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Haryana: हरियाणा में चौधराहट के घरानों का वर्चस्व तोड़ती BJP, अब पांच परिवार नहीं, आम कार्यकर्ता बन रहे सीएम

Jitendra Bhardwaj जितेंद्र भारद्वाज
Updated Tue, 12 Mar 2024 06:08 PM IST
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सार
साल 2014 में मनोहर लाल खट्टर को मुख्यमंत्री बनाया गया था। खट्टर और सैनी, ये दोनों ऐसे नाम हैं, जिनकी प्रदेश के राजनीतिक पटल पर कोई बड़ी पहचान नहीं रही। मुख्यमंत्री बनने से पहले खट्टर एक सामान्य कार्यकर्ता रहे थे। हालांकि आरएसएस में उनकी सक्रियता लगातार रही है...
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Haryana: BJP is breaking the dominance of Chaudhary families in Haryana, common workers are becoming CM
Haryana - फोटो : Amar Ujala/ Sonu Kumar

विस्तार

हरियाणा की राजनीति में दशकों तक पांच घरानों का वर्चस्व रहा है। अब भाजपा उस वर्चस्व को तोड़ती हुई नजर आ रही है। मंगलवार को जब नायब सैनी को हरियाणा का मुख्यमंत्री बनाया गया, तो यह बात और ज्यादा पुख्ता हो गई। साल 2014 में मनोहर लाल खट्टर को मुख्यमंत्री बनाया गया था। खट्टर और सैनी, ये दोनों ऐसे नाम हैं, जिनकी प्रदेश के राजनीतिक पटल पर कोई बड़ी पहचान नहीं रही। मुख्यमंत्री बनने से पहले खट्टर एक सामान्य कार्यकर्ता रहे थे। हालांकि आरएसएस में उनकी सक्रियता लगातार रही है। इसी तरह मौजूदा सांसद नायब सैनी, जो पहले हरियाणा सरकार में राज्य मंत्री रहे हैं, उनका प्रदेश की सियासत में कोई खास प्रभाव नहीं था। उन्हें गत वर्ष ही भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष बनाया गया था। 2014 से पहले प्रदेश की सियासत में पांच राजनीतिक घरानों से ही कोई न कोई व्यक्ति मुख्यमंत्री के पद पर काबिज रहा था।

जानकारों का कहना है कि प्रदेश की सियासत में पांच घरानों ने परिवारवाद की कहानी को आगे बढ़ाया है। भूपेंद्र सिंह हुड्डा, दस साल तक प्रदेश के मुख्यमंत्री रहे हैं। उनके पिता एवं स्वतंत्रता सेनानी रणबीर हुड्डा आजादी के बाद पहली बार रोहतक सीट से ही जीत दर्ज करा कर संसद पहुंचे थे। वे दूसरी बार भी लोकसभा के लिए चुने गए। उसके बाद वे एमएलए भी रहे और बाद में राज्यसभा सांसद बने। भूपेंद्र हुड्डा चार बार सांसद रहे हैं। भूपेंद्र हुड्डा के बेटे दीपेंद्र हुड्डा भी तीन बार लोकसभा सांसद रह चुके हैं। गत लोकसभा चुनाव में पिता पुत्र दोनों हार गए थे। फिलहाल भूपेंद्र हुड्डा विधायक तो दीपेंद्र हुड्डा राज्यसभा सांसद हैं।

प्रदेश में तीन बार मुख्यमंत्री पद की कमान संभालने वाले स्व: चौधरी भजनलाल ने अपने राजनीतिक करियर की शुरुआत ग्राम पंचायत में पंच बनकर की थी। वे नौ बार विधायक चुने गए थे। उन्होंने जब भी आदमपुर से चुनाव लड़ा, तो वहां की जनता ने सदैव उन्हें विजयी बनाया। उनके बेटे चंद्रमोहन प्रदेश में डिप्टी सीएम रह चुके हैं। दूसरे बेटे कुलदीप बिश्नोई लोकसभा सांसद और विधायक भी रहे हैं। उनकी पत्नी रेणुका बिश्नोई भी विधायक रही हैं। गत लोकसभा चुनाव में उनके बेटे भव्य बिश्नोई ने हिसार सीट से लोकसभा चुनाव लड़ा, लेकिन वे हार गए थे। हालांकि नवंबर 2022 के उपचुनाव में भव्य बिश्नोई ने जीत दर्ज कराई थी।  

स्व: बंसीलाल तीन बार प्रदेश के मुख्यमंत्री रहे थे। उसके बाद उनकी राजनीतिक विरासत को छोटे बेटे सुरेंद्र सिंह ने आगे बढ़ाया। सुरेंद्र सिंह, लोकसभा सांसद, राज्यसभा सांसद और विधायक भी रहे। उन्होंने 1996 और 1998 का लोकसभा चुनाव जीता था। 2005 में एक हेलीकॉप्टर हादसे में उनकी मौत हो गई थी। उनके बाद पत्नी किरण चौधरी विधायक बनीं। वे कई विधायक चुनी गई हैं। उनकी बेटी श्रुति चौधरी ने 2009 में भिवानी सीट से लोकसभा चुनाव जीता था। 2014 और 2019 में वे हार गईं। किरण चौधरी के अलावा बंसीलाल के दूसरे बेटे रणबीर महेंद्रा और दामाद सोमबीर भी राजनीति में रहे हैं।

स्व: देवीलाल, जिन्हें लोग प्यार से ताऊ कहते थे, वे भी दो बार हरियाणा के सीएम रहे हैं। इससे पहले वे पंजाब में भी विधायक बने थे। वे देश के उप प्रधानमंत्री भी रहे। देवीलाल के बाद उनके बेटे ओमप्रकाश चौटाला ने राजनीतिक विरासत संभाली। हरियाणा में चौटाला चार बार मुख्यमंत्री बने। चौटाला के बड़े बेटे अजय चौटाला हरियाणा और राजस्थान में विधायक रहे हैं। वे लोकसभा सांसद भी चुने गए। बाद में शिक्षक भर्ती घोटाले में इन दोनों को 10 साल की जेल हो गई। चौटाला के छोटे बेटे अभय चौटाला ने इनेलो पार्टी की कमान संभाली। उधर, अजय चौटाला के बेटे दुष्यंत चौटाला भी सांसद बन गए। दुष्यंत के छोटे भाई दिग्विजय भी राजनीति में आ गए। अजय की पत्नी नैना चौटाला भी विधायक बन गईं। दुष्यंत चौटाला ने अलग पार्टी जजपा का गठन कर लिया। 2019 में भाजपा जजपा गठबंधन की सरकार में डिप्टी सीएम बने थे। चौ. छोटूराम के राजनीतिक वंशज, चौधरी बीरेंद्र सिंह हैं। वे मोदी सरकार में मंत्री रहे हैं। राज्यसभा सांसद भी रहे हैं। बीरेंद्र सिंह 5 बार विधायक भी रहे। उनके बेटे ब्रजेंद्र सिंह सांसद बने हैं। ब्रजेंद्र सिंह की मां प्रेमलता भी विधायक रही हैं।

केंद्रीय मंत्री, राव इंद्रजीत सिंह के पिता राव बीरेंद्र सिंह भी हरियाणा के मुख्यमंत्री रहे हैं। राव इंद्रजीत सिंह 1977 से 1996 के बीच चार बार विधानसभा सदस्य चुने जा चुके हैं। वे दो बार महेंद्रगढ़ सीट से और दो बार गुरुग्राम से लोकसभा में पहुंचे हैं। 2014 में राव इंद्रजीत सिंह ने कांग्रेस पार्टी को अलविदा कह दिया था। वे भाजपा में शामिल हो गए।

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