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Himachal Pradesh: क्यों फीकी पड़ रही स्टार प्रचारकों की चमक, क्या है स्थानीय बनाम बाहरी चेहरों का फर्क, जानें
सार
राजनीतिक विश्लेषक और जेएनयू के पूर्व प्रोफेसर डॉ. आनंद कुमार कहते हैं, "आज सोशल मीडिया का युग है। कोई स्टार प्रचारक जनता से दूर नहीं। लोगों को आज नेताओं से नहीं, बल्कि अपने मुद्दों से मतलब है। स्टार प्रचारक की जनसभा में भीड़ भले ही जुटा ली जाए, मगर उसका मतदान पर कोई ज्यादा असर दिखाई नहीं पड़ता।"
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विस्तार
हिमाचल प्रदेश के विधानसभा चुनाव में राजनीतिक सरगर्मियां तेज हो गई हैं। कई दिन पहले कांग्रेस और भाजपा के स्टार प्रचारकों की सूची जारी हो चुकी है। स्टार प्रचारक, विभिन्न सीटों पर पहुंच रहे हैं। लेकिन आज इन स्टार प्रचारकों की चमक फीकी पड़ती दिख रही है। माना जाता है कि हिमाचल चुनाव में बाहर से आने वाले इन नेताओं के वादों और चेहरों पर लोगों को भरोसा नहीं रहा।
राजनीतिक विश्लेषक और जेएनयू के पूर्व प्रोफेसर डॉ. आनंद कुमार कहते हैं, ये बात सही है। दूसरे प्रदेशों के मुख्यमंत्री और केंद्रीय मंत्री एवं वरिष्ठ नेता चुनाव प्रचार में आते हैं। जनसभा कर वापस लौट जाते हैं। कुछ नेता, जनसंपर्क भी करते हैं। दरअसल, अब ऐसे स्टार प्रचारकों से लोगों का मोह भंग होता जा रहा है। सत्तर या अस्सी के दशक में जो स्टार प्रचारक होते थे, वे आज नहीं हैं। उस वक्त लोगों में फलां नेता का चेहर देखने की उत्सुकता लगी रहती थी। आज सोशल मीडिया का युग है। कोई स्टार प्रचारक जनता से दूर नहीं। लोगों को आज नेताओं से नहीं, बल्कि अपने मुद्दों से मतलब है। स्टार प्रचारक की जनसभा में भीड़ भले ही जुटा ली जाए, मगर उसका मतदान पर कोई ज्यादा असर दिखाई नहीं पड़ता।
कांग्रेस ने अपने स्टार प्रचारकों में सोनिया गांधी, मल्लिकार्जुन खरगे, राहुल गांधी, प्रियंका गांधी, अशोक गहलोत, भूपेश बघेल, आनंद शर्मा, भूपेंद्र हुड्डा, हरीश रावत, रणदीप सुरजेवाला, मोहम्मद अजरुद्दीन, संजय दत्त, अल्का लांबा, आचार्य प्रमोद कृष्णम, राज बब्बर, सचिन पायलट, दीपेंद्र हुड्डा, पवन खेड़ा, प्रतिभा सिंह, मुकेश अग्निहोत्री, सुखविंद्र सुक्खू, राम लाल ठाकुर, कौल सिंह ठाकुर और श्रीनिवास बीवी सहित 40 नेताओं को शामिल किया है। इनमें सोनिया गांधी अपने स्वास्थ्य कारणों से और राहुल गांधी, भारत जोड़ो यात्रा के चलते चुनाव प्रचार के लिए नहीं आ सकेंगे।
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प्रो. आनंद कहते हैं, आज वैसे चमत्कारी नेता नहीं हैं, जिनके वचन और कर्म में समानता हो। देश में इंदिरा गांधी, जय प्रकाश नारायण, चौ. चरण सिंह, चौ. देवीलाल, अटल बिहारी वाजपेयी एवं अन्य दर्जनों ऐसे चेहरे रहे हैं, जिन पर लोगों ने भरोसा किया था। जब लोगों का भरोसा टूटा तो इनमें से कई नेताओं को चुनावी हार का सामना करना पड़ा।
उस दौर में लोग अपने नेताओं को सुनने एवं देखने आते थे। कई पार्टियां सिने जगत की हस्तियों को चुनाव प्रचार के लिए बुलाती थी। लोगों की अच्छी खासी भीड़ जुटती थी। वजह, लोगों के पास संचार के साधनों का अभाव था। वे अपने नेताओं को अखबारों में ही देखते थे। टीवी जैसे माध्यम की बहुत कम लोगों तक पहुंच थी। अगर उन्हें मालूम होता कि कोई चर्चित नेता या बॉलीवुड स्टार चुनाव प्रचार में आ रहा है तो जनसभा स्थल पर खासी भीड़ जुट जाती थी।
प्रो. आनंद ने कहा, अब देखिये कुछ अपवाद छोड़ दें तो ज्यादातर क्षेत्रों में सिने जगत के कलाकार आने कम हो गए हैं। वजह, वे लोगों की तालियां तो ले सकते हैं, मगर वोट नहीं। जनता, अब मुद्दों पर बात करने लगी है। दिल्ली के विधानसभा चुनाव में केंद्रीय मंत्री, दर्जनों मुख्यमंत्री और सैंकड़ों नेता आए थे। नुक्कड़ सभाओं और गलियों में स्टार प्रचारक घूमते हुए नजर आए। जब चुनावी नतीजे आए तो सभी को भाजपा और कांग्रेस के स्टार प्रचारकों के जादू का पता चल गया।
राजनीतिक विश्लेषक एवं स्तंभकार रशीद किदवई कहते हैं, पहले राज्यों का चुनावी प्रचार स्थानीय मुद्दों पर ही होता रहा है। पीएम नरेंद्र मोदी से पहले बहुत कम प्रधानमंत्री ऐसे थे, जिन्होंने राज्यों के विधानसभा चुनाव में अति सक्रियता दिखाई हो। दूसरे राज्य के ऐसे नेता को लोग सुनना पसंद करते हैं, जिन्होंने अपने राज्य में विकास का कोई ऐसा काम किया हो, जो पहले कहीं नहीं देखा या सुना गया हो। कोई केंद्रीय मंत्री है, मुख्यमंत्री है या पार्टी का वरिष्ठ नेता है, इसी कारण उसे हिमाचल प्रदेश में स्टार प्रचारक बना दिया गया तो ये धोखे के अलावा कुछ नहीं है। बाहर से आने वाले नेताओं के मुकाबले, जनता अपने राज्य एवं क्षेत्र के नेताओं पर ज्यादा भरोसा करती है। अगर उन्होंने कोई वादा पूरा नहीं किया तो उन्हें अप्रोच किया जा सकता है, लेकिन दूसरे प्रांतों से आने वाले स्टार प्रचारकों को चुनाव के बाद कहां से पकड़ेंगे। ऐसे में अधिकांश स्टार प्रचारक केवल भीड़ जुटाने या पार्टी हाईकमान को खुश करने तक सीमित रहते हैं। उनके जरिए वोट लेना, ज्यादातर पार्टियों के लिए संभव नहीं हो पाता।
हिमाचल प्रदेश में भाजपा के स्टार प्रचारकों में पीएम नरेंद्र मोदी, जेपी नड्डा, राजनाथ सिंह, अमित शाह, नितिन गडकरी, जयराम ठाकुर, सुरेश कश्यप, बीएल संतोष, स्मृति ईरानी, ज्योतिरादित्य सिंधिया, शांता कुमार, प्रेम कुमार धूमल, भूपेंद्र यादव, वीके सिंह, हरदीप पुरी, शिवराज सिंह चौहान, योगी आदित्यनाथ, मनोहर लाल खट्टर, पुश्कर सिंह धामी, सुदान सिंह, मंगल पांडे, संजय टंडन, सरदार संदीप सिंह, डॉ. संबित पात्रा, मनोज तिवारी, अनुराग ठाकुर, तेजस्वी सूर्या, महेंद्र सिंह ठाकुर, हर्ष महाजन, इंदू गोस्वामी और देवेंद्र सिंह राणा आदि शामिल हैं। इनमें जेपी नड्डा और अमित शाह, चुनावी जनसभाएं कर चुके हैं। बाकी स्टार प्रचारकों का कार्यक्रम तय हो गया है। पीएम मोदी की चार, अमित शाह की छह और योगी आदित्यनाथ की पांच जनसभाएं रखी गई हैं।
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राजनीतिक विश्लेषक और जेएनयू के पूर्व प्रोफेसर डॉ. आनंद कुमार कहते हैं, ये बात सही है। दूसरे प्रदेशों के मुख्यमंत्री और केंद्रीय मंत्री एवं वरिष्ठ नेता चुनाव प्रचार में आते हैं। जनसभा कर वापस लौट जाते हैं। कुछ नेता, जनसंपर्क भी करते हैं। दरअसल, अब ऐसे स्टार प्रचारकों से लोगों का मोह भंग होता जा रहा है। सत्तर या अस्सी के दशक में जो स्टार प्रचारक होते थे, वे आज नहीं हैं। उस वक्त लोगों में फलां नेता का चेहर देखने की उत्सुकता लगी रहती थी। आज सोशल मीडिया का युग है। कोई स्टार प्रचारक जनता से दूर नहीं। लोगों को आज नेताओं से नहीं, बल्कि अपने मुद्दों से मतलब है। स्टार प्रचारक की जनसभा में भीड़ भले ही जुटा ली जाए, मगर उसका मतदान पर कोई ज्यादा असर दिखाई नहीं पड़ता।
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कांग्रेस ने अपने स्टार प्रचारकों में सोनिया गांधी, मल्लिकार्जुन खरगे, राहुल गांधी, प्रियंका गांधी, अशोक गहलोत, भूपेश बघेल, आनंद शर्मा, भूपेंद्र हुड्डा, हरीश रावत, रणदीप सुरजेवाला, मोहम्मद अजरुद्दीन, संजय दत्त, अल्का लांबा, आचार्य प्रमोद कृष्णम, राज बब्बर, सचिन पायलट, दीपेंद्र हुड्डा, पवन खेड़ा, प्रतिभा सिंह, मुकेश अग्निहोत्री, सुखविंद्र सुक्खू, राम लाल ठाकुर, कौल सिंह ठाकुर और श्रीनिवास बीवी सहित 40 नेताओं को शामिल किया है। इनमें सोनिया गांधी अपने स्वास्थ्य कारणों से और राहुल गांधी, भारत जोड़ो यात्रा के चलते चुनाव प्रचार के लिए नहीं आ सकेंगे।
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प्रो. आनंद कहते हैं, आज वैसे चमत्कारी नेता नहीं हैं, जिनके वचन और कर्म में समानता हो। देश में इंदिरा गांधी, जय प्रकाश नारायण, चौ. चरण सिंह, चौ. देवीलाल, अटल बिहारी वाजपेयी एवं अन्य दर्जनों ऐसे चेहरे रहे हैं, जिन पर लोगों ने भरोसा किया था। जब लोगों का भरोसा टूटा तो इनमें से कई नेताओं को चुनावी हार का सामना करना पड़ा।
उस दौर में लोग अपने नेताओं को सुनने एवं देखने आते थे। कई पार्टियां सिने जगत की हस्तियों को चुनाव प्रचार के लिए बुलाती थी। लोगों की अच्छी खासी भीड़ जुटती थी। वजह, लोगों के पास संचार के साधनों का अभाव था। वे अपने नेताओं को अखबारों में ही देखते थे। टीवी जैसे माध्यम की बहुत कम लोगों तक पहुंच थी। अगर उन्हें मालूम होता कि कोई चर्चित नेता या बॉलीवुड स्टार चुनाव प्रचार में आ रहा है तो जनसभा स्थल पर खासी भीड़ जुट जाती थी।
प्रो. आनंद ने कहा, अब देखिये कुछ अपवाद छोड़ दें तो ज्यादातर क्षेत्रों में सिने जगत के कलाकार आने कम हो गए हैं। वजह, वे लोगों की तालियां तो ले सकते हैं, मगर वोट नहीं। जनता, अब मुद्दों पर बात करने लगी है। दिल्ली के विधानसभा चुनाव में केंद्रीय मंत्री, दर्जनों मुख्यमंत्री और सैंकड़ों नेता आए थे। नुक्कड़ सभाओं और गलियों में स्टार प्रचारक घूमते हुए नजर आए। जब चुनावी नतीजे आए तो सभी को भाजपा और कांग्रेस के स्टार प्रचारकों के जादू का पता चल गया।
राजनीतिक विश्लेषक एवं स्तंभकार रशीद किदवई कहते हैं, पहले राज्यों का चुनावी प्रचार स्थानीय मुद्दों पर ही होता रहा है। पीएम नरेंद्र मोदी से पहले बहुत कम प्रधानमंत्री ऐसे थे, जिन्होंने राज्यों के विधानसभा चुनाव में अति सक्रियता दिखाई हो। दूसरे राज्य के ऐसे नेता को लोग सुनना पसंद करते हैं, जिन्होंने अपने राज्य में विकास का कोई ऐसा काम किया हो, जो पहले कहीं नहीं देखा या सुना गया हो। कोई केंद्रीय मंत्री है, मुख्यमंत्री है या पार्टी का वरिष्ठ नेता है, इसी कारण उसे हिमाचल प्रदेश में स्टार प्रचारक बना दिया गया तो ये धोखे के अलावा कुछ नहीं है। बाहर से आने वाले नेताओं के मुकाबले, जनता अपने राज्य एवं क्षेत्र के नेताओं पर ज्यादा भरोसा करती है। अगर उन्होंने कोई वादा पूरा नहीं किया तो उन्हें अप्रोच किया जा सकता है, लेकिन दूसरे प्रांतों से आने वाले स्टार प्रचारकों को चुनाव के बाद कहां से पकड़ेंगे। ऐसे में अधिकांश स्टार प्रचारक केवल भीड़ जुटाने या पार्टी हाईकमान को खुश करने तक सीमित रहते हैं। उनके जरिए वोट लेना, ज्यादातर पार्टियों के लिए संभव नहीं हो पाता।
हिमाचल प्रदेश में भाजपा के स्टार प्रचारकों में पीएम नरेंद्र मोदी, जेपी नड्डा, राजनाथ सिंह, अमित शाह, नितिन गडकरी, जयराम ठाकुर, सुरेश कश्यप, बीएल संतोष, स्मृति ईरानी, ज्योतिरादित्य सिंधिया, शांता कुमार, प्रेम कुमार धूमल, भूपेंद्र यादव, वीके सिंह, हरदीप पुरी, शिवराज सिंह चौहान, योगी आदित्यनाथ, मनोहर लाल खट्टर, पुश्कर सिंह धामी, सुदान सिंह, मंगल पांडे, संजय टंडन, सरदार संदीप सिंह, डॉ. संबित पात्रा, मनोज तिवारी, अनुराग ठाकुर, तेजस्वी सूर्या, महेंद्र सिंह ठाकुर, हर्ष महाजन, इंदू गोस्वामी और देवेंद्र सिंह राणा आदि शामिल हैं। इनमें जेपी नड्डा और अमित शाह, चुनावी जनसभाएं कर चुके हैं। बाकी स्टार प्रचारकों का कार्यक्रम तय हो गया है। पीएम मोदी की चार, अमित शाह की छह और योगी आदित्यनाथ की पांच जनसभाएं रखी गई हैं।