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Exclusive: मोदी या राहुल किसके लिए सियासी 'वाटरलू' साबित होगा गुजरात
विनोद अग्निहोत्री, नई दिल्ली
Updated Wed, 25 Oct 2017 05:10 PM IST
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नरेंद्र मोदी
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पहले हिमाचल प्रदेश और अब गुजरात चुनावों की घोषणा के साथ ही देश का सियासी तापमान ऊपर चढ़ने लगा है। इन दोनों राज्यों में भाजपा और कांग्रेस से ज्यादा सियासी प्रतिष्ठा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी की दांव पर लगी है। क्योंकि ये चुनावी नतीजे खासकर गुजरात के जनादेश का सीधा असर इन दोनों के राजनीतिक भविष्य पर पड़ेगा।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के लिए ये चुनाव उनकी लोकप्रियता का नया पैमाना साबित होंगे तो राहुल गांधी के लिए इन चुनावों के नतीजे उनकी भविष्य की राजनीति की इबारत लिखेंगे। ये चुनाव इन दोनों में से किसका वाटरलू साबित होंगे, यह फैसला 18 दिसंबर को तब होगा जब नतीजे सामने आएंगे।
मोदी-शाह की जोड़ी के लिए अहम हैं गुजरात चुनाव
पहले बात नरेंद्र मोदी की, क्योंकि गुजरात उनका गृह राज्य है और हिमाचल प्रदेश के वह कई सालों तक प्रभारी महासचिव रहे हैं और राज्य भाजपा के ज्यादातर नेता उनके द्वारा ही आगे बढ़ाए गए हैं। हिमाचल प्रदेश में मोदी ने अपनी संगठन क्षमता और सियासी सूझबूझ साबित करके भाजपा संगठन में अपनी इतनी अहम जगह बनाई थी कि बिना किसी पूर्व प्रशासनिक और विधायी अनुभव के उन्हें 2001 में केशुभाई पटेल को हटाकर गुजरात का मुख्यमंत्री बनाया गया था।
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पढ़े: हार्दिक की मांगों को अमली जामा पहनाने में जुटी कांग्रेस की कोर टीम
उसके बाद नरेंद्र मोदी ने पीछे मुड़कर नहीं देखा और उनके नेतृत्व में न सिर्फ भाजपा तीन बार लगातार विधानसभा चुनाव जीती बल्कि गुजरात ने ही मोदी के लिए प्रधानमंत्री पद का रास्ता खोला। मोदी सरकार के दौरान गुजरात की विकास गाथा ही 2014 के लोकसभा चुनाव में भाजपा का सबसे बड़ा राजनीतिक अस्त्र थी और गुजरात मॉडल की गूंज देश-विदेश में गूंजी। कहा जा सकता है कि नरेंद्र मोदी की राजनीति का अमृत कुंड गुजरात ही है और अगर वह गुजरात में फिर कामयाब होते हैं तो उनका सियासी डंका आगे भी बजता रहेगा, यह संदेश देश में जाएगा।
लेकिन अगर गुजरात कहीं भाजपा के हाथ से फिसल गया तो मोदी और भाजपा का सियासी अमृत कुंड सूख सकता है, क्योंकि मौजूदा भाजपा अध्यक्ष अमित शाह भी गुजरात से ही हैं और विपरीत चुनाव नतीजों का असर उनके राजनीतिक प्रभाव पर भी पड़ेगा। गुजरात एक मायने में मोदी और शाह के लिए उत्तर प्रदेश के चुनाव नतीजों से भी ज्यादा अहम इसलिए भी है कि यहां के चुनाव नतीजे आगे के विधानसभा चुनावों और 2019 के लोकसभा चुनावों में भाजपा का ग्राफ भी तय करेंगे।
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प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के लिए ये चुनाव उनकी लोकप्रियता का नया पैमाना साबित होंगे तो राहुल गांधी के लिए इन चुनावों के नतीजे उनकी भविष्य की राजनीति की इबारत लिखेंगे। ये चुनाव इन दोनों में से किसका वाटरलू साबित होंगे, यह फैसला 18 दिसंबर को तब होगा जब नतीजे सामने आएंगे।
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मोदी-शाह की जोड़ी के लिए अहम हैं गुजरात चुनाव
पहले बात नरेंद्र मोदी की, क्योंकि गुजरात उनका गृह राज्य है और हिमाचल प्रदेश के वह कई सालों तक प्रभारी महासचिव रहे हैं और राज्य भाजपा के ज्यादातर नेता उनके द्वारा ही आगे बढ़ाए गए हैं। हिमाचल प्रदेश में मोदी ने अपनी संगठन क्षमता और सियासी सूझबूझ साबित करके भाजपा संगठन में अपनी इतनी अहम जगह बनाई थी कि बिना किसी पूर्व प्रशासनिक और विधायी अनुभव के उन्हें 2001 में केशुभाई पटेल को हटाकर गुजरात का मुख्यमंत्री बनाया गया था।
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उसके बाद नरेंद्र मोदी ने पीछे मुड़कर नहीं देखा और उनके नेतृत्व में न सिर्फ भाजपा तीन बार लगातार विधानसभा चुनाव जीती बल्कि गुजरात ने ही मोदी के लिए प्रधानमंत्री पद का रास्ता खोला। मोदी सरकार के दौरान गुजरात की विकास गाथा ही 2014 के लोकसभा चुनाव में भाजपा का सबसे बड़ा राजनीतिक अस्त्र थी और गुजरात मॉडल की गूंज देश-विदेश में गूंजी। कहा जा सकता है कि नरेंद्र मोदी की राजनीति का अमृत कुंड गुजरात ही है और अगर वह गुजरात में फिर कामयाब होते हैं तो उनका सियासी डंका आगे भी बजता रहेगा, यह संदेश देश में जाएगा।
लेकिन अगर गुजरात कहीं भाजपा के हाथ से फिसल गया तो मोदी और भाजपा का सियासी अमृत कुंड सूख सकता है, क्योंकि मौजूदा भाजपा अध्यक्ष अमित शाह भी गुजरात से ही हैं और विपरीत चुनाव नतीजों का असर उनके राजनीतिक प्रभाव पर भी पड़ेगा। गुजरात एक मायने में मोदी और शाह के लिए उत्तर प्रदेश के चुनाव नतीजों से भी ज्यादा अहम इसलिए भी है कि यहां के चुनाव नतीजे आगे के विधानसभा चुनावों और 2019 के लोकसभा चुनावों में भाजपा का ग्राफ भी तय करेंगे।
ताकि कांग्रेस को मिल न सके सांस लेने की गुंजाइश
राहुल गांधी
दूसरी अहम बात यह है कि नोटबंदी के तुरंत बाद उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, पंजाब, गोवा और मणिपुर के विधानसभा चुनाव हुए जिनमें उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड में भाजपा ने तूफानी जीत दर्ज की जबकि पंजाब में अकाली भाजपा गठबंधन की हार हुई और गोवा व मणिपुर में भी भाजपा कांग्रेस से पीछे रही।
हालांकि, गोवा और मणिपुर में भाजपा येने केन प्रकारेण अपनी सरकार बनाने में कामयाब रही। लेकिन उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड की ऐतिहासिक विजय ने मोदी सरकार के नोटबंदी के फैसले पर जनता की मुहर लगाने का संदेश देने में भाजपा कामयाब रही। उसी तरह जीएसटी के बाद गुजरात और हिमाचल प्रदेश के चुनाव हो रहे हैं।
जीएसटी का असर हिमाचल में उतना नहीं है जितना गुजरात में है और जिस तरह सूरत, वड़ोदरा, अहमदाबाद, राजकोट आदि शहरों में व्यापारियों ने जीएसटी के प्रावधानों का विरोध किया और सरकार को उनमें कुछ राहत भी देनी पड़ी, उससे गुजरात के चुनाव नतीजों पर जीएसटी का कितना असर पड़ेगा यह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और भाजपा अध्यक्ष अमित शाह दोनों के लिए महत्वपूर्ण होगा। इसके अलावा अमित शाह के पुत्र जय शाह की कंपनी की पूंजी में हुई बेतहाशा वृद्धि के आरोपों का मुद्दा भी अहम है।
पढें: Gujarat Election: दो चरणों में होंगे गुजरात विधानसभा चुनाव, 9 और 14 दिसंबर को वोटिंग, 18 को नतीजे
गुजरात में अगर भाजपा का प्रदर्शन खराब होता है तो न सिर्फ पार्टी के हाथ से एक अति महत्वपूर्ण राज्य जाएगा बल्कि पूरे मोदी की चमक जो भाजपा का सबसे बड़ा हथियार है, के कमजोर होने या उतरने का संदेश भी जाएगा, जिसका नकारात्मक असर आगामी चुनावों पर पड़ सकता है। इसलिए मोदी-शाह की जोड़ी गुजरात और हिमाचल प्रदेश के चुनावों को जीतने के लिए कोई कोर कसर नहीं बाकी रखेगी। क्योंकि गुजरात के साथ-साथ भाजपा हिमाचल प्रदेश भी इसलिए जीतना चाहेगी, जिससे कांग्रेस को सांस लेने की गुंजाइश भी न मिल सके।
हालांकि, गोवा और मणिपुर में भाजपा येने केन प्रकारेण अपनी सरकार बनाने में कामयाब रही। लेकिन उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड की ऐतिहासिक विजय ने मोदी सरकार के नोटबंदी के फैसले पर जनता की मुहर लगाने का संदेश देने में भाजपा कामयाब रही। उसी तरह जीएसटी के बाद गुजरात और हिमाचल प्रदेश के चुनाव हो रहे हैं।
जीएसटी का असर हिमाचल में उतना नहीं है जितना गुजरात में है और जिस तरह सूरत, वड़ोदरा, अहमदाबाद, राजकोट आदि शहरों में व्यापारियों ने जीएसटी के प्रावधानों का विरोध किया और सरकार को उनमें कुछ राहत भी देनी पड़ी, उससे गुजरात के चुनाव नतीजों पर जीएसटी का कितना असर पड़ेगा यह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और भाजपा अध्यक्ष अमित शाह दोनों के लिए महत्वपूर्ण होगा। इसके अलावा अमित शाह के पुत्र जय शाह की कंपनी की पूंजी में हुई बेतहाशा वृद्धि के आरोपों का मुद्दा भी अहम है।
पढें: Gujarat Election: दो चरणों में होंगे गुजरात विधानसभा चुनाव, 9 और 14 दिसंबर को वोटिंग, 18 को नतीजे
गुजरात में अगर भाजपा का प्रदर्शन खराब होता है तो न सिर्फ पार्टी के हाथ से एक अति महत्वपूर्ण राज्य जाएगा बल्कि पूरे मोदी की चमक जो भाजपा का सबसे बड़ा हथियार है, के कमजोर होने या उतरने का संदेश भी जाएगा, जिसका नकारात्मक असर आगामी चुनावों पर पड़ सकता है। इसलिए मोदी-शाह की जोड़ी गुजरात और हिमाचल प्रदेश के चुनावों को जीतने के लिए कोई कोर कसर नहीं बाकी रखेगी। क्योंकि गुजरात के साथ-साथ भाजपा हिमाचल प्रदेश भी इसलिए जीतना चाहेगी, जिससे कांग्रेस को सांस लेने की गुंजाइश भी न मिल सके।
गुजरात चुनाव सीधा राहुल बनाम मोदी-शाह
shankar singh vaghela
अब बात राहुल गांधी की। 2013 से लगातार कांग्रेस राज्यों और लोकसभा चुनावों में हार रही है और उसे लेकर राहुल की नेतृत्व क्षमता पर गंभीर सवाल पार्टी के भीतर और बाहर उठ रहे हैं। बिहार के चुनाव नतीजों ने जो थोड़ी बहुत संजीवनी दी थी, उसे उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड की बुरी हार ने बेअसर कर दिया और पार्टी पंजाब की जीत व गोवा और मणिपुर में भाजपा पर कांग्रेस की बढ़त का भी कोई फायदा नहीं उठा सकी।
इसके बावजूद कांग्रेस में राहुल के अलावा किसी दूसरे विकल्प पर न सोचा गया न चर्चा हुई और अब जल्दी ही राहुल गांधी कांग्रेस अध्यक्ष बनने जा रहे हैं। मुमकिन है कि गुजरात चुनावों के बीच में ही उन्हें पार्टी की कमान सौंप दी जाए। इस तरह यह पहले चुनाव होंगे, जो राहुल की अध्यक्षता में कांग्रेस लड़ेगी। इसलिए इनके नतीजे कांग्रेस के भीतर और बाहर राहुल के सियासी भविष्य को खासा प्रभावित करेंगे।
हिमाचल प्रदेश में मुख्यमंत्री वीरभद्र सिंह पर लगे भ्रष्टाचार के आरोप और राज्य सरकार के प्रति सत्ता विरोधी रुझान को भाजपा भुनाना चाहती है। हिमाचल में अभी तक हर चुनाव के बाद सरकार बदलने की सियासी परंपरा भी रही है, इसलिए कांग्रेस नेतृत्व ने न चाहते हुए भी आखिर में सारा दारोमदार वीरभद्र सिंह को सौंप दिया और न सिर्फ उन्हें अगला मुख्यमंत्री दावेदार भी घोषित कर दिया बल्कि टिकट बंटवारे में भी उनकी ही चली।
इसलिए अगर यहां कांग्रेस जीती तो सेहरा राहुल गांधी के सिर कांग्रेसी बांधेंगे और अगर हारी तो वीरभद्र सिंह वह जिम्मेदारी लेंगे। लेकिन गुजरात में कांग्रेस पूरी तरह से राहुल गांधी को आगे करके लड़ रही है। शंकर सिंह वाघेला के बाहर जाने के बाद राज्य कांग्रेस में कोई दूसरा कद्दावर चेहरा नहीं है जिसे मोदी-शाह जोड़ी के खिलाफ चुनावी मोहरा बनाया जा सके। यहां तक कि बेहद जद्दोजहद के बाद राज्यसभा सीट बचाने में कामयाब रहे कांग्रेस के दिग्गज अहमद पटेल भी गुजरात चुनाव में पीछे हैं और राहुल गांधी ही सीधे मोर्चे पर हैं।
इसके बावजूद कांग्रेस में राहुल के अलावा किसी दूसरे विकल्प पर न सोचा गया न चर्चा हुई और अब जल्दी ही राहुल गांधी कांग्रेस अध्यक्ष बनने जा रहे हैं। मुमकिन है कि गुजरात चुनावों के बीच में ही उन्हें पार्टी की कमान सौंप दी जाए। इस तरह यह पहले चुनाव होंगे, जो राहुल की अध्यक्षता में कांग्रेस लड़ेगी। इसलिए इनके नतीजे कांग्रेस के भीतर और बाहर राहुल के सियासी भविष्य को खासा प्रभावित करेंगे।
हिमाचल प्रदेश में मुख्यमंत्री वीरभद्र सिंह पर लगे भ्रष्टाचार के आरोप और राज्य सरकार के प्रति सत्ता विरोधी रुझान को भाजपा भुनाना चाहती है। हिमाचल में अभी तक हर चुनाव के बाद सरकार बदलने की सियासी परंपरा भी रही है, इसलिए कांग्रेस नेतृत्व ने न चाहते हुए भी आखिर में सारा दारोमदार वीरभद्र सिंह को सौंप दिया और न सिर्फ उन्हें अगला मुख्यमंत्री दावेदार भी घोषित कर दिया बल्कि टिकट बंटवारे में भी उनकी ही चली।
इसलिए अगर यहां कांग्रेस जीती तो सेहरा राहुल गांधी के सिर कांग्रेसी बांधेंगे और अगर हारी तो वीरभद्र सिंह वह जिम्मेदारी लेंगे। लेकिन गुजरात में कांग्रेस पूरी तरह से राहुल गांधी को आगे करके लड़ रही है। शंकर सिंह वाघेला के बाहर जाने के बाद राज्य कांग्रेस में कोई दूसरा कद्दावर चेहरा नहीं है जिसे मोदी-शाह जोड़ी के खिलाफ चुनावी मोहरा बनाया जा सके। यहां तक कि बेहद जद्दोजहद के बाद राज्यसभा सीट बचाने में कामयाब रहे कांग्रेस के दिग्गज अहमद पटेल भी गुजरात चुनाव में पीछे हैं और राहुल गांधी ही सीधे मोर्चे पर हैं।
भाजपा चाहेगी कि मैदान में आए तीसरी ताकत
हार्दिक पटेल
- फोटो : self
राहुल ने यह बेहद चुनौतीपूर्ण सियासी जोखिम उठाया है और न सिर्फ चुनाव प्रचार बल्कि सियासी रणनीति बनाने से लेकर उसे अमल में लाने का सारा काम राहुल खुद देख रहे हैं। प्रभारी महासचिव अशोक गहलोत उनकी मदद कर रहे हैं। इसलिए यह चुनाव सीधा राहुल बनाम मोदी-शाह होता जा रहा है। इसलिए इसके नतीजों की व्याख्या और विश्लेषण भी उसी हिसाब से होगा। अगर गुजरात में कांग्रेस जीतती है तो न सिर्फ ढाई दशक बाद एक महत्वपूर्ण राज्य उसके पास आएगा बल्कि लगातार हार का कलंक झेल रहे राहुल गांधी को जीत का प्रतीक भी माना जाने लगेगा।
इससे जहां कांग्रेस के भीतर राहुल की ताकत और दबदबा बढ़ेगा, पकड़ मजबूत होगी, वहीं देश में भी लोग उन्हें गंभीरता से लेते हुए 2019 में मोदी के मुकाबले प्रधानमंत्री पद का सशक्त दावेदार मंजूर कर लेंगे। लेकिन अगर कांग्रेस हारती है तो न सिर्फ गुजरात में उसकी भावी संभावनाएं धूमिल होंगी बल्कि राहुल गांधी की छवि और सियासी भविष्य पर गंभीर सवाल पार्टी के भीतर और बाहर खड़े होंगे। फिर उन्हें अपने सियासी वजूद के लिए और कड़ा संघर्ष करना होगा। साथ ही नोटबंदी और जीएसटी को लेकर कांग्रेस और विपक्ष के हमले भी बेअसर माने जाएंगे।
एक सूरत यह भी हो सकती है कि भाजपा भले ही गुजरात में सरकार बना ले लेकिन कांग्रेस उसे कड़ी टक्कर देते हुए अपने विधायकों की संख्या 80 से ऊपर पहुंचा दे, तब उसे राहुल गांधी की सफलता बताकर कांग्रेस उनका बचाव कर सकती है। जहां हिमाचल प्रदेश में कांग्रेस, भाजपा के बीच सीधा मुकाबला है, वहीं गुजरात में शंकर सिंह वाघेला, एनसीपी, बसपा के सियासी ऊंट किस करवट बैठेंगे, इस पर भी खासा दारोमदार होगा।
भाजपा चाहेगी कि एक तीसरी ताकत मैदान में रहे, जिससे भाजपा विरोधी मतों का बंटवारा हो और उसे फायदा मिले, जबकि कांग्रेस चुनाव को भाजपा बनाम कांग्रेस बनाकर जीतना चाहती है। इसलिए राहुल के रणनीतिकर अल्पेश ठाकोर, हार्दिक पटेल और जिग्नेश मेवानी जैसे जातीय क्षत्रपों को अपने पाले में खींच रहे हैं।
इससे जहां कांग्रेस के भीतर राहुल की ताकत और दबदबा बढ़ेगा, पकड़ मजबूत होगी, वहीं देश में भी लोग उन्हें गंभीरता से लेते हुए 2019 में मोदी के मुकाबले प्रधानमंत्री पद का सशक्त दावेदार मंजूर कर लेंगे। लेकिन अगर कांग्रेस हारती है तो न सिर्फ गुजरात में उसकी भावी संभावनाएं धूमिल होंगी बल्कि राहुल गांधी की छवि और सियासी भविष्य पर गंभीर सवाल पार्टी के भीतर और बाहर खड़े होंगे। फिर उन्हें अपने सियासी वजूद के लिए और कड़ा संघर्ष करना होगा। साथ ही नोटबंदी और जीएसटी को लेकर कांग्रेस और विपक्ष के हमले भी बेअसर माने जाएंगे।
एक सूरत यह भी हो सकती है कि भाजपा भले ही गुजरात में सरकार बना ले लेकिन कांग्रेस उसे कड़ी टक्कर देते हुए अपने विधायकों की संख्या 80 से ऊपर पहुंचा दे, तब उसे राहुल गांधी की सफलता बताकर कांग्रेस उनका बचाव कर सकती है। जहां हिमाचल प्रदेश में कांग्रेस, भाजपा के बीच सीधा मुकाबला है, वहीं गुजरात में शंकर सिंह वाघेला, एनसीपी, बसपा के सियासी ऊंट किस करवट बैठेंगे, इस पर भी खासा दारोमदार होगा।
भाजपा चाहेगी कि एक तीसरी ताकत मैदान में रहे, जिससे भाजपा विरोधी मतों का बंटवारा हो और उसे फायदा मिले, जबकि कांग्रेस चुनाव को भाजपा बनाम कांग्रेस बनाकर जीतना चाहती है। इसलिए राहुल के रणनीतिकर अल्पेश ठाकोर, हार्दिक पटेल और जिग्नेश मेवानी जैसे जातीय क्षत्रपों को अपने पाले में खींच रहे हैं।