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Gujarat Results: भाजपा ने गुजरात की प्रयोगशाला में किया सबसे अनोखा प्रयोग! आज तक कभी नहीं लड़ा गया ऐसा चुनाव

Thu, 08 Dec 2022 04:40 PM IST
Ashish Tiwari आशीष तिवारी
Updated Thu, 08 Dec 2022 04:40 PM IST
सार

राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि विपक्ष ने जरूर कुछ मामलों को बनाने की कोशिश की लेकिन वह मुद्दे किसी भी तरीके से जनता के बीच में कारगर नहीं हो सके। सियासी जानकार हीरेन भाई कहते हैं कि कांग्रेस पार्टी ने गुजरात में एक तरह से आत्मसमर्पण कर दिया था।

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Gujarat Assembly Election 2022 BJP won without any major issue in state pm modi congress aap news in hindi
गुजरात विधानसभा चुनाव 2022 - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

भारतीय सियासी रण में गुजरात को राजनीति की प्रयोगशाला कहा जाता है। इस बार फिर गुजरात की उसी सियासी जमीन की राजनैतिक प्रयोगशाला में भारतीय जनता पार्टी ने एक ऐसा प्रयोग कर डाला जो चुनावी इतिहास का सबसे अनोखा माना जा रहा है। कहा जा रहा है कि आज तक किसी भी राज्य में किसी "बगैर बड़े मुद्दे" के जीता गया यह अब तक का सबसे अलग चुनाव है। सियासी जानकार भी मानते हैं कि गुजरात के इस पूरे चुनाव की खास बात ही यह रही कि बगैर किसी बड़े मुद्दे को शामिल किए हुए सिर्फ मोदी के नाम पर लड़े गए इस चुनाव में इतनी जबरदस्त जीत हासिल हुई है।

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बीते कुछ सालों में हुए गुजरात के चुनाव के सियासी मुद्दों की अगर बात करें तो भारतीय जनता पार्टी हर बार किसी ने किसी बड़े मुद्दे को लेकर के ही चुनावी मैदान में उतरती रही है। राजनीतिक विश्लेषक एसएन शर्मा कहते हैं कि 2002 में हुए गुजरात के चुनावों में गुजरात की सुलगती सियासी जमीन पर चुनाव लड़ा गया था। गुजरात में हुए दंगे उस चुनाव में सबसे बड़ा मुद्दा था। 2007 के चुनावों में कई बड़े नेताओं के दल बदलने को राजनैतिक मुद्दा बनाया गया और इसी मुद्दे के आधार पर गुजरात के चुनावों में सियासी जंग लड़ी गई। शर्मा कहते हैं कि 2012 के चुनावों गुजरात का पूरा चुनाव एक बार फिर गुजराती अस्मिता पर लड़ा गया। 2012 का चुनाव गुजराती अस्मिता इसलिए जुड़ा क्योंकि 2014 में होने वाले लोकसभा के चुनावों में नरेंद्र मोदी बड़े चेहरे के तौर पर प्रोजेक्ट कर प्रधानमंत्री के प्रबल दावेदारों की सूची में शामिल करने की एक बड़ी मुहिम मानी जा रही थी। 2017 का चुनाव गुजरात में सबसे कठिन चुनावों में से एक माना जाता रहा है। राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि यह चुनाव भारतीय जनता पार्टी के लिए सबसे कठिन इसलिए था क्योंकि पाटीदार आंदोलन अपने चरम पर था और उसका खामियाजा भी भारतीय जनता पार्टी को भुगतना पड़ा। हालांकि भारतीय जनता पार्टी के नेताओं की कड़ी मेहनत के बाद पूर्ण रूप से सत्ता में तो आई लेकिन अपने निम्नतम स्कोर पर पार्टी पहुंच गई।
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राजनीतिक विश्लेषण दिव्यशरण शाह कहते हैं कि इतने चुनावों के बाद 2022 का ऐसा चुनाव रहा जिसमें कोई बड़ा मुद्दा हावी ही नहीं रहा। वो कहते हैं कि गुजरात में जब वह चुनावी आकलन करने जमीन पर उतरे तो उनको सिर्फ और सिर्फ एक ही चीज नजर आई और वह थी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का नाम। शाह कहते हैं कि गुजरात का यह चुनाव पूरी तरीके से गुजराती अस्मिता और नरेंद्र मोदी के नाम पर लड़ा गया। उनका कहना है कि ऐसा नहीं था कि गुजरात के चुनाव में चुनावी मुद्दे नहीं थे। बावजूद इसके न तो विपक्ष उन मुद्दों को आगे लेकर जा पाया और भारतीय जनता पार्टी तो मोदी के नाम को ही आगे करके चुनाव लड़ रही थी। राजकोट पश्चिम के हरी बापू कहते हैं कि यहां पर प्रत्याशी कोई भी हो लेकिन नाम सिर्फ नरेंद्र मोदी का ही चला। इसकी वजह बताते हुए उनका कहना है कि नरेंद्र मोदी गुजरात की शान है। और जब चुनाव गुजरात के बेटे के साथ हो तो वहां पर मुद्दे पूरी तरीके से पीछे हो जाते हैं। बापू का कहना है कि गुजरात तो एक तरह से राजनीति की प्रयोगशाला कही जाती है और यह उसी प्रयोगशाला का नतीजा है कि गुजरात की बंपर जीत "मोदी सुनामी" के नाम पर ही रही है।
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राजनीतिक जानकार डीएस शुक्ला कहते हैं कि भारतीय जनता पार्टी ने गुजरात में जिस तरीके से क्लीनस्वीप किया है वह तभी संभव होता है जब कोई बहुत बड़ा चुनावी मुद्दा या बहुत बड़ा इशू मैदान में हो। उनका कहना है कि इंदिरा जी की मृत्यु के बाद कांग्रेस को कुछ इसी तरीके की बंपर सीटें मिली थी। दिल्ली में आम आदमी पार्टी को 2014 में मिली बंपर जीत एक संदेश थी कि लोगों को नई पार्टी में उम्मीद नजर आ रही है। ऐसे और भी कई उदाहरण है जिसमें बंपर जीत बड़े मुद्दे और बड़े इशू के बाद ही मिली थी।।उनका कहना है कि गुजरात में इस बार कोई भी मुद्दे नहीं थे लेकिन गुजरात के चुनाव में अस्मिता के प्रतीक के तौर पर नरेंद्र मोदी सबसे बड़े नाम थे। भाजपा ने जिस तरीके से क्लीन स्वीप किया वह बताता है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का नाम कितना बड़ा है। उनका कहना है जिस चुनाव में मोदी के नाम पर इतनी बंपर जीत मिली हो उससे आने वाले चुनावों में अंदाजा लगाया जा सकता है कि मोदी के नाम का जादू कितना चलने वाला है। 
 
राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि विपक्ष ने जरूर कुछ मामलों को बनाने की कोशिश की लेकिन वह मुद्दे किसी भी तरीके से जनता के बीच में कारगर नहीं हो सके। सियासी जानकार हीरेन भाई कहते हैं कि कांग्रेस पार्टी ने गुजरात में एक तरह से आत्मसमर्पण कर दिया था। उनका कहना है कांग्रेस ने गुजरात में किसानों के मुद्दों और आदिवासी इलाकों के डेवलपमेंट समेत कई अन्य मुद्दों को तो आगे बढ़ाने की कोशिश की लेकिन लचर प्रबंधन के चलते वह मुद्दे फेल हो गए। हीरेन कहते हैं कि आम आदमी पार्टी को मिली सीटें यह बताती है कि उनके वादों से कुछ विशेष इलाके के लोग प्रभावित हुए और उसी प्रभाव के कारण आम आदमी पार्टी को पहली बार यहां के चुनावी मैदान में सीट मिली है। 

 
हिरेनभाई कहते हैं कि इस बात को बिल्कुल नहीं भूलना चाहिए कि एक साल पहले जब भारतीय जनता पार्टी ने गुजरात की पूरी सरकार को बदल दिया था तो उनके दिमाग में क्या चल रहा था। उनका कहना है कि भारतीय जनता पार्टी को मिली इंटरनल रिपोर्ट यह बताती थी कि आने वाले चुनाव उनके लिए कठिन हो सकते हैं। ऐसे में भारतीय जनता पार्टी ने एक ऐसा बड़ा फैसला लिया जिसको चुनावी साल में कोई भी राजनीतिक दल लेने से पहले सौ बार सोचता। लेकिन भारतीय जनता पार्टी ने इसी गुजरात की सियासी प्रयोगशाला में मुख्यमंत्री से लेकर उपमुख्यमंत्री समेत पूरी की पूरी कैबिनेट बदल डाली। वो कहते हैं कि इतने बड़े एक्सपेरिमेंट के बाद भारतीय जनता पार्टी को मिली बंपर जीत बताती है कि गुजरात की राजनीति में भाजपा का किया गया एक्सपेरिमेंट बड़ा कारगर साबित हुआ। हीरेनभाई कहते हैं कि गुजरात के चुनाव में इस बार पूरा का पूरा चुनाव मोदी के नाम पर ही लड़ा गया और बंपर जीत हासिल हुई।

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