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CBI: सीबीआई की वैद्यता के लिए 'डीएसपीई एक्ट' में होगा संशोधन, आधे देश में जांच ही नहीं कर सकती एजेंसी
सार
देश के आधे राज्यों में जांच के लिए सीबीआई को अभी इन राज्यों से विशेष अनुमति लेनी पड़ती है, जिसमें काफी संसाधन और समय लगता है। ऐसे में केंद्र सरकार सीबीआई की वैधता से जुड़े डीपीएसई एक्ट में संशोधन पर विचार कर रही है।
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सीबीआई
- फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
केंद्रीय जांच एजेंसी सीबीआई की वैद्यता के लिए, केंद्र सरकार 'दिल्ली विशेष पुलिस स्थापन अधिनियम, 1946 (डीएसपीई एक्ट) में संशोधन करने पर विचार कर रही है। सीबीआई को डीएसपीई एक्ट के तहत शक्तियां मिलती हैं, जबकि इस एक्ट में 'सीबीआई' शब्द कहीं लिखा ही नहीं है। सीबीआई को राज्यों में किसी मामले की जांच के लिए वहां की सरकार से सहमति लेनी पड़ती है। मौजूदा समय में आठ राज्यों ने अपनी सहमति वापस ले ली है। सीबीआई निदेशक ने 8 जुलाई 2025 को 14 राज्यों के मुख्य सचिवों से डीएसपीई एक्ट की धारा 3 के अंतर्गत अपराधों की सीबीआई जांच के लिए सहमति पत्र जारी करने का अनुरोध किया था। इसका मतलब है कि सीबीआई को आधे देश में जांच करने का अधिकार ही नहीं है।
अड़चन का स्थायी तरीका निकालना चाहिए
कुछ राज्यों ने दिल्ली विशेष पुलिस स्थापन अधिनियम, 1946 (डीएसपीई अधिनियम) के तहत आवश्यक सामान्य सहमति वापस ले ली है। यह कदम निर्बाध जांच में एक बड़ी बाधा उत्पन्न करता है। हर बार नए केस की जांच के लिए विशिष्ट सहमति मांगना, इस प्रक्रिया में जांच एजेंसी का समय व्यर्थ होता है। दूसरी तरफ इसके चलते संसाधनों और जनशक्ति पर अनावश्यक दबाव पड़ता है, जांच की गुणवत्ता में बाधा आती है और केस की जांच को शीघ्रता से अंजाम तक पहुंचाना, इसमें देरी होती है।
साइबर अपराध और इनकी रोकथाम पर गृह मंत्रालय की संसदीय समिति की 259 वीं रिपोर्ट में यह सिफारिश की गई है कि गृह मंत्रालय को उन राज्य सरकारों के साथ बातचीत करनी चाहिए, जिन्होंने केसों की जांच के लिए सामान्य सहमति नहीं दी है। इस अड़चन का स्थायी तरीका निकालना चाहिए। इसके अलावा समिति का यह भी मानना है कि दिल्ली विशेष पुलिस स्थापन अधिनियम, 1946 में संशोधन किया जा सकता है। इसके लिए गृह मंत्रालय, उक्त एक्ट में सशोधन करने की व्यवहार्यता का परीक्षण करे।
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आठ राज्यों ने वापस ली है सहमति
सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम के तहत सीबीआई द्वारा अपराधों की जांच के लिए इन आठ राज्यों ने विशिष्ट सहमति प्रदान की है।
इन राज्यों से की सीबीआई ने अपील
सीबीआई के निदेशक ने 8 जुलाई 2025 को 14 राज्यों के मुख्य सचिवों से, संबंधित प्रदेशों के क्षेत्राधिकार के भीतर, डीएसपीई अधिनियम की धारा 3 के अंतर्गत यथा अधिसूचित सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम, 2000
के तहत अपराधों की सीबीआई द्वारा जांच के लिए सहमति जारी करने का अनुरोध किया है। इनमें निम्न राज्य शामिल हैं-
कानूनी सलाह ले रही है सरकार
सीबीआई की वैद्यता बरकरार रहे और उसे विभिन्न केसों की जांच के लिए राज्यों की सहमति का इंतजार न करना पड़े, इसके लिए सरकार गंभीरता से काम कर रही है। इस मामले में संशोधन को लेकर कानूनी सलाह ली जा रही है। उन राज्यों से भी बात हो रही है, जो सामान्य सहमति नहीं देते हैं। इस बाबत जल्द ही केंद्र और सभी राज्यों के मुख्यमंत्रियों की एक बैठक बुलाई जा सकती है। साथ ही इस मुद्दे पर सरकार, विपक्ष के साथ भी चर्चा करेगी। यह देखा जा रहा है कि क्या संशोधन ही इस समस्या का एकमात्र हल है या कोई दूसरा विकल्प भी है। इस मामले में सरकार, सुप्रीम कोर्ट के फैसले का भी इंतजार कर रही है।
एक्ट में 'सीबीआई' शब्द ही नहीं लिखा है
सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ अधिवक्ता डॉ. एलएस चौधरी के अनुसार, एक्ट में सीबीआई शब्द ही नहीं लिखा है। सीबीआई के गठन या उसके अधिकार क्षेत्र की बात भी नहीं लिखी है। डीएसपीई एक्ट में कई बार संशोधन हुए, लेकिन 'सीबीआई' का नाम उसमें शामिल नहीं हो सका। साल 2013 में गोवाहाटी हाईकोर्ट अपने एक फैसले में 'सीबीआई' को असंवैधानिक करार दे चुका है। केंद्र ने उस फैसले पर स्टे ले लिया। वह केस अभी लंबित है। संभव है कि डेढ़ दो महीने में इस मामले की सुनवाई होगी। सीबीआई जांच का दायरा बढ़े, उसे राज्यों की सहमति का इंतजार न करना पड़े, इसके लिए 'पुलिस' विषय को समवर्ती सूची में शामिल करना होगा। यह संविधान में संशोधन द्वारा ही संभव है। यह भी देखना होगा कि संशोधन प्रक्रिया में संविधान के मूल ढांचे के साथ कोई छेड़छाड़ न होने पाए।
सीबीआई का अपना कोई एक्ट ही नहीं
केंद्रीय जांच एजेंसी का अपना कोई एक्ट ही नहीं है। ऐसे में जांच को लेकर केंद्र व राज्यों के बीच विवाद चलता रहेगा। सीबीआई, दिल्ली स्पेशल पुलिस स्थापन एक्ट-1946 के तहत काम करती है। ऐसे में यह पुलिस की एक शाखा है। अब पुलिस तो राज्य सूची का विषय है। इसका अर्थ यह हुआ कि केंद्र उसमें हस्तक्षेप नहीं कर सकता। सुप्रीम कोर्ट ने एक दिसंबर 2025 को डिजिटल अरेस्ट के मामले में कहा, सीबीआई को भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम, 1988 के प्रावधानों के अंतर्गत, बैंकरों की भूमिका की जांच करने के लिए पूर्ण स्वतंत्रता दी जानी चाहिए।
सभी राज्य सरकारों और संघ राज्य क्षेत्रों को यह निर्देशित किया जाता है कि जहां कहीं भी भारतीय दंड विधानों के साथ-साथ सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम, 2000 के अंतर्गत जांच के लिए कोई प्राथमिकी दर्ज की गई हो, वहां डीएसपीई अधिनियम की धारा 6 के तहत मंजूरी प्रदान की जाए। इसकी मदद से सीबीआई, चिन्हित साइबर अपराधों के संबंध में अखिल भारतीय स्तर पर एक व्यापक कार्रवाई कर सकती है।
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अड़चन का स्थायी तरीका निकालना चाहिए
कुछ राज्यों ने दिल्ली विशेष पुलिस स्थापन अधिनियम, 1946 (डीएसपीई अधिनियम) के तहत आवश्यक सामान्य सहमति वापस ले ली है। यह कदम निर्बाध जांच में एक बड़ी बाधा उत्पन्न करता है। हर बार नए केस की जांच के लिए विशिष्ट सहमति मांगना, इस प्रक्रिया में जांच एजेंसी का समय व्यर्थ होता है। दूसरी तरफ इसके चलते संसाधनों और जनशक्ति पर अनावश्यक दबाव पड़ता है, जांच की गुणवत्ता में बाधा आती है और केस की जांच को शीघ्रता से अंजाम तक पहुंचाना, इसमें देरी होती है।
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साइबर अपराध और इनकी रोकथाम पर गृह मंत्रालय की संसदीय समिति की 259 वीं रिपोर्ट में यह सिफारिश की गई है कि गृह मंत्रालय को उन राज्य सरकारों के साथ बातचीत करनी चाहिए, जिन्होंने केसों की जांच के लिए सामान्य सहमति नहीं दी है। इस अड़चन का स्थायी तरीका निकालना चाहिए। इसके अलावा समिति का यह भी मानना है कि दिल्ली विशेष पुलिस स्थापन अधिनियम, 1946 में संशोधन किया जा सकता है। इसके लिए गृह मंत्रालय, उक्त एक्ट में सशोधन करने की व्यवहार्यता का परीक्षण करे।
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आठ राज्यों ने वापस ली है सहमति
- पश्चिम बंगाल (16 नवंबर 2018 से)
- केरल (4 नवंबर 2020 से)
- झारखंड (5 नवंबर 2020 से)
- पंजाब (6 नवंबर 2020 से)
- मेघालय (9 फरवरी 2022 से)
- तेलंगाना (30 अगस्त 2022 से)
- तमिलनाडु (14 जून 2023 से)
- कर्नाटक (27 सितंबर 2024 से)
सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम के तहत सीबीआई द्वारा अपराधों की जांच के लिए इन आठ राज्यों ने विशिष्ट सहमति प्रदान की है।
- आंध प्रदेश,
- गोवा
- मणिपुर
- मिजोरम
- हिमाचल प्रदेश
- नगालैंड
- सिक्किम
- उत्तर प्रदेश
- छह राज्यों ने डीएसपीई अधिनियम की धारा 3 के अंतर्गत अधिसूचित सभी अपराधों, जिनमें आईटी अधिनियम के तहत अपराध भी शामिल हैं, के लिए सामान्य सहमति जारी की है।
- अरुणाचल प्रदेश
- असम
- छत्तीसगढ़
- गुजरात
- हरियाणा
- ओडिशा
इन राज्यों से की सीबीआई ने अपील
सीबीआई के निदेशक ने 8 जुलाई 2025 को 14 राज्यों के मुख्य सचिवों से, संबंधित प्रदेशों के क्षेत्राधिकार के भीतर, डीएसपीई अधिनियम की धारा 3 के अंतर्गत यथा अधिसूचित सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम, 2000
के तहत अपराधों की सीबीआई द्वारा जांच के लिए सहमति जारी करने का अनुरोध किया है। इनमें निम्न राज्य शामिल हैं-
- बिहार
- कर्नाटक
- केरल
- महाराष्ट्र
- मध्य प्रदेश
- पंजाब
- राजस्थान
- झारखंड
- तमिलनाडु
- तेलंगाना
- त्रिपुरा
- उत्तराखंड
- पश्चिम बंगाल
कानूनी सलाह ले रही है सरकार
सीबीआई की वैद्यता बरकरार रहे और उसे विभिन्न केसों की जांच के लिए राज्यों की सहमति का इंतजार न करना पड़े, इसके लिए सरकार गंभीरता से काम कर रही है। इस मामले में संशोधन को लेकर कानूनी सलाह ली जा रही है। उन राज्यों से भी बात हो रही है, जो सामान्य सहमति नहीं देते हैं। इस बाबत जल्द ही केंद्र और सभी राज्यों के मुख्यमंत्रियों की एक बैठक बुलाई जा सकती है। साथ ही इस मुद्दे पर सरकार, विपक्ष के साथ भी चर्चा करेगी। यह देखा जा रहा है कि क्या संशोधन ही इस समस्या का एकमात्र हल है या कोई दूसरा विकल्प भी है। इस मामले में सरकार, सुप्रीम कोर्ट के फैसले का भी इंतजार कर रही है।
एक्ट में 'सीबीआई' शब्द ही नहीं लिखा है
सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ अधिवक्ता डॉ. एलएस चौधरी के अनुसार, एक्ट में सीबीआई शब्द ही नहीं लिखा है। सीबीआई के गठन या उसके अधिकार क्षेत्र की बात भी नहीं लिखी है। डीएसपीई एक्ट में कई बार संशोधन हुए, लेकिन 'सीबीआई' का नाम उसमें शामिल नहीं हो सका। साल 2013 में गोवाहाटी हाईकोर्ट अपने एक फैसले में 'सीबीआई' को असंवैधानिक करार दे चुका है। केंद्र ने उस फैसले पर स्टे ले लिया। वह केस अभी लंबित है। संभव है कि डेढ़ दो महीने में इस मामले की सुनवाई होगी। सीबीआई जांच का दायरा बढ़े, उसे राज्यों की सहमति का इंतजार न करना पड़े, इसके लिए 'पुलिस' विषय को समवर्ती सूची में शामिल करना होगा। यह संविधान में संशोधन द्वारा ही संभव है। यह भी देखना होगा कि संशोधन प्रक्रिया में संविधान के मूल ढांचे के साथ कोई छेड़छाड़ न होने पाए।
सीबीआई का अपना कोई एक्ट ही नहीं
केंद्रीय जांच एजेंसी का अपना कोई एक्ट ही नहीं है। ऐसे में जांच को लेकर केंद्र व राज्यों के बीच विवाद चलता रहेगा। सीबीआई, दिल्ली स्पेशल पुलिस स्थापन एक्ट-1946 के तहत काम करती है। ऐसे में यह पुलिस की एक शाखा है। अब पुलिस तो राज्य सूची का विषय है। इसका अर्थ यह हुआ कि केंद्र उसमें हस्तक्षेप नहीं कर सकता। सुप्रीम कोर्ट ने एक दिसंबर 2025 को डिजिटल अरेस्ट के मामले में कहा, सीबीआई को भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम, 1988 के प्रावधानों के अंतर्गत, बैंकरों की भूमिका की जांच करने के लिए पूर्ण स्वतंत्रता दी जानी चाहिए।
सभी राज्य सरकारों और संघ राज्य क्षेत्रों को यह निर्देशित किया जाता है कि जहां कहीं भी भारतीय दंड विधानों के साथ-साथ सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम, 2000 के अंतर्गत जांच के लिए कोई प्राथमिकी दर्ज की गई हो, वहां डीएसपीई अधिनियम की धारा 6 के तहत मंजूरी प्रदान की जाए। इसकी मदद से सीबीआई, चिन्हित साइबर अपराधों के संबंध में अखिल भारतीय स्तर पर एक व्यापक कार्रवाई कर सकती है।