जबरदस्ती या चुपके से अंतिम संस्कार क्यों कराती है पुलिस, पहले भी लगे हैं ये गंभीर आरोप
हाथरस में विवादित अंतिम संस्कार कराने के पीछे यूपी पुलिस का तर्क- कानून-व्यवस्था बिगड़ने से बचाने के लिए किया अंतिम संस्कार...
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हाथरस कांड में जनता का सबसे ज्यादा गुस्सा इस बात से है कि पुलिस ने पीड़िता का देर रात अंतिम संस्कार कर दिया और इसके लिए पीड़िता के परिवार वालों को भरोसे में नहीं लिया गया। लेकिन यह पहला मौका नहींं है, जब पुलिस ने किसी व्यक्ति का अंतिम संस्कार करवाया है और उस पर विवाद खड़ा हुआ है। इसके पहले भी अनेक अवसरों पर पुलिस ने लोगों का अंतिम संस्कार करवाया और उसके तौर-तरीकों को लेकर गंभीर सवाल खड़े हुए हैं। हालांकि ऐसे मौकों पर पुलिस का कहना हमेशा यही होता है कि कानून-व्यवस्था बिगड़ने से बचाने के लिए उसे ऐसा करना पड़ा।
पिछले वर्ष दिसंबर 2019 में नागरिकता कानून विरोधी प्रदर्शनों के दौरान मेरठ शहर में भी हिंसा भड़क उठी थी। हिंसा को काबू करने में पुलिस ने भी गोली चलाई थी और आरोप है कि इस गोलीबारी में कई लोगों की मौत हुई थी। इसी तरह की एक घटना में मारे गए मेरठ के मोहसिन खान के परिवार वालों का भी आरोप था कि उनके परिवार के सदस्य का पुलिस ने जबरदस्ती अंतिम संस्कार करवा दिया और वे अंतिम समय में उसका मुंह भी नहीं देख पाए।
मोहसिन के परिवार के सदस्यों के मुताबिक उसे गोली लगने के बाद वे उसका शव लेकर घर आए थे। परिवार मोहसिन के शव का पोस्टमार्टम कराना चाहता था। कई बार फोन करने के बाद रात 11 बजे के लगभग एक गाड़ी आई और पोस्टमार्टम के लिए मोहसिन का शव ले गई। परिवार का आरोप है कि रात के लगभग दो बजे ही पुलिस ने उनके परिवार के सदस्यों को पुलिस के दो जवानों के साथ कब्रिस्तान में जाकर शव को दफनाने की तैयारी करने को कहा।
परिवार के मुताबिक पुलिस ने स्वयं ही कफन का भी इंतजाम किया और सुबह तड़के में ही उसे दफना दिया गया। इसके बाद पुलिस दिखाई नहीं पड़ी। उसकी मां और उसके भाई उसके मौत के बाद अंतिम क्षणों में उसका चेहरा भी नहीं देख सके।
इसी प्रकार वर्ष 2018 में राजस्थान के गैंगस्टर आनंदपाल सिंह की एक एनकाउंटर में मौत हो गई थी। राजपूत समाज और परिवार के लोग एनकाउंटर पर सवाल खड़े करते हुए आनंदपाल सिंह का अंतिम संस्कार न करने पर अड़े हुए थे। इससे धीरे-धीरे कानून-व्यवस्था की स्थिति बिगड़ने लगी थी। पूरे क्षेत्र में कर्फ्यू लागू कर दिया गया था।
आरोप है कि राजस्थान पुलिस ने लगभग 20 दिनों के बाद आनंदपाल सिंह का जबरदस्ती अंतिम संस्कार कराया। आरोप यह भी है कि इस दौरान परिवार वालों को जबरदस्ती कैद करके रखा गया और कुछ लोगों को अंतिम संस्कार में साथ रखा गया।
हालांकि इस मामले में पुलिस ने कहा था कि किसी के साथ कोई जबरदस्ती नहीं की गई थी और अंतिम संस्कार में परिवार वालों को भी शामिल होने की अनुमति दी गई थी। एक घंटे कर्फ्यू में छूट भी दी गई थी, जिससे आनंदपाल के समर्थक उसके अंतिम संस्कार में शामिल हो सकें। लेकिन इस बयान से उलट परिवार वालों ने आरोप लगाया था कि पुलिस ने जबरदस्ती आनंदपाल का अंतिम संस्कार कराया।
ऐसा क्यों करती है पुलिस
इंडियन पब्लिक सर्विस एम्प्लाइज फेडरेशन के राष्ट्रीय अध्यक्ष वीपी मिश्रा ने अमर उजाला से कहा कि पुलिस कभी किसी व्यक्ति का अंतिम संस्कार गलत तरीके से नहीं करती है। इसके लिए हमेशा उसके ऊपर राजनीतिक दबाव होता है। राजनीतिक दबाव के कारण कुछ नए अधिकारी सत्ता से अपनी करीबी दिखाने के लिए नियमों की अवहेलना करते हैं, जिसके कारण कई बार उन्हें आलोचना का शिकार होना पड़ता है।
उन्होंने कहा कि आईएएस और आईपीएस जैसे सरकारी अफसरों की पहली ड्यूटी देश और नागरिकों के लिए होती है। उन्हें हमेशा कानून के मुताबिक काम करना चाहिए। किसी संवेदनशील स्थिति में परिवार और समाज के लोगों को साथ लेकर किसी समस्या का हल खोजने से इस तरह की स्थिति का सामना नहीं करना पड़ता है जैसा कि पुलिस को हाथरस में झेलना पड़ रहा है।
क्या कहता है कानून
सुप्रीम कोर्ट के वकील अश्विनी उपाध्याय ने कहा कि आनंदपाल सिंह का शव लगभग 20 दिनों तक रखा रह गया था। परिजन उसके शव का अंतिम संस्कार करने को तैयार नहीं थे। इस मामले में सुनवाई करते हुए मानवाधिकार आयोग ने कहा था कि मृतक के कुछ अधिकार होते हैं। उसका सम्मान अंतिम संस्कार किया जाना चाहिए। व्यक्ति का परिवार या पुलिस कोई भी उसके इस अधिकार का हनन नहीं कर सकता।
हाथरस के मामले में पुुलिस ने तकनीकी तौर पर कोई गलती नहीं की है, लेकिन इसके बाद भी परिवार वालों को साथ न लेने के आरोप संगीन हैं। पुलिस को ऐसे किसी भी मामले में संवेदनशीलता बरतनी चाहिए और परिवार-समाज को साथ लेकर समस्या का समाधान करना चाहिए।