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RSS: क्या आरएसएस ने गांधी को अपना लिया? मोहन भागवत का ये बयान बड़े बदलाव के संकेत

Thu, 02 Oct 2025 01:53 PM IST
Amit Sharma Digital अमित शर्मा
Updated Thu, 02 Oct 2025 01:53 PM IST
सार

मोहन भागवत ने संघ की स्थापना के सौ वर्ष पूरे होने के अवसर पर नागपुर में आयोजित एक कार्यक्रम में महात्मा गांधी की जमकर प्रशंसा की। उन्होंने गांधी को स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद भारत को एक जीवन दर्शन देने वाला 'शीर्ष दार्शनिक' नेता बताया।

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Has RSS embraced Gandhi Mohan Bhagwat's statement signals a major shift
पूर्वी दिल्ली में संघ के शताब्दी वर्ष पर आयोजित कार्यक्रम। - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) प्रमुख मोहन भागवत ने संघ की स्थापना के सौ वर्ष पूरे होने के अवसर पर नागपुर में आयोजित एक कार्यक्रम में महात्मा गांधी की जमकर प्रशंसा की। उन्होंने गांधी को स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद भारत को एक जीवन दर्शन देने वाला 'शीर्ष दार्शनिक' नेता बताया। आरएसएस नेता का यह बयान इस अर्थ में महत्त्वपूर्ण है कि वामपंथी विचारक और नेता हमेशा संघ पर गांधी के विचारों का 'विरोधी' होने के आरोप लगाते रहे हैं। गांधी की जयंती पर भी कांग्रेस नेता उदित राज ने संघ पर इसी तरह के आरोप लगाए हैं। ऐसे में संघ के सबसे बड़े नेता के द्वारा संगठन के शताब्दी वर्ष पर आयोजित महत्त्वपूर्ण कार्यक्रम में गांधी की प्रशंसा करना विशेष संकेत देने वाला वक्तव्य माना जा रहा है। क्या गांधी को लेकर संघ की विचारधारा में कोई बड़ा बदलाव आ रहा है? 

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हालांकि, एक तथ्य यह है कि आरएसएस के कार्यक्रमों में समय-समय पर न केवल महात्मा गांधी की तस्वीर लगाई जाती रही है, बल्कि उनके विचारों पर मंथन भी होता रहा है। इसलिए यह कहना सही नहीं होगा कि संघ के मंच पर पहली बार गांधी का उल्लेख हुआ है, या उनके विचारों को सही ठहराया गया है। लेकिन इसके बाद भी संघ ने आज महात्मा गांधी की प्रशंसा की है तो इसका एक बड़ा कारण यह है कि संघ आज जिस 'पंच परिवर्तन' की बात कर रहा है, गांधी ने अपने समय के अनुसार उन्हीं मूल्यों को सौ वर्ष पहले ही बता दिया था। 
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गांधी ने इन सिद्धांतों को न केवल बताया, बल्कि उसे जीकर भी दिखाया। संघ को अपने इन विचारों पर सबसे बड़ा समर्थन यदि कहीं से मिल सकता है तो वह महात्मा गांधी से ही मिल सकता है। आज भी देश के करोड़ों लोग महात्मा गांधी को अपना प्रेरणा स्रोत मानते हैं। ऐसे में यदि संघ को अपने सिद्धांतों को आम लोगों के बीच स्वीकार्य बनाना है तो भी उन्हें गांधी की आवश्यकता है। संभवतः यही कारण है कि मोहन भागवत ने उन्हें बड़ा विचारक बताया।
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संघ प्रमुख ने भारत के पड़ोसी देशों में हिंसात्मक तरीके से हो रहे उपद्रव पर भी चिंता व्यक्त की। उन्होंने कहा कि इस तरह के हिंसात्मक विद्रोह कभी स्थाई समाधान नहीं देते। उन्होंने कहा कि शांतिपूर्ण तरीके से ही बदलाव लाया जा सकता है। महात्मा गांधी ने इसी अहिंसात्मक तरीकों से चलकर देश को आजादी दिलाई थी। यानी आधुनिक विश्व की सबसे बड़ी चुनौतियों का समाधान भी गांधी दर्शन से ही आता है। ऐसे में उनकी स्वीकार्यता के अलावा संघ के पास कोई दूसरा विकल्प भी नहीं है।

ये भी पढ़ें: मोहन भागवत का संबोधन: पहलगाम हमला, टैरिफ...पड़ोस की उथल-पुथल से लेकर हिंदू राष्ट्र तक, जानें भाषण की अहम बातें


'संघ और गांधी यहां एक हो जाते हैें'
राजनीतिक विश्लेषक संजय त्रिपाठी ने अमर उजाला से कहा कि संघ को केवल हिंदुत्व की बात करने के कारण महात्मा गांधी से अलग विचारों वाला संगठन माना गया। लेकिन इसके अलावा अन्य किसी भी संदर्भ में देखने पर महात्मा गांधी और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के विचारों में कोई विरोध नहीं है। दोनों ही महत्त्वपूर्ण मुद्दों पर एक बिंदु पर सहमत दिखाई देते हैं। इसका सबसे बड़ा कारण यह है कि महात्मा गांधी और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ दोनों ही भगवान राम, सनातन धर्म और प्रकृति से अपनी प्रेरणा प्राप्त करते हैं। आरएसएस हिंदू राष्ट्र की स्थापना के लिए इन्हें महत्त्वपूर्ण मानता रहा है तो गांधी ने राम के आदर्श को अपने जीवन में जीकर दिखाया था।

उन्होंने कहा कि, मोहन भागवत ने आज के अपने संबोधन में पश्चिम की उस दृष्टि की आलोचना की है जिसमें उपभोगवाद को बढ़ावा दिया जाता है। उन्होंने कहा कि इस तरह भारत और विश्व का विकास नहीं हो सकता क्योंकि इस तरह से विकास में लोगों की आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए पांच और पृथ्वी की आवश्यकता पड़ेगी। महात्मा गांधी बहुत पहले ही इस अवधारणा को स्थापित कर चुके हैं। उन्होंने कहा था कि पृथ्वी के पास सबकी आवश्यकता की पूर्ति के लिए पर्याप्त संसाधन मौजूद हैं, लेकिन वह किसी एक की भी लालच का पोषण नहीं कर सकती। उन्होंने कहा कि ऐसे में आरएसएस और गांधी में परस्पर कोई विरोध नहीं है।

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