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Haryana: मायावती और चंद्रशेखर ने यूं ही नहीं चुना हरियाणा; आरक्षित सीटें 17, लेकिन असर दोगुनी सीटों पर
Mon, 02 Sep 2024 01:05 PM IST
अभिषेक दीक्षित
डिजिटल ब्यूरो, अमर उजाला, नई दिल्ली
डिजिटल ब्यूरो, अमर उजाला, नई दिल्ली
Published by: अभिषेक दीक्षित
Updated Mon, 02 Sep 2024 01:05 PM IST
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हरियाणा की राजनीति
- फोटो :
Amar Ujala
विस्तार
हरियाणा में होने वाले विधानसभा के चुनावों को लेकर दलितों की राजनीति के इर्द गिर्द सियासत समेटी जाने लगी है। कहने को तो आरक्षित कोटे में हरियाणा के हिस्से 17 सीटें दलितों के लिए हैं। लेकिन दलित राजनीति का असर हरियाणा की सियासत में तकरीबन चालीस फीसदी सीटों यानी कि तकरीबन 35 सीटों पर पड़ता है। यही वजह है कि कांग्रेस से लेकर भाजपा और बसपा से लेकर आजाद समाज पार्टी और जेजेपी समेत इनेलो जैसे दल दलितों को अपने पाले में करने के लिए सभी सियासी जोड़ तोड़ कर रहे हैं।
हरियाणा की सियासत में जाट के बाद सबसे बड़ा वोट बैंक दलितों का है। इस जातीयता के समीकरण को देखते हुए सभी जाट और दलितों को लेकर अपनी सियासी लकीरें आगे बढ़ाने में जुटे हैं। कांग्रेस तो दलित और जाट समुदाय को अपने साथ जोड़ने के लिए पूर्व मुख्यमंत्री भूपेंद्र सिंह हुड्डा, कुमारी शैलजा और प्रदेश अध्यक्ष चौधरी उधयभान के सहारे सियासी नैया लगाने की तैयारी कर रही है। दरसल इसी साल हुए लोकसभा के चुनाव में कांग्रेस ने अपने इसी सियासी कॉम्बिनेशन के चलते भाजपा से पांच सीटें झटक ली थीं। इसमें भी अंबाला और सिरसा जैसी आरक्षित सीटें भी कांग्रेस ने जीत ली थीं। इसी समीकरण को देखते हुए कांग्रेस ने इस बार विधानसभा चुनाव में वही फॉर्मुला अपनाया है।
दलितों, मुस्लिमों और जाट समुदाय के सियासी समीकरण को हरियाणा के चुनाव में खूब तवज्जो मिल रही है। दरअसल यह वही फैक्टर है, जिसके दम पर इस बार राजनीतिक दल यहां सरकार बनाने की जुगत लगा रहे हैं। इसी के मद्देनजर बसपा ने इस चुनाव में अपने मजबूत सिपाही आकाश आनंद को यहां की सियासत में एक फिर से बड़ी जिम्मेदारी के साथ मैदान में उतारा है। दरअसल पिछले विधानसभा के चुनाव में बसपा ने सीटें तो एक भी नहीं पाई थी, लेकिन दलितों के सहारे वोट प्रतिशत हरियाणा के स्थानीय दलों की तुलना में बेहतर हासिल किया था। इस बार फिर बसपा उससे बेहतर करने की उम्मीद में यहां के सियासी मैदान में उतरी है। पिछले चुनाव ने बसपा ने 87 सीटों पर चुनाव लड़ा था। इनमें से 82 सीटों पर बसपा की जमानत तक जब्त हो गई थी। बावजूद इसके बसपा ने 4 फीसदी से ज्यादा वोट पाए थे। इस बार बसपा और इनेलो का गठबंधन है। इनेलो भी दलित वोटों के फेर में बसपा से वोट ट्रांसफर की उम्मीद लिए बैठी है।
हरियाणा में दलितों की मजबूत सियासी भागीदारी देखते हुए ही नगीना के सांसद चंद्रशेखर ने भी अपनी पार्टी आजाद समाज पार्टी को मैदान में उतारा है। राजनैतिक नजरिए से चंद्रशेखर ने अपनी पार्टी को हरियाणा की जेजीपी के साथ हाथ मिलाया है। दरअसल दोनो सियासी दल दलितों के वोट बैंक के सहारे हरियाणा में सियासी नैया पार लगाना चाहते हैं। इस सियासी करार के तहत 70 सीटों पर तो जेजेपी चुनाव लड़ेगी। जबकि 20 सीटों पर चंद्रशेखर की पार्टी किस्मत आजमाएगी। पिछले विधानसभा के चुनावों में जेजेपी ने 87 सीटों पर चुनाव लड़ा था। तकरीबन पंद्रह फीसदी वोट मिलने के साथ ही दस सीटों पर जेजीपी को जीत भी मिली थी। हालांकि इस जीत के बाद दुष्यंत चौटाला ने भाजपा के साथ मिलकर सरकार बनाई। लेकिन बाद में लोकसभा चुनावों से पहले यह गठबंधन टूट गया। अब इस चुनाव ने दलितों का सहारा लेकर जेजेपी सियासी मैदान में है।