने में खर्च हो जाएगा। उन्होंने कहा, हिंदी और अन्य भारतीय भाषाओं के बीच कोई टकराव नहीं है। दयानंद सरस्वती, महात्मा गांधी, केएम मुंशी, सरदार वल्लभभाई पटेल और कई अन्य विद्वानों ने हिंदी को स्वीकार किया और उसका प्रचार किया। गुजरात, जहां गुजराती और हिंदी का सह-अस्तित्व रहा है, दोनों भाषाओं के विकास का एक उत्कृष्ट उदाहरण है। उन्होंने कहा, जब सभी प्रशासनिक काम भारतीय भाषाओं में होंगे हैं तो जनता से जुड़ाव स्वतः स्थापित हो जाएगा। शाह ने कहा कि संस्कृत ने हमें ज्ञान की गंगा दी है और हिंदी ने इस ज्ञान को घर-घर पहुंचाया है।
गृह मंत्री ने गुजरात के गांधी नगर में एक अन्य कार्यक्रम में भी देश की भाषाओं पर विस्तार से बात की। 5वें अखिल भारतीय राजभाषा सम्मेलन में गृह मंत्री ने अभिभावकों से अपील करते हुए बच्चों के साथ मातृभाषा में बात करने पर जोर दिया। हिंदी और अन्य भारतीय भाषाओं में कोई संघर्ष नहीं है। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि हिंदी को सिर्फ बोलचाल की भाषा ही नहीं, बल्कि इसे विज्ञान, प्रौद्योगिकी, न्यायपालिका और पुलिस की भाषा भी बनना चाहिए।
पांचवें अखिल भारतीय राजभाषा सम्मेलन के उद्घाटन सत्र को संबोधित करते हुए, शाह ने कहा कि भारतीयों को अपनी भाषाओं को संरक्षित कर उन्हें अमर बनाना चाहिए। उन्होंने अभिभावकों से बच्चों से उनकी मातृभाषा में बात करने का आग्रह किया।
संस्कृत ने हमें ज्ञान की गंगा दी है और हिंदी ने इस ज्ञान को घर-घर पहुंचाया
शाह ने कहा, यह बच्चे के भविष्य के लिए बेहद अहम है। क्योंकि कई मनोवैज्ञानिकों और शिक्षाविदों ने पुष्टि की है, बच्चा अपनी मातृभाषा में सोचता है। जैसे ही आप बच्चे पर मातृभाषा के अलावा कोई अन्य भाषा थोपते हैं, तो उसकी मानसिक क्षमता का 25 से 30 प्रतिशत हिस्सा अनुवाद करने में खर्च हो जाएगा। उन्होंने कहा, हिंदी और अन्य भारतीय भाषाओं के बीच कोई टकराव नहीं है। दयानंद सरस्वती, महात्मा गांधी, केएम मुंशी, सरदार वल्लभभाई पटेल और कई अन्य विद्वानों ने हिंदी को स्वीकार किया और उसका प्रचार किया। गुजरात, जहां गुजराती और हिंदी का सह-अस्तित्व रहा है, दोनों भाषाओं के विकास का एक उत्कृष्ट उदाहरण है। उन्होंने कहा, जब सभी प्रशासनिक काम भारतीय भाषाओं में होंगे हैं तो जनता से जुड़ाव स्वतः स्थापित हो जाएगा। शाह ने कहा कि संस्कृत ने हमें ज्ञान की गंगा दी है और हिंदी ने इस ज्ञान को घर-घर पहुंचाया है।
गांधीनगर में कार्यक्रम के दौरान अमित शाह
- फोटो : एएनआई
2029 तक सबसे बड़ा शब्दकोश होगा शब्द सिंधु
शाह ने कहा कि 51,000 शब्दों से शुरू हुआ हिंदी शब्द सिंधु अब 7 लाख शब्दों को पार कर गया है। 2029 तक यह दुनिया की सभी भाषाओं में सबसे बड़ा शब्दकोष बन जाएगा। इस शब्दकोश के माध्यम से हमने हिंदी को लचीला भी बनाया है। कई हिंदी विद्वान इस पर जोर देते हैं कि हिंदी संस्कृत-समृद्ध होनी चाहिए। इस पर कोई आपत्ति नहीं है।
शाह ने कहा कि 51,000 शब्दों से शुरू हुआ हिंदी शब्द सिंधु अब 7 लाख शब्दों को पार कर गया है। 2029 तक यह दुनिया की सभी भाषाओं में सबसे बड़ा शब्दकोष बन जाएगा। इस शब्दकोश के माध्यम से हमने हिंदी को लचीला भी बनाया है। कई हिंदी विद्वान इस पर जोर देते हैं कि हिंदी संस्कृत-समृद्ध होनी चाहिए। इस पर कोई आपत्ति नहीं है।
- शाह ने कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने विभिन्न प्रौद्योगिकियों के माध्यम से स्थानीय भाषाओं को मजबूत करने का काम किया है। गृह मंत्रालय ने भारतीय भाषा अनुभाग बनाया है, जो हिंदी और अन्य भाषाओं को बढ़ावा दे रहा है।
गांधीनगर में कार्यक्रम के दौरान अमित शाह
- फोटो : एएनआई
2047 तक भारत को हर क्षेत्र में नंबर एक बनाने का लक्ष्य : शाह
दिन के एक अन्य कार्यक्रम में शाह ने कहा, सरकार का लक्ष्य 2047 तक भारत को हर क्षेत्र में नंबर एक बनाना है। उन्होंने यह बात रविवार को गुजरात में अहमदाबाद के नारणपुरा में निर्मित वीर सावरकर खेल परिसर का उद्घाटन करते हुए कही। खेल परिसर को भारत का सबसे बड़ा और विश्व में सबसे उन्नत परिसर बताते हुए उन्होंने कहा कि यह खिलाड़ियों को उच्चतम स्तर पर प्रदर्शन करने तथा विश्व भर में पदक जीतने के लिए प्रेरित करेगा। 2047 तक भारत को हर क्षेत्र में दुनिया में नंबर एक बनाना लक्ष्य है। अगर दुनिया में सबसे पहले कहीं खेल शुरू हुआ होगा तो वह भारत में ही हुआ होगा।
दिन के एक अन्य कार्यक्रम में शाह ने कहा, सरकार का लक्ष्य 2047 तक भारत को हर क्षेत्र में नंबर एक बनाना है। उन्होंने यह बात रविवार को गुजरात में अहमदाबाद के नारणपुरा में निर्मित वीर सावरकर खेल परिसर का उद्घाटन करते हुए कही। खेल परिसर को भारत का सबसे बड़ा और विश्व में सबसे उन्नत परिसर बताते हुए उन्होंने कहा कि यह खिलाड़ियों को उच्चतम स्तर पर प्रदर्शन करने तथा विश्व भर में पदक जीतने के लिए प्रेरित करेगा। 2047 तक भारत को हर क्षेत्र में दुनिया में नंबर एक बनाना लक्ष्य है। अगर दुनिया में सबसे पहले कहीं खेल शुरू हुआ होगा तो वह भारत में ही हुआ होगा।
पीएम मोदी (फाइल)
- फोटो : एएनआई
हिंदी हमारी पहचान व संस्कृति की जीवंत धरोहर : पीएम मोदी
गृह मंत्री शाह से पहले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा हिंदी सिर्फ संवाद का माध्यम नहीं, बल्कि हमारी पहचान और संस्कारों की जीवंत धरोहर है। प्रधानमंत्री ने रविवार को हिंदी दिवस पर देशवासियों को शुभकामनाएं दीं। उन्होंने देशवासियों ने सभी भारतीय भाषाओं को समृद्ध करने के लिए संकल्प लेने का आह्वान किया। भारत में हिंदी को आधिकारिक भाषा के रूप में अपनाने के उपलक्ष्य में हर साल 14 सितंबर को हिंदी दिवस मनाया जाता है। पीएम मोदी ने एक पोस्ट में हिंदी के सांस्कृतिक और भावनात्मक महत्व पर जोर दिया। उन्होंने लोगों से सभी भारतीय भाषाओं को समृद्ध बनाने और उन्हें गर्व के साथ आने वाली पीढ़ियों तक पहुंचाने के लिए सामूहिक रूप से कार्य करने को कहा। उन्होंने कहा, विश्व पटल पर हिंदी का बढ़ता सम्मान हम सबके लिए गर्व और प्रेरणा का विषय है।
गृह मंत्री शाह से पहले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा हिंदी सिर्फ संवाद का माध्यम नहीं, बल्कि हमारी पहचान और संस्कारों की जीवंत धरोहर है। प्रधानमंत्री ने रविवार को हिंदी दिवस पर देशवासियों को शुभकामनाएं दीं। उन्होंने देशवासियों ने सभी भारतीय भाषाओं को समृद्ध करने के लिए संकल्प लेने का आह्वान किया। भारत में हिंदी को आधिकारिक भाषा के रूप में अपनाने के उपलक्ष्य में हर साल 14 सितंबर को हिंदी दिवस मनाया जाता है। पीएम मोदी ने एक पोस्ट में हिंदी के सांस्कृतिक और भावनात्मक महत्व पर जोर दिया। उन्होंने लोगों से सभी भारतीय भाषाओं को समृद्ध बनाने और उन्हें गर्व के साथ आने वाली पीढ़ियों तक पहुंचाने के लिए सामूहिक रूप से कार्य करने को कहा। उन्होंने कहा, विश्व पटल पर हिंदी का बढ़ता सम्मान हम सबके लिए गर्व और प्रेरणा का विषय है।