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चुनावी मुद्दे तय करने में सरकार व विपक्ष में जोर आजमाइश
शरद गुप्ता, नई दिल्ली
Updated Fri, 31 Aug 2018 05:42 AM IST
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आगामी आम चुनाव की जमीन तैयार हो गई है। चुनाव प्रचार में विपक्ष का सारा जोर राफेल विमान खरीद और नोटबंदी पर रहेगा। वहीं भाजपा और समर्थक दल शहरी नक्सलवाद और राष्ट्रवाद जैसे भावनात्मक मुद्दे उठाएंगे। इस बार विकास का मुद्दा पीछे छूटने वाला है।
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दरअसल, रिजर्व बैंक की रिपोर्ट ने सरकार के लिए कुछ असुविधाजनक तथ्य सामने ला दिए हैं। वहीं, राफेल मामले पर भी विपक्ष जबरदस्त तरीके से हमलावर है। बृहस्पतिवार को केंद्रीय वित्त मंत्री अरुण जेटली के ब्लॉग और राहुल गांधी की प्रेस कांफ्रेंस से उभरे ये कुछ संकेत हैं। वहीं, पिछले दिनों कथित नक्सली समर्थकों की महाराष्ट्र सरकार के हाथों गिरफ्तारी से शहरी नक्सलवाद एक बड़ा मुद्दा बन रहा है।
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नोटबंदी की घोषणा करते हुए सरकार ने उम्मीद जताई थी कि लगभग तीस फीसदी राशि कालाधन है। वहीं आरबीआई की रिपोर्ट ने बताया है कि बाजार में मौजूद 15 लाख करोड़ रुपये की करेंसी में से महज 10 हजार करोड़ रुपये यानी 0.7 फीसदी ही वापस नहीं आ पाया। यदि नेपाल और भूटान में चल रही पुरानी भारतीय करेंसी को जोड़ लिया जाए तो यह राशि संभवत: और कम होती।
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हालांकि सरकार का दावा है कि वह नोटबंदी के बाद 18 लाख जमाकर्ताओं की वार्षिक आय और जमा की गई राशि का मिलान करेगी और दोषी पाए जाने पर कार्रवाई करेगी। अब दिक्कत ये है कि इतने बड़े पैमाने पर जांच में समय लगेगा, जबकि चुनाव में महज आठ महीने बचे हैं।
भाजपा सांसदों द्वारा वित्त मंत्रालय से जुड़ी संसदीय समिति की रिपोर्ट को सदन को सौंपे जाने के विरोध के पीछे शायद यही वजह थी। अब आरबीआई की रिपोर्ट के सहारे विपक्ष सरकार पर हमलावर हो रहा है और इस मुद्दे को वह जीडीपी की विकास दर में कमी, कृषि और नौकरियों के अवसरों में कमी जैसे आंकड़ों के सहारे लोकसभा चुनाव तक जीवित रखेगा। इसी तरह राहुल गांधी ने राफेल मुद्दे पर काफी आक्रामक रुख अपनाया है। विपक्ष के इस मामले पर बहुत ही सीधे सवाल हैं।
जनता की जिज्ञासा शांत करना भाजपा की बड़ी चुनौती
राहुल यह भी पूछ रहे हैं कि 45,000 करोड़ रुपये के कर्ज में डूबी अनिल अंबानी की कंपनी रिलायंस डिफेंस को राफेल का कांट्रैक्ट क्यों दिया जा रहा है। यह कंपनी डील होने से महज 15 दिन पहले बनी थी और इसे विमान के पुर्जे बनाने का कोई अनुभव नहीं है?
निश्चित ही सरकार के पास इन सभी सवालों के जवाब होंगे, लेकिन भाजपा की सबसे बड़ी चुनौती यह है कि ये जवाब ऐसे हों, जो जनता की जिज्ञासा को शांत करे और वह सरकार के तर्कों पर भरोसा करे न कि विपक्ष के आरोपों पर। वरना अगला चुनाव प्रचार भी 2जी, कोलगेट या बोफोर्स जैसे प्रचार में तब्दील हो सकता है।