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सीएपीएफ को हेलीकॉप्टर के लिए मिले 150 करोड़ रुपये: नक्सली हमलों में घायल जवानों को फिर भी नहीं मिल पा रहा 'चॉपर'

Jitendra Bhardwaj जितेंद्र भारद्वाज
Updated Mon, 02 May 2022 04:26 PM IST
सार

केंद्रीय सुरक्षा बलों के कैडर अधिकारी बताते हैं कि सरकार हेलीकॉप्टर के लिए राशि तो जारी करती है, लेकिन हेलीकॉप्टर का इस्तेमाल कहां पर और किेसके लिए होता है, यह बात जरूर देखी जानी चाहिए...

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government approved an amount of Rs 150 crore for providing helicopter facility to security forces in Naxal-affected areas to deal with any emergency
सीआरपीएफ हेलीकॉप्टर - फोटो : Agency (File Photo)

विस्तार

केंद्र सरकार ने नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में 'सुरक्षा बलों' को किसी भी आपात स्थिति से निपटने के लिए 'हेलीकॉप्टर' की सुविधा मुहैया कराने की बात कही थी। इतना ही नहीं, सरकार ने इसके लिए 150 करोड़ रुपये की राशि भी स्वीकृत की है। सरकार के पास हेलीकॉप्टर का इस्तेमाल करने की एवज में जो बिल आए हैं, उनका भुगतान कर दिया गया है। केंद्रीय गृह मंत्रालय द्वारा जारी 2020-21 की रिपोर्ट में यह बात कही गई है। केंद्रीय बलों को 2019-20 के लिए 109 करोड़ रुपये जारी किए गए, जबकि 2020-21 के दौरान हेलीकॉप्टर इस्तेमाल करने की एवज में 69.35 करोड़ रुपये की राशि जारी की गई है। केंद्रीय सुरक्षा बलों के सूत्रों का कहना है, सरकार ने हेलीकॉप्टर सुविधा का इस्तेमाल करने की एवज में जो राशि जारी की है, उसमें यह देखा जाना चाहिए कि घायल अधिकारी या जवान को समय पर अस्पताल ले जाने के लिए इस सुविधा का कितना उपयोग हुआ है। दूसरी तरफ नक्सल प्रभावित इलाकों में सुरक्षा बलों के शीर्ष अफसरों के दौरों के लिए हेलीकॉप्टर ने कितने फेरे लगाए हैं।  

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50 करोड़ रुपये प्रति वर्ष हेलीकॉप्टर सुविधा पर खर्च

केंद्रीय गृह मंत्रालय की 2020-21 की रिपोर्ट के अनुसार, यह राशि 'असिस्टेंस टू सेंट्रल एजेंसी फॉर एलडब्लूई मैनेजमेंट स्कीम' के तहत जारी हुई है। डेढ़ सौ करोड़ रुपये की राशि में से 50 करोड़ रुपये प्रति वर्ष, हेलीकॉप्टर सुविधा पर खर्च करने की बात कही गई है। इस स्कीम के अंतर्गत सीआरपीएफ द्वारा सीएपीएफ/सेंट्रल एजेंसी के लिए हेलीकॉप्टर किराए पर लिया जाता है। अमूमन यह चॉपर सेवा भारतीय वायु सेना द्वारा मुहैया कराई जाती है। यह सेवा नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में चलने वाले सुरक्षा बलों के ऑपरेशन और इंफ्रास्ट्रक्चर सपोर्ट, दोनों के लिए इस्तेमाल की जाती है। इतना ही नहीं, केंद्रीय गृह मंत्रालय द्वारा 30 सर्वाधिक नक्सल प्रभावित जिलों में स्पेशल सेंट्रल असिस्टेंस 'एससीए' के तहत फंड मुहैया कराया जाता है। यह फंड राज्य सरकार को मिलता है। इसका मकसद पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर और सेवाओं के बीच अंतर को खत्म करना है। इसके लिए पिछले तीन साल के दौरान 2148.24 करोड़ रुपये की राशि प्रदान की गई है। वर्ष 2020-21 के तहत 450 करोड़ रुपये की राशि जारी हुई है।

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केंद्रीय सुरक्षा बलों के कैडर अधिकारी बताते हैं कि सरकार हेलीकॉप्टर के लिए राशि तो जारी करती है, लेकिन हेलीकॉप्टर का इस्तेमाल कहां पर और किेसके लिए होता है, यह बात जरूर देखी जानी चाहिए। जिन इलाकों में बड़े ऑपरेशन शुरू होते हैं, क्या वहां पर हेलीकॉप्टर तैयार रहता है? क्या घायल जवानों को ले जाने के लिए समय पर हेलीकॉप्टर आता है? यह भी देखा जाना चाहिए कि हेलीकॉप्टर का ज्यादा इस्तेमाल कौन कर रहा है? बलों के शीर्ष अफसर इसी बजट में से चॉपर की सेवा लेते हैं। पिछले दिनों नक्सल प्रभावित क्षेत्र में इसका एक उदाहरण देखने को मिला था। जिस जगह पर ऑपरेशन चल रहा था, वहां कुछ ही दिन पहले बल के एडीजी एवं आईजी हेलीकॉप्टर से पहुंचे थे। उसी इलाके में जब 'सीआरपीएफ कोबरा' के सहायक कमांडेंट वैभव विभोर, नक्सलियों के आईईडी हमले में बुरी तरह जख्मी हुए तो समय पर चॉपर नहीं पहुंच सका था।

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औरंगाबाद 'बिहार' के मदनपुर थाना क्षेत्र में विभोर के अलावा हवलदार सुरेंद्र कुमार भी घायल हुए थे। जिस वक्त जंगल में सीआरपीएफ का 'ऑपरेशन' चल रहा था, वहां आसपास के किसी भी बेस पर हेलीकॉप्टर मौजूद नहीं था। गया तक पहुंचने के लिए घायलों को एंबुलेंस में चार घंटे का सफर करना पड़ा। जब ये एंबुलेंस गया पहुंची तो रात को हेलीकॉप्टर उड़ाने की मंजूरी नहीं मिली। ऐसे में घायलों को 19 घंटे बाद दिल्ली एम्स लाया गया। नतीजा, सहायक कमांडेंट विभोर ने अपनी दोनों टांगें खो दीं। एक हाथ की दो अंगुलियां भी काटनी पड़ीं। इसे लेकर डीजी कुलदीप सिंह ने कहा, इस कष्टदायक घटना के लिए मैं खुद को जिम्मेदार मानता हूं।  

बीएसएफ की तरह बल के पास हो खुद की एयरविंग

कॉन्फेडरेशन ऑफ एक्स पैरामिलिट्री फोर्स मार्टियर्स वेलफेयर एसोसिएशन और सीआरपीएफ के रिटायर्ड अफसरों का कहना था, सीएपीएफ में चॉपर को लेकर समन्वय की भारी कमी रही है। यदि बल के पास खुद की एयरविंग होती तो इस तरह की दिक्कतें नहीं आतीं। जब किसी क्षेत्र में 'ऑपरेशन' चल रहा है, तो एक हेलीकॉप्टर वहां के बेस कैंप पर तैयार रहना चाहिए। पता नहीं कब कैसी जरूरत पड़ जाए। खुद का हेलीकॉप्टर नहीं है, इसलिए उसके आने में देरी हो जाती है। उसके बाद ऐसी शर्त लगने लगती हैं कि हम वहां लैंड करेंगे, वहां नहीं करेंगे। कभी हेलीकॉप्टर समय पर नहीं आता तो कभी एटीसी की मंजूरी नहीं मिलती। जब अधिकारियों का हेलीकॉप्टर वहां उतर सकता है तो घायलों को ले जाने के लिए हेलीकॉप्टर वहां क्यों नहीं आ सकता।

 

केंद्रीय गृह राज्य मंत्री नित्यानंद राय के अनुसार, वामपंथी उग्रवाद की घटनाओं में अब 77 फीसदी की गिरावट दर्ज की गई है। 2009 में 2258 घटनाएं हुई थीं, साल 2021 में इनकी संख्या 509 रह गई है। इन घटनाओं में आम लोगों और सुरक्षा बलों को मिलाकर देखें तो इनके मारे जाने की संख्या में 85 फीसदी की कमी हुई है। साल 2010 में ऐसी मौतों की संख्या 1005 थी। पिछले साल यह आंकड़ा 147 रह गया है। गत वर्ष 126 वामपंथी उग्रवादी मारे गए हैं। 50 सुरक्षा कर्मी शहीद हो गए हैं। 97 आम लोगों की जानें चली गईं। वामपंथी उग्रवाद से सर्वाधिक प्रभावित जिलों के रूप में वर्गीकृत इलाके अब 25 ही बचे हैं। 2018 में इनकी संख्या 35 से 30 पर पहुंच गई थी।

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