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'बिना अमेरिका हम ‘जी’ लेंगे, लेकिन तरक्की धीमी होगी': भारतीय पेशेवरों को उम्मीद, अक्तूबर तक पटरी पर आएगी गाड़ी

Mon, 22 Sep 2025 10:02 PM IST
Shashidhar Pathak शशिधर पाठक
Updated Mon, 22 Sep 2025 10:02 PM IST
सार

अमेरिका के राष्ट्रपति ट्रंप ने एच1 बी वीजा के लिए ‘फीस’अप्रत्याशित तरीके से बढ़ा दी है। राजेश चौधरी कहते हैं कि इतनी बड़ी फीस देकर अमेरिकी कंपनियां और अमेरिका में काम कर रही भारतीय कंपनियां भी आईटी युवाओं को लेने से परहेज करेंगी। जो युवा वहां हैं, उनका करार खत्म हो रहा है, उनके सामने रोजगार का संकट खड़ा हो जाएगा।

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H 1B visa Indian professionals hope to get back on track by October
H-1B Visa - फोटो : Adobe Stock

विस्तार

विदेश मंत्री एस जयशंकर और वाणिज्य मंत्री पीयूष गोयल अपनी टीम के साथ अमेरिका में हैं। दोनों मंत्रालय को वहां से अच्छी खबर आने की उम्मीद है। एल एंड टी की आईटी क्षेत्र की कंपनी ‘माइंड ट्री’ के अधिकारी राजेश चौधरी को भी यही भरोसा है। चौधरी कहते हैं कि अमेरिका के बगैर हम ‘जी’लेंगे, लेकिन हमारी तरक्की धीमी हो जाएगी।

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आईबीएम के एके सिंह कहते हैं कि अमेरिका को भी भारत से रिश्ते सख्त रखने की बड़ी कीमत चुकानी पड़ेगी। एचपी के नितिन का कहना है कि भारतीय पेशेवरों के बगैर अमेरिका के वैश्विक मानचित्र पर चमकने में बड़ी मुश्किल आएगी। नितिन कहते हैं कि अमेरिका आईटी क्षेत्र की कंपनियों ने राष्ट्रपति ट्रंप और उनके प्रशासन पर दबाव डालना शुरू कर दिया है। उम्मीद है कि जल्द ही एच1बी वीजा का मामला सुलझ जाएगा। पूर्व विदेश सचिव शशांक भी अमेरिका में हैं। बताते हैं कि अमेरिका के रुख को लेकर भारतीयों में वहां काफी चिंता देखी जा रही है। दिल्ली के संजय बग्गा ने मैरिएट से बताया कि ट्रंप के राष्ट्रपति बनने के बाद से भारतीय युवा काफी मानसिक तनाव में हैं। संजय कहते हैं कि हम लोगों को इसकी आशंका पहले से थी।
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एच 1बी मामले में अमेरिका को क्या दिक्कत आएगी?
राजेश चौधरी कहते हैं कि भारत के आईआईटी का क्रीमी युवा अमेरिका में सामान्य वेतनमान पर नौकरी करता है। उसे बहुत कम दाम में हमारी ‘क्रीम’मिल जाती है। इस मेहनतकश मैनपॉवर के सामने अमेरिकी युवा न तो इतने दक्ष होते हैं, न क्रियाशील। दूसरे वेतनमान में बहुत मंहगे होते हैं। माइक्रोसॉफ्ट में अमेरिका में काम कर रहे अंकुर कहते हैं कि यहां एच1बी वीजा वाले युवा काफी तनाव में हैं। चाहे आईबीएम हो या एचपी समेत दुनिया की तमाम दिग्गज आईटी क्षेत्र की कंपनियां, भारतीय युवा पहली पसंद होते हैं। अंकुर कहते हैं कि सिलिकॉन वैली में भारतीय बड़ी मात्रा में हैं, लेकिन अधिकांश के माथे पर चिंता की लकीरें हैं। आईटी के क्षेत्र में इतनी संख्या में पेशेवर दुनिया के किसी भी देश के पास नहीं है। एके सिंह और नितिन कहते हैं कि जैसे दिल्ली, महाराष्ट्र का पहिया चलाने के लिए बिहार के लोग जरूरी हैं, उसी तरह अमेरिका के लिए भारतीय पेशेवरों की जरूरत पड़ेगी। तीनों आईटी एक्सपर्ट कहते हैं कि अमेरिका के लिए ये भारतीय पेशेवर ‘व्हाइट कॉलर लेबर’ हैं। आईटी एक्सपर्ट का कहना है कि भारतीय युवा यूरोपीय और अमेरिकी दोनों अंग्रेजी में काम करने में कुशल होते हैं। जबकि चीन के युवाओं की यह कमजोरी है। वह अंग्रेजी के मामले में तंग होते हैं। यही कारण है कि भारतीयों की मांग काफी है।
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भारत पर कौन सा खतरा मंडरा रहा है?
अमेरिका के राष्ट्रपति ट्रंप ने एच1 बी वीजा के लिए ‘फीस’अप्रत्याशित तरीके से बढ़ा दी है। राजेश चौधरी कहते हैं कि इतनी बड़ी फीस देकर अमेरिकी कंपनियां और अमेरिका में काम कर रही भारतीय कंपनियां भी आईटी युवाओं को लेने से परहेज करेंगी। जो युवा वहां हैं, उनका करार खत्म हो रहा है, उनके सामने रोजगार का संकट खड़ा हो जाएगा। संभवत: एक लाख करीब युवाओं के सामने सीधा संकट खड़ा हो सकता है। नितिन कहते हैं कि महाराष्ट्र का पुणे, कर्नाटक का बेंग्लुरू, हरियाणा का गुरुग्राम, आंध्रप्रदेश-तेलंगाना का हैदराबाद, उ.प्र. का नोएडा समेत तमाम देश का आईटी सेक्टर का हब बनते शहर इसी से गुलजार हैं। भारतीय पेशेवर अमेरिकी कंपनियों, लोगों के लिए काम करते हैं और बदले में देश को अरबों डॉलर की आमदनी होती है। नितिन कहते हैं कि इससे देश की आईटी कंपनियों की ‘ग्रोथ’रुक सकती है। पिछले कई वर्षों से इनक्रीमेंट की रफ्तार धीमी थी। यह आगे भी इसी तरह से रह सकती है। एके सिंह कहते हैं कि सवाल एच1बी वीजा का ही नहीं है। अभी अमेरिका ने केवल एक मामले में ‘आर्म ट्विस्टिंग’ की है। अमेरिकी इसके आगे बढ़े तो मुश्किल होगी।


ये भी पढ़ें: UK Visa Fee: युवाओं को लुभाने की ताक में ब्रिटिश सरकार, अमेरिकी वीजा शुल्क 88 लाख होने के बाद जीरो फीस पर मंथन

सवाल अमेरिका का नहीं है....
विदेश मामलों के जानकार वरिष्ठ पत्रकार रंजीत कुमार कहते हैं कि यहां सवाल अमेरिका का ही नहीं है। जिस तरीके से राष्ट्रपति ट्रंप चल रहे हैं, उससे लग रहा है कि बात न बनने पर कई दिक्कतें आ सकती हैं। अमेरिकी प्रशासन यूरोप पर भी भारत से सीमित रिश्ते का दबाव बना सकता है। राष्ट्रपति ट्रंप का प्रशासन भारत के साथ टैरिफ बढ़ाने को लेकर रूस से सस्ता तेल लेने का कारण बताता है। भारतीय कंपनियां कच्चा को रूस से सस्ता  में लेकर रिफाइन  करती हैं और उसे यूरोप के देशों को बेच देती हैं। इससे रूस की अर्थ व्यवस्था बेअसर है और भारत को भी लाभ हो रहा है। इसी को ट्रंप प्रशासन निशाना बना रहा है। वह रूस से सस्ता तेल खरीदना बंद न करने पर आर्थिक प्रतिबंध लगाने की चेतावनी दे रहा है। भारत इस स्थिति से बचना चाहता है। क्योंकि इसका असर हमारे विकास पर पड़ेगा।

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