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नहीं रहीं 'ग्लो ऑफ होप' की नायिका, तीन घंटे में पिता ने तैयार किया था स्केच, 300 रुपये थी कीमत

Thu, 04 Oct 2018 02:03 PM IST
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, कोल्हापुर
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, कोल्हापुर Updated Thu, 04 Oct 2018 02:03 PM IST
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Glow of Hope girl gita uplekar died at the of 102 at kolhapur maharashtra
गीता उपलेकर

'ग्लो ऑफ होप' (आशाओं से भरा दीया) हाथ में लेकर पेंटिग बनवाने वाली गीता उपलेकर का 102 साल की उम्र में निधन हो गया है। पश्चिमी महाराष्ट्र के कोल्हापुर में उन्होंने अपनी बेटी के घर पर अंतिम सांसें लीं। महाराष्ट्र के मशहूर चित्रकार एसएल हलदणकर ने अपनी ही बेटी की यह पेंटिंग बनाई थी जो बहुत मशहूर हुई थी।

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'वुमन विद द लैंप' के नाम से मशहूर गीता की इस पेंटिंग ने देशभर में खूब सुर्खियां बटोरी थीं। यह पेंटिंग अभी मैसूर के जगनमोहन पैलेस में जयचामा राजेंद्र आर्ट गैलरी में रखी है। 
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गीता जब 100 साल की हुई थीं, तब उन्होंने एक पत्रिका को दिए साक्षात्कार में इस बात का खुलासा किया था कि उनके पिता ने उनकी यह तस्वीर मैसूर की जयचामा राजेंद्र आर्ट गैलरी को महज 300 रुपए में बेची थी। बाद में इस पेंटिंग की कीमत आठ करोड़ रुपये लगाई गई थी।
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 फ्रांस का वह कला प्रशंसक इसे किसी भी हाल में खरीदना चाहता था और उसने 8 करोड़ रुपए में खरीदने का प्रस्ताव दिया था लेकिन इसकी खूबसूरती को देखते हुए इसे बेचा नहीं गया। 

इस पेंटिंग को बनाने के पीछे की कहानी भी काफी दिलचस्प थी। उन्होंने लगभग अपने दिमाग पर जोर देते हुए उस दिन को कुछ ऐसे बयां किया था। वह दिवाली की रात थी, चारों ओर दिये जगमगा रहे थे।

Glow of Hope girl gita uplekar died at the of 102 at kolhapur maharashtra
गीता उपलेकर

दिवाली की रात तैयार की थी पिता ने यह तस्वीर

हम भाई बहन भी घर के आंगन को रंगोली और दियों से सजाने की तैयारी कर रहे थे। दिवाली का एक अजीब ही उत्साह होता है। मैंने झटपट मां की नई वाली साड़ी पहन ली थी। उसके बाद पीतल का बड़ा दीया जिसे महाराष्ट्र में समई कहा जाता है, जलाकर उसे ले जा रही थी, तभी पिताजी ने मुझे देख लिया।

उन्होंने मेरी साड़ी ठीक की और कहा- कुछ देर रुको, तुम्हारी तस्वीर बनानी है। फिर उन्होंने मुझे पोज बनाने के लिए कहा और करीब साढ़े तीन घंटे तक स्केच तैयार करते रहे। तीन दिन बाद जब यह पेंटिंग पूरी तरह तैयार हुई तो मेरी आंखें अपनी तस्वीर को निहारती ही रहीं। मन ही नहीं भर रहा था।' उस समय मैं 29 साल की थी।

गीता ने अपने इस इंटरव्यू में बताया था कि लोग सालों तक इस पेंटिंग को राजा रवि वर्मा की पेंटिंग समझते रहे जबकि इस पेंटिंग की लड़की मैं हूं और इसे बनाने वाले मेरे पिता एसएस हलणकर। खुद गीता को पेंटिंग की काफी बारीकियां पता थीं।

उन्होंने बताया कि इस फोटो को रवि वर्मा की फोटो बताए जाने का कारण साड़ी की वो सिलवट है, उसका टैक्स्चर काफी कुछ रवि वर्मा की शैली से मिलता-जुलता था। इसी भ्रम में कई लोगों ने मुझसे इस पेंटिंग को लेकर पूछताछ की थी। उन्होंने बताया था कि उनके पिता और वर्माजी की शैली करीब-करीब एक जैसी ही थी। 

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