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सतर्कता: मोबाइल देकर बहलाना...बच्चों का बिगाड़ सकता है भविष्य; इस कारण नहीं सीख पाते गुस्से पर काबू रखना
Sat, 29 Jun 2024 05:18 AM IST
शिव शरण शुक्ला
अमर उजाला ब्यूरो
अमर उजाला ब्यूरो
Published by: शिव शरण शुक्ला
Updated Sat, 29 Jun 2024 05:18 AM IST
सार
हंगरी के ईटवोस लोरैंड यूनिवर्सिटी की शोधकर्ता वेरोनिका कोनोक कहती हैं कि माता-पिता को यह समझना जरूरी है कि बच्चों की तरफ से कोई भी नकारात्मक भावना व्यक्त किए जाने को डिजिटल डिवाइस के सहारे दूर नहीं किया जा सकता।
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सांकेतिक तस्वीर
- फोटो : istock
विस्तार
बच्चों के नखरों से परेशान होकर बहलाने-फुसलाने के लिए उन्हें डिजिटल डिवाइस थमाना सीधे तौर पर उनके भविष्य के साथ खिलवाड़ है। यह उनमें भावनात्मक कमजोरी की वजह बन सकता है।
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एक सर्वे की मानें तो भारत में 12 साल से कम उम्र के 47 फीसदी बच्चे हर दिन दो से चार घंटे मोबाइल फोन या टैबलेट से चिपके रहते हैं। माता-पिता की समस्या यह है कि जैसे ही बच्चों से फोन लेंगे, तो वह रोना-धोना शुरू कर देते हैं। मजबूरन माता-पिता को उन्हें चुप कराने के लिए डिजिटल डिवाइस देना ही पड़ता है। शोध से पता चला कि आगे चलकर ऐसे बच्चों का भावनात्मक संतुलन बिगड़ सकता है, जिससे उनके लिए अपने गुस्से पर काबू रख पाना मुश्किल होगा। हंगरी और कनाडा के शोधकर्ताओं की एक टीम ने एक से पांच वर्ष तक के बच्चों पर अध्ययन में पाया कि जो बच्चे जितने ज्यादा नखरे दिखा रहे थे, उनके माता-पिता उन्हें डिजिटल उपकरण थमाने में उतने ही आगे थे। दूसरे शब्दों में कहें तो अध्ययन यह साबित करता है कि जो माता-पिता अपने बच्चों को शांत रखने के लिए जितनी आसानी से जल्दी फोन-टैबलेट उन्हें दे देते हैं वो इसे पाने के लिए उतनी ही ज्यादा हाय-तौबा मचाते हैं।
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बच्चों को शांत करने के दूसरे तरीके ढूंढ़ें
हंगरी के ईटवोस लोरैंड यूनिवर्सिटी की शोधकर्ता वेरोनिका कोनोक कहती हैं कि माता-पिता को यह समझना जरूरी है कि बच्चों की तरफ से कोई भी नकारात्मक भावना व्यक्त किए जाने को डिजिटल डिवाइस के सहारे दूर नहीं किया जा सकता। रोते-धोते या आक्रामकता दर्शाते बच्चे को शांत करने के लिए उन्हें दूसरे तरीके अपनाने होंगे।
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बचपन में ही विकसित होता है आत्मनियंत्रण
शोधकर्ता कहते हैं कि यह तथ्य जगजाहिर है कि बचपन के शुरुआती पड़ाव में ही बच्चे आत्म-नियंत्रण के बारे में बहुत कुछ सीखते हैं। यही आगे चलकर उन्हें अपनी भावनाओं को प्रभावी ढंग से व्यक्त करने और चुनौतियों से जूझने में सक्षम बनाता है। सीखने-समझने की इस प्रक्रिया के दौरान उन्हें माता-पिता की मदद होती है न कि डिजिटल डिवाइस के सहारे की।
जरूरत पड़े तो स्वास्थ्य पेशेवरों की सहायता लें
- शोधकर्ताओं की सलाह है कि बच्चों को ऐसी निराशाजनक स्थितियों से बाहर लाने के लिए माता-पिता भावनात्मक तौर पर उनका सहारा बनें।
- उन्हें अपनी भावनाओं को पहचानना सिखाएं। यह उनके मानसिक विकास के लिए बेहद अहम है।
- अगर बच्चे को समझाना-बुझाना मुश्किल होता जा रहा हो तो स्वास्थ्य पेशेवरों की सहायता लेने में न हिचकिचाएं।