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Bridge Safety: इसलिए भरभरा कर गिर रहे हैं पुल! जरूरी है अब इन पुलों का हो ऑडिट, सबसे ज्यादा रिस्क में ये इलाके
सार
ऑल इंडिया सिविल इंजीनियर एसोसिएशन से जुड़े वरिष्ठ अभियंता सोमेंद्र चक्रवर्ती कहते हैं कि गुजरात में हुई घटना तो लापरवाही का नतीजा है। वह कहते हैं कि अंग्रेजों के जमाने में तैयार पुल की अगर मरम्मत हुई थी तो निश्चित तौर पर यह पाया गया होगा कि इस पुल में कुछ खामियां रही होंगी।
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मोरबी पुल हादसा
- फोटो : सोशल मीडिया
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विस्तार
गुजरात के मोरबी में हुए पुल हादसे के बाद सबसे ज्यादा चर्चा अंग्रेजों के जमाने में बनाए गए पुलो के ऑडिट और उनकी सुरक्षा को लेकर होने लगी है। सिविल इंजीनियरिंग से जुड़े विशेषज्ञों का कहना है कि जो पुल 100 साल या उससे अधिक की उम्र पूरी कर चुके हैं उनको एक बार फिर से मिड टर्म में ऑडिट किया जाना चाहिए। ताकि इनके वजन सहने की क्षमता लेकर उस में किए जाने वाले बदलाव का आकलन किया जा सके। सिविल इंजीनियर से जुड़े विशेषज्ञों का कहना है कि खासतौर हिमालयन रेंज में अंग्रेजों के जमाने में जो पुल बनाए गए थे उनकी ऑडिट फिलहाल अब और ज्यादा जरूरी हो गई है।
ऑल इंडिया रोड कांग्रेस से जुड़े रहे वरिष्ठ सिविल इंजीनियर एसएम पोद्दार कहते हैं कि अंग्रेजों के जमाने में बनाए गए पुल निश्चित तौर पर उस वक्त की आधुनिकता के लिहाज से और तकनीकी रूप से बहुत मजबूती के तौर पर बनाए गए थे। बदलते दौर में तकनीकी और ज्यादा बेहतर हुई हैं साथ ही सुलभ भी हुई है। इसलिए उन सभी पुलों को एक बार फिर से मिड टर्म में ऑडिट किए जाने की जरूरत है। हालांकि पोद्दार कहते हैं कि सभी पुलों की वक्त वक्त पर जांच और जरूरत के लिहाज से उनमें इंजीनियरिंग का बदलाव भी किया जाता रहता है लेकिन मोरबी की घटना के बाद एक बार फिर से सभी पुराने पुलों कि दोबारा ऑडिट करने की आवश्यकता है। चंडीगढ़ के पंजाब इंजीनियरिंग कॉलेज (पेक) में सिविल इंजीनियरिंग विभाग के अवकाश प्राप्त प्रोफेसर जगतार सिंह कहते हैं कि अंग्रेजों ने पहाड़ी इलाकों पर ऐसे बहुत से पुलों का निर्माण कराया था जहां पर आज भी आवागमन होता है। प्रोफेसर सिंह कहते हैं कि उन्होंने हिमाचल प्रदेश के ऐसे बहुत से पुलों का ऑडिट किया और उसमें जहां पर दुरुस्तीकरण की आवश्यकता हुई उसको बताया गया और बाद में उसको बेहतर तरीके से फिर तैयार भी किया गया।
प्रोफेसर सिंह कहते हैं कि आज के वक्त की मांग है कि एक बार फिर से इन सभी पुलों की जांच कराई जाए। वह कहते हैं कि ऐसा नहीं है कि पुल कमजोर हैं। लेकिन जब एक बड़ी घटना होती है तो सभी पुलों की मरम्मत और उसकी देखरेख की जिम्मेदारी बढ़ जाती है। ऐसे में बेहतर है कि संबंधित सभी राज्य जहां जहां पर यह पुल बने हैं या जिस महकमे के अंतर्गत ये पुल आते हैं। उनको सबको फिर से तकनीकी दक्षता के मामले में देखा जाए। सिविल इंजीनियर कौशल अनिरुद्ध कहते हैं कि पूर्वोत्तर के राज्यों से लेकर हिमाचल प्रदेश में कई ऐसे पुल है जहां पर अब यातायात उस वक्त बनाए गए पुल से कई गुना ज्यादा बढ़ गया है। कौशल अनिरुद्ध कहते हैं कि पहाड़ी राज्यों पर बनाए गए इन दोनों की दोबारा मरम्मत करने की और उनका ऑडिट करने की न सिर्फ आवश्यकता है बल्कि अगर ऐसे कमजोर हो चुके हो चुके ब्रिजेज को हेरिटेज की दृष्टि संजोकर आसपास यातायात के लिए दूसरे पुल बनाए जा सकते है। वह कहते हैं कि कल शहरों में इस तरीके का प्रयोग किया भी गया है।
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ऑल इंडिया सिविल इंजीनियर एसोसिएशन से जुड़े वरिष्ठ अभियंता सोमेंद्र चक्रवर्ती कहते हैं कि गुजरात में हुई घटना तो लापरवाही का नतीजा है। वह कहते हैं कि अंग्रेजों के जमाने में तैयार पुल की अगर मरम्मत हुई थी तो निश्चित तौर पर यह पाया गया होगा कि इस पुल में कुछ खामियां रही होंगी। लेकिन बड़ा सवाल यही है कि पुल को शुरू करने के बाद इसको ओवरलोड क्यों होने दिया गया। वह कहते हैं कि यह लापरवाही का नतीजा है। तभी इतनी बड़ी घटना हुई। चक्रवर्ती का कहना है वह पहले भी ऐसे कई मंचों पर सलाह दे चुके हैं कि इस बात का ख्याल जरूरी है कि जो पुल अंग्रेजों के जमाने में बनाए गए थे उस वक्त के फुट फॉल के हिसाब से ही तैयार हुए थे। अब अगर ऐसे पुलों पर आज के लिहाज से यातायात को गुजारना है तो उनको आज की तकनीकी दक्षता के मुताबिक न सिर्फ तैयार करना होगा बल्कि उस को कई गुना मजबूत भी बनाना होगा।
22 वर्षों में 20 बड़ी घटनाएं हुईं
एक आंकड़े के मुताबिक सन 2000 से लेकर अब तक तकरीबन 20 पुलों या ओवरब्रिज के गिरने के हादसे हुए। जिसमें तकरीबन पौने सात सौ लोगों की जानें चली गई। आंकड़ों के मुताबिक गुजरात के मोरबी में रविवार को हुई बड़ी घटना में 130 लोगों से ज्यादा की मौत हो गई। इससे पहले देश में कई और भी बड़ी घटनाएं हुई। जिसमें 2016 में कोलकाता के विवेकानंद फ्लाईओवर के एक दुखद घटना नहीं। इस घटना में 27 लोगों की मौत हो गई थी। 2018 में बनारस में पुल गिरने की बड़ी घटना हुई थी। जिसमें 18 लोगों की जान चली गई थी। 2017 में मुंबई के एक रेलवे स्टेशन पर ओवर ब्रिज गिर गया था। इस घटना में 29 लोगों की मौत हो गई थी। 2017 में ही मुंबई गोवा हाईवे पर सावित्री पुल के गिरने से दर्जनों गाड़ियां और कई बसें बह गई थी। इन गाड़ियों और बसों में सवार 40 से ज्यादा लोगों की मौत हो गई थी।
इससे पहले सन 2005 में केरल के बालीगुडा में एक बड़ा रेल हादसा हुआ था। उस वक्त पुराने पुल के ऊपर से ट्रेन गुजर रही थी और अचानक पुल ढह गया। जिसमें कई डिब्बे पानी में समा गए। इस घटना में 114 से ज्यादा लोगों की जान चली गई थी। यही बड़ी घटना नहीं बल्कि 2006 में बिहार के भागलपुर में भी इसी तरीके का एक हादसा हुआ था जिसमें डेढ़ सौ साल पुराना पुल ट्रेन के गुजरते ही भरभरा कर ढह गया था। इस घटना में 30 लोगों से ज्यादा की मौत हो गई थी जबकि सैकड़ों लोग घायल हो गए थे। 2007 में हैदराबाद में भी इसी तरीके की घटना हुई। पुल गिरा और 15 लोगों की मौत हो गई थी। 2009 में कोटा के चंबल पुल के गिरने से 28 लोगों की दबकर मौत हो गई थी।
जिम्मेदारों पर नहीं होती कार्रवाई
ऐसी घटनाओं पर केंद्रीय सेवा से जुड़े एक वरिष्ठ अधिकारी का कहना है कि ये घटनाएं सिर्फ लापरवाही की वजह से ही होती हैं। उनका कहना है कि जो पुल निर्माण के दौरान गिर जाते हैं उसमें तो जिम्मेदारों को सजा तक नहीं हो पाती है। उनका कहना है जब तक ऐसे जिम्मेदार ऊपर कड़ी कार्रवाई नहीं होगी और वह कार्यवाही नजीर के तौर पर प्रस्तुत नहीं की जाएगी तब तक ऐसी घटनाएं होती रहेंगी। उनका कहना है कि बनता हुआ पुल आखिर कैसे गिर सकता है। जाहिर सी बात है या तो उस पुल में घटिया मटेरियल का इस्तेमाल हुआ होगा या फिर कमीशन के चलते पुल में लापरवाही की जा रही होगी।
इसके अलावा उनका कहना है कि कई बार प्रोजेक्ट को जल्दी पूरा करने के चक्कर में भी ठेकेदार और इंजीनियर तमाम तरह की खामियां कर जाते हैं। हालांकि उनका कहना है जब इस तरीके के निर्माण का काम आवंटित होता है तो जो तय समय सीमा तय की जाती है, जो कि विशेषज्ञों की देखरेख में होती हैं। और यह अनुमानित कर की जाती है कितने दिनों में एक बेहतर और मजबूत निर्माण किया जा सकेगा। ऐसे में समय सीमा के भीतर काम करने से पुल नहीं गिर सकता हैं। वह कहते हैं कि फिलहाल अब मांग यही है कि पुराने पुलो की ऑडिटिंग की जाए और जो नए पुल बनते वक्त गिरे हैं उसमें जिम्मेदारों को दी जाने वाली सजा नजीर के तौर पर पेश की जाए।
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ऑल इंडिया रोड कांग्रेस से जुड़े रहे वरिष्ठ सिविल इंजीनियर एसएम पोद्दार कहते हैं कि अंग्रेजों के जमाने में बनाए गए पुल निश्चित तौर पर उस वक्त की आधुनिकता के लिहाज से और तकनीकी रूप से बहुत मजबूती के तौर पर बनाए गए थे। बदलते दौर में तकनीकी और ज्यादा बेहतर हुई हैं साथ ही सुलभ भी हुई है। इसलिए उन सभी पुलों को एक बार फिर से मिड टर्म में ऑडिट किए जाने की जरूरत है। हालांकि पोद्दार कहते हैं कि सभी पुलों की वक्त वक्त पर जांच और जरूरत के लिहाज से उनमें इंजीनियरिंग का बदलाव भी किया जाता रहता है लेकिन मोरबी की घटना के बाद एक बार फिर से सभी पुराने पुलों कि दोबारा ऑडिट करने की आवश्यकता है। चंडीगढ़ के पंजाब इंजीनियरिंग कॉलेज (पेक) में सिविल इंजीनियरिंग विभाग के अवकाश प्राप्त प्रोफेसर जगतार सिंह कहते हैं कि अंग्रेजों ने पहाड़ी इलाकों पर ऐसे बहुत से पुलों का निर्माण कराया था जहां पर आज भी आवागमन होता है। प्रोफेसर सिंह कहते हैं कि उन्होंने हिमाचल प्रदेश के ऐसे बहुत से पुलों का ऑडिट किया और उसमें जहां पर दुरुस्तीकरण की आवश्यकता हुई उसको बताया गया और बाद में उसको बेहतर तरीके से फिर तैयार भी किया गया।
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प्रोफेसर सिंह कहते हैं कि आज के वक्त की मांग है कि एक बार फिर से इन सभी पुलों की जांच कराई जाए। वह कहते हैं कि ऐसा नहीं है कि पुल कमजोर हैं। लेकिन जब एक बड़ी घटना होती है तो सभी पुलों की मरम्मत और उसकी देखरेख की जिम्मेदारी बढ़ जाती है। ऐसे में बेहतर है कि संबंधित सभी राज्य जहां जहां पर यह पुल बने हैं या जिस महकमे के अंतर्गत ये पुल आते हैं। उनको सबको फिर से तकनीकी दक्षता के मामले में देखा जाए। सिविल इंजीनियर कौशल अनिरुद्ध कहते हैं कि पूर्वोत्तर के राज्यों से लेकर हिमाचल प्रदेश में कई ऐसे पुल है जहां पर अब यातायात उस वक्त बनाए गए पुल से कई गुना ज्यादा बढ़ गया है। कौशल अनिरुद्ध कहते हैं कि पहाड़ी राज्यों पर बनाए गए इन दोनों की दोबारा मरम्मत करने की और उनका ऑडिट करने की न सिर्फ आवश्यकता है बल्कि अगर ऐसे कमजोर हो चुके हो चुके ब्रिजेज को हेरिटेज की दृष्टि संजोकर आसपास यातायात के लिए दूसरे पुल बनाए जा सकते है। वह कहते हैं कि कल शहरों में इस तरीके का प्रयोग किया भी गया है।
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22 वर्षों में 20 बड़ी घटनाएं हुईं
एक आंकड़े के मुताबिक सन 2000 से लेकर अब तक तकरीबन 20 पुलों या ओवरब्रिज के गिरने के हादसे हुए। जिसमें तकरीबन पौने सात सौ लोगों की जानें चली गई। आंकड़ों के मुताबिक गुजरात के मोरबी में रविवार को हुई बड़ी घटना में 130 लोगों से ज्यादा की मौत हो गई। इससे पहले देश में कई और भी बड़ी घटनाएं हुई। जिसमें 2016 में कोलकाता के विवेकानंद फ्लाईओवर के एक दुखद घटना नहीं। इस घटना में 27 लोगों की मौत हो गई थी। 2018 में बनारस में पुल गिरने की बड़ी घटना हुई थी। जिसमें 18 लोगों की जान चली गई थी। 2017 में मुंबई के एक रेलवे स्टेशन पर ओवर ब्रिज गिर गया था। इस घटना में 29 लोगों की मौत हो गई थी। 2017 में ही मुंबई गोवा हाईवे पर सावित्री पुल के गिरने से दर्जनों गाड़ियां और कई बसें बह गई थी। इन गाड़ियों और बसों में सवार 40 से ज्यादा लोगों की मौत हो गई थी।
इससे पहले सन 2005 में केरल के बालीगुडा में एक बड़ा रेल हादसा हुआ था। उस वक्त पुराने पुल के ऊपर से ट्रेन गुजर रही थी और अचानक पुल ढह गया। जिसमें कई डिब्बे पानी में समा गए। इस घटना में 114 से ज्यादा लोगों की जान चली गई थी। यही बड़ी घटना नहीं बल्कि 2006 में बिहार के भागलपुर में भी इसी तरीके का एक हादसा हुआ था जिसमें डेढ़ सौ साल पुराना पुल ट्रेन के गुजरते ही भरभरा कर ढह गया था। इस घटना में 30 लोगों से ज्यादा की मौत हो गई थी जबकि सैकड़ों लोग घायल हो गए थे। 2007 में हैदराबाद में भी इसी तरीके की घटना हुई। पुल गिरा और 15 लोगों की मौत हो गई थी। 2009 में कोटा के चंबल पुल के गिरने से 28 लोगों की दबकर मौत हो गई थी।
जिम्मेदारों पर नहीं होती कार्रवाई
ऐसी घटनाओं पर केंद्रीय सेवा से जुड़े एक वरिष्ठ अधिकारी का कहना है कि ये घटनाएं सिर्फ लापरवाही की वजह से ही होती हैं। उनका कहना है कि जो पुल निर्माण के दौरान गिर जाते हैं उसमें तो जिम्मेदारों को सजा तक नहीं हो पाती है। उनका कहना है जब तक ऐसे जिम्मेदार ऊपर कड़ी कार्रवाई नहीं होगी और वह कार्यवाही नजीर के तौर पर प्रस्तुत नहीं की जाएगी तब तक ऐसी घटनाएं होती रहेंगी। उनका कहना है कि बनता हुआ पुल आखिर कैसे गिर सकता है। जाहिर सी बात है या तो उस पुल में घटिया मटेरियल का इस्तेमाल हुआ होगा या फिर कमीशन के चलते पुल में लापरवाही की जा रही होगी।
इसके अलावा उनका कहना है कि कई बार प्रोजेक्ट को जल्दी पूरा करने के चक्कर में भी ठेकेदार और इंजीनियर तमाम तरह की खामियां कर जाते हैं। हालांकि उनका कहना है जब इस तरीके के निर्माण का काम आवंटित होता है तो जो तय समय सीमा तय की जाती है, जो कि विशेषज्ञों की देखरेख में होती हैं। और यह अनुमानित कर की जाती है कितने दिनों में एक बेहतर और मजबूत निर्माण किया जा सकेगा। ऐसे में समय सीमा के भीतर काम करने से पुल नहीं गिर सकता हैं। वह कहते हैं कि फिलहाल अब मांग यही है कि पुराने पुलो की ऑडिटिंग की जाए और जो नए पुल बनते वक्त गिरे हैं उसमें जिम्मेदारों को दी जाने वाली सजा नजीर के तौर पर पेश की जाए।