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हरियाणा में मंत्रिमंडल विस्तार को लेकर 'आगे कुआं पीछे खाई' के फेर में फंसे मुख्यमंत्री खट्टर

Wed, 13 Nov 2019 10:03 PM IST
आसिम खान जितेंद्र भारद्वाज, नई दिल्ली   
जितेंद्र भारद्वाज, नई दिल्ली    Published by: आसिम खान Updated Wed, 13 Nov 2019 10:03 PM IST
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Haryana Chief Minister Manohar Lal Khattar in trouble due to cabinet expansion
मनोहर लाल खट्टर (फाइल फोटो)

हरियाणा की भाजपा-जेजेपी सरकार का पहला मंत्रिमंडल विस्तार वीरवार को होने जा रहा है। इसे लेकर मुख्यमंत्री मनोहर लाल खट्टर पर चौतरफा दबाव है। अपनी सहयोगी पार्टी जजपा के कितने सदस्यों को मंत्री पद देना है, निर्दलीयों को कहां और कैसे एडजस्ट करना है और भाजपा के किन धुरंधरों को सत्ता की कुर्सी दी जाए, इन सब सवालों के चक्कर में मुख्यमंत्री मनोहर लाल खट्टर 'आगे कुआं पीछे खाई' के फेर में फंसे नजर आ रहे हैं। 

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मंत्रिमंडल विस्तार में यदि जजपा को अहम विभाग दिए जाते हैं तो वह लंबे वक्त में भाजपा सरकार के स्वास्थ्य के लिए ठीक नहीं होंगे। दूसरी ओर, निर्दलीयों को सिर पर बैठाया जाता है तो वह भी देर सवेर खट्टर सरकार को परेशानी में डाल सकते हैं। यही वजह है कि भाजपा-जेजेपी सरकार का पहला मंत्रिमंडल विस्तार मुख्यमंत्री खट्टर के लिए 'आगे कुआं पीछे खाई' साबित होता दिख रहा है। 
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दिल्ली के भाजपा नेताओं का कहना है कि मंत्रिमंडल विस्तार में लगभग सात-आठ मंत्री भाजपा के कोटे से, दो जजपा से और किसी एक निर्दलीय को सत्ता सुख का लाभ मिल सकता है। यह भी संभावना है कि पहले मंत्रिमंडल विस्तार में किसी भी निर्दलीय को मंत्री पद न मिले। उन्हें दूसरे मंत्रिमंडल विस्तार में जगह मिल सकती है या जल्द ही चेयरमैन पद देकर संतुष्ट करने का प्रयास किया जाएगा। 
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पहले मंत्रिमंडल विस्तार में कुछ इस तरह का समीकरण रहेगा
हरियाणा में 90 सदस्यीय विधानसभा है। इसमें मुख्यमंत्री व उप मुख्यमंत्री को मिलाकर कुल 14 मंत्री बनाए जा सकते हैं। मनोहर लाल सीएम तो दुष्यंत चौटाला डिप्टी सीएम बन चुके हैं। अब नई कैबिनेट में 12 मंत्री बनाए जाने की गुंजाइश है।  इनमें सबसे बड़ी चुनौती निर्दलीय विधायकों को एडजेस्ट करने की है। बुधवार को प्रदेश के पांच निर्दलीय विधायक दिल्ली दरबार में घूमकर मंत्री पद लेने की जुगत भिड़ाते रहे। भाजपा के 40 विधायक हैं। उन्हें जजपा के दस विधायकों का समर्थन हासिल है, जबकि छह सात निर्दलीय विधायक भी भाजपा सरकार को समर्थन देने की बात कह चुके हैं। 

जजपा नेता और डिप्टी सीएम दुष्यंत चौटाला के साथ भाजपा की बात हो चुकी है। जजपा को डिप्टी सीएम सहित तीन मंत्री पद मिलने हैं। एक पद मिल चुका है, दो बाकी हैं। मंत्रिमंडल विस्तार में जजपा के कोटे से दो मंत्री बनाए जाएंगे। भाजपा के सात-आठ विधायकों को मंत्री पद मिलना तय है। रही बात निर्दलीयों की तो इसे लेकर मुख्यमंत्री सबसे ज्यादा परेशान हैं। अधिकांश निर्दलीय विधायक तो ऐसे हैं जो पहले भाजपा में ही थे। 

जब टिकट नहीं मिला तो वे निर्दलीय प्रत्याशी के तौर पर मैदान में कूद गए और जीत भी दर्ज करा दी। खास बात है कि इन निर्दलीय विधायकों ने उस वक्त भाजपा को समर्थन देने की बात कही थी, जब भाजपा और जजपा के बीच समझौते की बात चल रही थी। गोपाल कांडा पांच विधायकों को लेकर दिल्ली पहुंच गए थे। उसी वक्त मीडिया ने उनके पुराने मामलों को उठा दिया तो भाजपा और कांडा को भी कदम पीछे खींचना पड़ा। 

इस तरह फंस गए हैं मनोहर लाल खट्टर

जगजाहिर है कि भाजपा और जजपा का राजनीतिक एजेंडा किसी भी तरह से मेल नहीं खाता है। वक्त का तकाजा कहें या राजनीतिक मजबूरी, जिसके चलते इन दोनों पार्टियों को साथ आना पड़ा। इस चुनाव से पहले भाजपा का वोट बैंक गैर-जाट वोटरों तक सीमित रहा था। हालांकि लोकसभा चुनाव में जाट वोटरों ने भी भाजपा को समर्थन दिया था। विधानसभा चुनाव में भाजपा ने जाटों को खुश करने के लिए उन्हें खूब टिकट बांटे, लेकिन इसके बावजूद वोट नहीं मिल सके। जाटों के वोट जजपा और कांग्रेस के पक्ष में चले गए। 

राजनीतिक विश्लेषक एवं शोधार्थी रविंद्र कुमार का कहना है कि भाजपा यह बात अच्छी तरह से जानती है कि उसे मंत्रिमंडल में किन जातियों को कितना प्रतिनिधित्व देना है। यहां पर मनोहर लाल खट्टर बुरी तरह फंस गए हैं। यदि वे जजपा को ठीक ठाक विभाग देते हैं तो वह कल को भाजपा के लिए ही मुसीबत बन सकती है। जजपा नई पार्टी है, उसे अपने पांव जमाने हैं, इसलिए दुष्यंत चौटाला सरकार के हर स्तर पर सांझेदारी चाहेंगे। यह भी संभव है कि जजपा जाट वोट बैंक को ध्यान में रखकर आगे बढ़े। 

दूसरी ओर, भाजपा इस बार यह प्रयास करेगी कि उसका पुराना वोट बैंक यानी गैर जाट वोट, वापस आ जाए। यह एक ऐसा चौराहा होगा, जहां पर दोनों पार्टियों की टकराहट हो सकती है। इसके अलावा बिना पार्टी में शामिल हुए यदि निर्दलीय विधायकों को पद दिए जाते हैं तो वह भी भाजपा के लिए परेशानी भरा कदम होगा। एक तरफ दुष्यंत चौटाला खट्टर सरकार पर दबाव बनाए रखेंगे तो दूसरी तरफ निर्दलीय विधायक भी समय समय पर नुकीले पदार्थ की भांति एक चुभन का अहसास भाजपा को दिलाते रहेंगे। 

अब जानिये किसे मिल सकता है मंत्री पद
मंत्रिमंडल विस्तार से पहले सीएम मनोहर लाल ने पाचों निर्दलीय विधायकों और भाजपा विधायकों को डिनर पर बुलाया है। ये वही निर्दलीय विधायक हैं, जो दिनभर केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह से मिलने के लिए चक्कर काटते रहे। निर्दलीय विधायकों में से रणजीत सिंह को मंत्री बनाए जाने की चर्चा है। यह भी तय है कि रणजीत सिंह को मंत्री बनाया जाता है तो महम सीट से निर्दलीय विधायक बलराज कुंडू की नाराजगी भाजपा को झेलनी पड़ सकती है। इतना ही नहीं, कुंडू यह दावा कर रहे हैं कि उनके साथ चार अन्य विधायक भी हैं। 

दूसरे निर्दलीय विधायकों में रणधीर गोलन, नयनपाल रावत, सोमवीर सांगवान और धर्मपाल गोंदर शामिल हैं। भाजपा की ओर से अनिल विज, कंवरपाल गुर्जर, महिपाल ढांढा, सीमा त्रिखा, दीपक मंगला, बनवारी लाल और कमल गुप्ता का नाम मंत्रियों की सूची में शामिल हो सकता है। जजपा कोटे से राम कुमार गौतम का नाम सबसे आगे है। उन्होंने वित्त मंत्री कैप्टन अभिमन्यु को हराया था। ईश्वर सिंह का नाम भी चल रहा है। निर्दलीय विधायकों में से बलराज कुंडू और रणजीत सिंह का नाम लिया जा रहा है। 

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