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भूमंडलीकरण वाले गुजरात का मंडलीकरण

Tue, 12 Dec 2017 09:38 PM IST
विनोद अग्निहोत्री/ अहमदाबाद
विनोद अग्निहोत्री/ अहमदाबाद Updated Tue, 12 Dec 2017 09:38 PM IST
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Gujarat election: Dominant castes of the state is a big challenge for bjp and congress

गुजरात चुनाव के दूसरे चरण का प्रचार आज खत्म हो गया है। 18 दिसंबर को मतगणना के बाद नतीजे जो भी आएं, लेकिन एक बात तय है कि जिस गुजरात को इसलिए जाना जाता है कि करीब-करीब उसके हर गांव-घर का कोई न कोई सदस्य दुनिया के किसी न किसी हिस्से में मौजूद है, इन चुनावों से वो बिहार और उत्तर प्रदेश की तर्ज पर मंडलीकरण के दौर में पहुंच गया है। 

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पूरे चुनाव में जातीय समीकरणों, अस्मिता और अधिकार के सवालों ने संघ की इस वैचारिक प्रयोगशाला में भाजपा के हिंदुत्व की कड़ियों को तार तार कर दिया है। पाटीदार, दलित, कोली पटेल, आहीर, ठाकोर आदि ओबीसी जातियों, आदिवासियों के अधिकारों और भागीदारी के नारों ने दो दशक से भी ज्यादा पुराने हिंदू ध्रुवीकरण के गठबंधन को पीछे छोड़ दिया। चुनाव के बाद जो भी सरकार बनेगी, उसके सामने राज्य की तमाम प्रभावशाली जातियों की आकांक्षाओं को पूरा करने और सामाजिक संतुलन साधने की बड़ी चुनौती होगी।
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गुजरात चुनावों की घोषणा से खासा पहले राज्य में ओबीसी दर्जा देकर सरकारी नौकरियों में आरक्षण की मांग को लेकर पाटीदार आंदोलन की आग सुलग चुकी थी। उसके समानांतर ओबीसी आरक्षण से किसी भी तरह की छेड़छाड़ के खिलाफ ओबीसी आंदोलन भी शुरू हो गया। 
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कथित गौरक्षकों की हिंसक मनमानी और दबंग जातियों के अत्याचार के खिलाफ गुजरात के दलितों का आक्रोश भी सड़कों पर उतर आया। इन तीनों सामाजिक धाराओं से हार्दिक पटेल, अल्पेश ठाकोर और जिग्नेश मेवाणी जैसे युवा नेता पटल पर आए। जातीय अधिकारों और सम्मान से जुड़े इन तीनों आंदोलनों ने गुजरात के सामाजिक ताने बाने को मथ डाला। 

भाजपा सरकार के प्रति असंतोष

Gujarat election: Dominant castes of the state is a big challenge for bjp and congress

भाजपा के जनाधार के ध्रुव रहे पाटीदारों के बीच 22 साल से राज्य में राज कर रही भाजपा सरकार के प्रति असंतोष बढ़ता चला गया। ओबीसी और दलितों की राजनीति भी मुखर हो गई। कांग्रेस ने इस मौके को भुनाने के लिए माधव सिंह सोलंकी के जमाने के पुराने खाम (क्षत्रिय यानी ओबीसी,आदिवासी,दलित, मुसलमान) गठबंधन को नया रूप खाप (क्षत्रिय यानी ओबीसी,आदिवासी,दलित और पाटीदार) बनाने का जातीय समीकरण दांव चल दिया। हार्दिक, अल्पेश और जिग्नेश को अपने साथ लाने में कांग्रेस को कामयाबी भी मिली।

कांग्रेस के खाप दांव की काट के लिए भाजपा ने अपने टिकट बंटवारे में जातीय समीकरणों का पूरा ख्याल रखा। बड़ी संख्या में पाटीदारों और ओबोसी को टिकट दिए गए। कांग्रेस ने भी यही किया। जबकि पहले हिंदुत्व के मजबूत ध्रुवीकरण के आधार वाली भाजपा जातीय समीकरणों को इतनी तरजीह नहीं देती थी। साथ ही भाजपा ने रूठे पाटीदारों को मनाने के साथ साथ गैर पाटीदारों को भी साथ लाने की कवायद जमीनी स्तर पर की। 

इसमें भी उसने कोली पटेलों, आहीर, ठाकोर, रैवारी आदि पिछड़ी जातियों को जोड़ने की कोशिश की। जबकि कांग्रेस ने पाटीदारों के साथ साथ अपने पिछड़े, दलित और मुस्लिम जनाधार को समेटे रखने के लिए कोई कोर कसर नहीं छोड़ी। 

भाजपा ने पिछड़ों को रिझाने के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के पिछड़े वर्ग से आने और मणिशंकर अय्यर के नीच वाले बयान का जमकर इस्तेमाल किया। वहीं कांग्रेस ने राजस्थान के पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत को गुजरात का प्रभारी बनाकर उनके पिछड़े वर्ग से होने और सैम पित्रोदा की पिछड़ी जाति का भी जमकर प्रचार किया।

पहली बार जातीय समीकरणों पर बात करते दिखे लोग

Gujarat election: Dominant castes of the state is a big challenge for bjp and congress
हार्दिक पटेल और जिग्नेश मेवानी

गुजरात में चुनाव कवर करने के दौरान लोगों से बात करते हुए पहली बार जातीय समीकरणों और जातीय अस्मिता पर खुलकर बात करते हुए लोग मिले। 2002 में जहां लोग सिर्फ और सिर्फ हिंदुत्व और मुस्लिम विरोध को लेकर गोलबंद दिखते थे, वहीं 2007 के विधानसभा चुनावों में मौत के सौदागर वाले सोनिया गांधी के बयान और सोहराबुद्दीन मुठभेड़ के मुद्दे को गरम करके हिंदुत्व की आंच में छह करोड़ गुजरातियों की अस्मिता का सियासी तड़का भी लगाया गया जिसने गुजरातियों को भाजपा के साथ गोलबंद किया।

जबकि 2012 के विधानसभा चुनाव में नरेंद्र मोदी के विकास के गुजरात मॉडल, मुस्लिम टोपी न पहनने के मोदी के आग्रह और मोरारजी देसाई के बाद मोदी के रूप में गुजराती को प्रधानमंत्री बनाने की बलवती इच्छा की लहरों ने जातीय आग्रहों और समीकरणों को उभरने नहीं दिया। लेकिन भाजपा और खुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की तमाम कोशिशों के बावजूद इस बार गुजरात में इस तरह की कोई भावनात्मक लहर नहीं पैदा हो सकी और पूरा चुनाव जातीय ध्रुवीकरण पर आकर टिक गया।

ध्रुवीकरण जिसके पक्ष में ज्यादा, उसकी होगी गांधीनगर की गद्दी
अब ये जातीय ध्रुवीकरण जिसके पक्ष में ज्यादा होगा इस बार गांधीनगर की गद्दी उसे ही मिलेगी। अगर कांग्रेस अपना परंपरागत पिछड़ा, आदिवासी, दलित, मुस्लिम जनाधार एकजुट रखने में कामयाब रही और पाटीदारों का 50 फीसदी भी उसमें जुड़ गया तो कांग्रेस का 22 साल पुराना वनवास खत्म हो सकता है। 

लेकिन अगर भाजपा ने पाटीदारों के बड़े हिस्से को टूटने से बचा लिया और गैर पाटीदार जातियों के एक बड़े हिस्से को अपने साथ जोड़ कर कांग्रेस के परंपरागत ओबीसी जनाधार में ठीक ठाक सेंध लगा ली तो उसकी सत्ता वापसी हो सकती है। 

इसके अलावा भाजपा की एक बड़ी चुनौती शहरी क्षेत्रों में अपने परंपरागत व्यापारी और छोटे मझोले उद्यमियों की नाराजगी से निबटने की भी है। सूरत, वड़ोदरा, अहमदाबाद, राजकोट, भावनगर, पोरबंदर, जूनागढ़, जामनगर, अंकलेश्वर आदि शहरों पर लंबे समय से भाजपा का दबदबा रहा है। इस बार कांग्रेस की कोशिश नोटबंदी और जीएसटी की मार को मुद्दा बनाकर इसमें बड़ी सेंध लगाने की भी है। शहरी सीटों के नतीजे भी अहम साबित होंगे।

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