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Lok Sabha: बच्चों के बिना सूने पड़े पांच हजार विद्यालय, 1.44 लाख शिक्षक शून्य नामांकन वाले स्कूलों में तैनात
Thu, 18 Dec 2025 05:14 AM IST
हिमांशु चंदेल
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
Published by: हिमांशु चंदेल
Updated Thu, 18 Dec 2025 05:14 AM IST
सार
Education Ministry Data: संसद में शिक्षा मंत्रालय के आंकड़ों से खुलासा हुआ है कि देश में 5,149 सरकारी स्कूल ऐसे हैं, जहां एक भी छात्र नामांकित नहीं है। इनमें 1.44 लाख शिक्षक तैनात हैं। शून्य नामांकन वाले 70 फीसदी से ज्यादा स्कूल तेलंगाना और पश्चिम बंगाल में हैं।
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संसद।
- फोटो : अमर उजाला प्रिंट
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विस्तार
देश की सरकारी शिक्षा व्यवस्था की हकीकत एक बार फिर सामने आई है। संसद में शिक्षा मंत्रालय की ओर से साझा किए गए आंकड़ों के मुताबिक, देश में 5 हजार से ज्यादा सरकारी स्कूल ऐसे हैं, जहां एक भी बच्चा पढ़ने नहीं आ रहा है। बच्चों के बिना ये स्कूल पूरी तरह सूने पड़े हैं, लेकिन हैरानी की बात यह है कि इन स्कूलों में शिक्षक तैनात हैं और संसाधनों पर खर्च भी हो रहा है।
नई दिल्ली में लोकसभा को दिए लिखित जवाब में शिक्षा मंत्रालय ने बताया कि देश के कुल 10.13 लाख सरकारी स्कूलों में से 5,149 स्कूलों में शैक्षणिक सत्र 2024-25 के दौरान एक भी छात्र का नामांकन नहीं हुआ। यानी इन स्कूलों में पढ़ाई के लिए कोई बच्चा मौजूद नहीं है। ये आंकड़े एकीकृत जिला शिक्षा सूचना प्रणाली प्लस यानी यूडीआईएसई प्लस से लिए गए हैं।
तेलंगाना और बंगाल में सबसे ज्यादा असर
सरकारी आंकड़ों के अनुसार, शून्य नामांकन वाले स्कूलों का सबसे बड़ा हिस्सा तेलंगाना और पश्चिम बंगाल में है। कुल ऐसे स्कूलों में से 70 फीसदी से अधिक इन्हीं दो राज्यों में हैं। इससे साफ होता है कि कुछ राज्यों में सरकारी स्कूलों पर बच्चों का भरोसा तेजी से घट रहा है। अभिभावक अपने बच्चों को निजी स्कूलों की ओर भेज रहे हैं, जिससे सरकारी स्कूल खाली होते जा रहे हैं।
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ये भी पढ़ें- आधार डाटा पर सरकार का भरोसा, केंद्र ने कहा- नहीं हुई सेंधमारी, नागरिकों की पहचान पूरी तरह सुरक्षित
बिना छात्रों के तैनात 1.44 लाख शिक्षक
सबसे चौंकाने वाला तथ्य यह है कि इन शून्य नामांकन वाले स्कूलों में करीब 1.44 लाख शिक्षक तैनात हैं। यानी जहां पढ़ाने के लिए कोई छात्र नहीं है, वहां भी शिक्षक नियुक्त हैं। यह स्थिति सरकारी संसाधनों के उपयोग और शिक्षा नीति की प्रभावशीलता पर गंभीर सवाल खड़े करती है। शिक्षक वेतन और स्कूल संचालन पर होने वाला खर्च सीधे तौर पर सरकारी खजाने पर बोझ बन रहा है।
तेजी से बढ़ रहे हैं कम और शून्य नामांकन वाले स्कूल
शिक्षा मंत्रालय के आंकड़ों के अनुसार, केवल शून्य नामांकन ही नहीं, बल्कि 10 से कम छात्रों वाले स्कूलों की संख्या भी तेजी से बढ़ी है। बीते दो वर्षों में ऐसे स्कूलों की संख्या 24 फीसदी बढ़कर 52,309 से 65,054 हो गई है। यह रुझान दिखाता है कि सरकारी स्कूलों में छात्रों की संख्या लगातार घट रही है और यह समस्या गंभीर रूप लेती जा रही है।
आंकड़ों से यह भी पता चलता है कि वर्ष 2019-20 के बाद से सरकारी स्कूलों की कुल संख्या घटकर 10.32 लाख से 10.13 लाख रह गई है। स्कूलों का बंद होना और नामांकन का गिरना शिक्षा व्यवस्था के लिए खतरे की घंटी है। यह स्थिति सरकार के लिए बड़ा संकेत है कि सरकारी स्कूलों की गुणवत्ता, पहुंच और भरोसे को दोबारा मजबूत करने के लिए ठोस कदम उठाने की जरूरत है।
अन्य वीडियो-
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नई दिल्ली में लोकसभा को दिए लिखित जवाब में शिक्षा मंत्रालय ने बताया कि देश के कुल 10.13 लाख सरकारी स्कूलों में से 5,149 स्कूलों में शैक्षणिक सत्र 2024-25 के दौरान एक भी छात्र का नामांकन नहीं हुआ। यानी इन स्कूलों में पढ़ाई के लिए कोई बच्चा मौजूद नहीं है। ये आंकड़े एकीकृत जिला शिक्षा सूचना प्रणाली प्लस यानी यूडीआईएसई प्लस से लिए गए हैं।
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तेलंगाना और बंगाल में सबसे ज्यादा असर
सरकारी आंकड़ों के अनुसार, शून्य नामांकन वाले स्कूलों का सबसे बड़ा हिस्सा तेलंगाना और पश्चिम बंगाल में है। कुल ऐसे स्कूलों में से 70 फीसदी से अधिक इन्हीं दो राज्यों में हैं। इससे साफ होता है कि कुछ राज्यों में सरकारी स्कूलों पर बच्चों का भरोसा तेजी से घट रहा है। अभिभावक अपने बच्चों को निजी स्कूलों की ओर भेज रहे हैं, जिससे सरकारी स्कूल खाली होते जा रहे हैं।
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बिना छात्रों के तैनात 1.44 लाख शिक्षक
सबसे चौंकाने वाला तथ्य यह है कि इन शून्य नामांकन वाले स्कूलों में करीब 1.44 लाख शिक्षक तैनात हैं। यानी जहां पढ़ाने के लिए कोई छात्र नहीं है, वहां भी शिक्षक नियुक्त हैं। यह स्थिति सरकारी संसाधनों के उपयोग और शिक्षा नीति की प्रभावशीलता पर गंभीर सवाल खड़े करती है। शिक्षक वेतन और स्कूल संचालन पर होने वाला खर्च सीधे तौर पर सरकारी खजाने पर बोझ बन रहा है।
तेजी से बढ़ रहे हैं कम और शून्य नामांकन वाले स्कूल
शिक्षा मंत्रालय के आंकड़ों के अनुसार, केवल शून्य नामांकन ही नहीं, बल्कि 10 से कम छात्रों वाले स्कूलों की संख्या भी तेजी से बढ़ी है। बीते दो वर्षों में ऐसे स्कूलों की संख्या 24 फीसदी बढ़कर 52,309 से 65,054 हो गई है। यह रुझान दिखाता है कि सरकारी स्कूलों में छात्रों की संख्या लगातार घट रही है और यह समस्या गंभीर रूप लेती जा रही है।
आंकड़ों से यह भी पता चलता है कि वर्ष 2019-20 के बाद से सरकारी स्कूलों की कुल संख्या घटकर 10.32 लाख से 10.13 लाख रह गई है। स्कूलों का बंद होना और नामांकन का गिरना शिक्षा व्यवस्था के लिए खतरे की घंटी है। यह स्थिति सरकार के लिए बड़ा संकेत है कि सरकारी स्कूलों की गुणवत्ता, पहुंच और भरोसे को दोबारा मजबूत करने के लिए ठोस कदम उठाने की जरूरत है।
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