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Ghosi By-Election: घोसी विधानसभा उप-चुनाव में सपा-भाजपा के बीच घमासान, जानें इस सीट का इतिहास और जातीय समीकरण

Wed, 30 Aug 2023 05:21 PM IST
जयदेव सिंह न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: जयदेव सिंह Updated Wed, 30 Aug 2023 05:21 PM IST
सार

Ghosi By-Election: 1957 में घोसी सीट अस्तित्व में आई। तब से अब तक हुए चुनावों में चार-चार बार भाकपा और भाजपा, तीन बार कांग्रेस, दो-दो बार बसपा और सपा, एक-एक बार जनता पार्टी, लोकदल और जनता दल को जीत मिली है।  

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Ghosi By Poll: Ghosi assembly seat history and caste equation
घोसी विधानसभा उपचुनाव - फोटो : AMAR UJALA

विस्तार

उत्तर प्रदेश की घोसी विधानसभा सीट पर पांच सितंबर को उपचुनाव होना है। सपा के टिकट पर जीते दारा सिंह चौहान के इस्तीफे की वजह से इस सीट पर उप-चुनाव हो रहे हैं। दारा सिंह चौहान अब भाजपा के टिकट पर मैदान में हैं। घोसी विधानसभा उपचुनाव में जीत भारतीय जनता पार्टी और समाजवादी पार्टी दोनों के लिए ही प्रतिष्ठा का प्रश्न बन चुकी है।
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दोनों पार्टियां इस चुनाव को कितनी गंभीरता से ले रही हैं इसका अंदाजा इसी से लगा सकते हैं कि अब तक उपचुनाव से दूरी बनाए रखने वाले अखिलेश यादव भी यहां सपा उम्मीदवार के लिए वोट मांगने आ चुके हैं। वहीं, मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ भी भाजपा प्रत्याशी के लिए वोट मांगने घोसी आएंगे। दोनों ही दलों के अधिकांश नेताओं ने घोसी में डेरा जमा रखा है। नतीजे क्या होंगे इसका पता आठ सितंबर को चलेगा। इससे पहले आइये इस सीट के सियासी इतिहास और जातीय समीकरण के बारे में जानते हैं।
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Ghosi By Poll: Ghosi assembly seat history and caste equation
घोसी विधानसभा उपचुनाव में सपा और भाजपा उम्मीदवार - फोटो : अमर उजाला
इस चुनाव में किनके बीच है मुकाबला?
इस उपचुनाव में कुल 10 उम्मीदवार मैदान में हैं। सपा विधायक के रूप में इस्तीफा देने वाले दारा सिंह चौहान भाजपा के टिकट पर मैदान में हैं। सपा ने सुधाकर सिंह को उतारा है। सुधाकर सपा के टिकट पर 2012 में यहां से जीत दर्ज कर चुके हैं। बसपा और कांग्रेस जैसे अन्य प्रमुख दलों ने इस चुनाव में अपने उम्मीदवार नहीं उतारे हैं। कांग्रेस ने इस सीट पर सपा उम्मीदवार का समर्थन करने का एलान किया है। वहीं, वाम दलों ने भी सपा को समर्थन की घोषणा की है। 



भाजपा और सपा के अलावा इस सीट से जन अधिकार पार्टी के टिकट पर अफरोज आलम, जनक्रांति पार्टी (राष्ट्रवादी) से मुन्नीलाल चौहान, आम जनता पार्टी (सोशलिस्ट) से राजकुमार चौहान, पीस पार्टी से सनाउल्लाह, जन राज्य पार्टी से सुनील चौहान और तीन निर्दलीय उम्मीदावर मैदान में हैं। निर्दलीय प्रत्याशियों में परवेंद्र प्रताप सिंह, रमेश पांडेय और विनय कुमार शामिल हैं। 

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अखिलेश यादव के साथ दारा सिंह चौहान - फोटो : सोशल मीडिया।
2022 में कैसे रहे थे इस सीट से नतीजे?
2022 के विधानसभा चुनाव में इस सीट से सपा के दारा सिंह चौहान ने भाजपा के विजय कुमार राजभर को 22 हजार से ज्यादा वोटों से हराया था। इस चुनाव में कुल 10 उम्मीदवार मैदान में थे। बसपा के वसीम इकबाल तीसरे नंबर पर रहे थे। सपा, भाजपा और बसपा उम्मीदवारों को छोड़कर बाकी सात उम्मीदवारों की जमानत जब्त हो गई थी। दारा सिंह चौहान को कुल 108,430 मिले थे। वहीं, भाजपा उम्मीदवार विजय राजभर को 86,214 वोट से संतोष करना पड़ा था। वहीं, बसपा उम्मीदवार वसीम इकबाल को 54,248 वोट मिले थे।  
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सांकेतिक तस्वीर - फोटो : Social Media
कैसा है घोसी सीट का इतिहास?
1951 में राज्य के पहले चुनाव हुए। उस वक्त घोसी आजमगढ़ जिले का हिस्सा था। घोसी पूर्व और घोसी पश्चिम के नाम से दो विधानसभा सीटें थीं। घोसी पूर्व से सोशलिस्ट पार्टी के राम कुमार और पश्चिम में यूपी रिवोल्यूशनरी सोशलिस्ट पार्टी के झारखंडे राय जीते थे। 

1957 के विधानसभा चुनाव में घोसी सीट अस्तित्व में आई। इस चुनाव में झारखंडे राय यहां से जीते। राय इस बार भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के उम्मीदवार थे। राय को 1962 और 1967 में भी यहां से भाकपा के टिकट पर जीत मिली। लगातार चार बार विधानसभा चुनाव जीतने वाले झारखंडे राय 1968 में घोसी लोकसभा सीट से सांसद बन गए। इसके बाद 1971 और 1980 में भी यहां से लोकसभा पहुंचे। 1977 में उन्हें जनता लहर में हार का सामना करना पड़ा था। 

झारखंडे राय के लोकसभा जाने के बाद 1969 में पहली बार यहां से कांग्रेस को जीत मिली। तब कांग्रेस के राम बिलास ने भाकपा के जफर अंसारी को हराया था। हालांकि, 1974 के विधानसभा चुनाव में अंसारी ने एक बार फिर यह सीट भाकपा की झोली में डाल दी। 1977 की जनता लहर में घोसी विधानसभा सीट से जनता पार्टी के विक्रमा राय को जीत मिली और जफर अंसारी को एक बार फिर हार का सामना करना पड़ा। इस चुनाव के बाद कभी भी भाकपा इस सीट पर मुख्य मुकाबले में भी नहीं रही। 

1980 में इस सीट से केदार तो 1989 में सुभाष कांग्रेस के टिकट पर जीतने में सफल रहे। 1985 में यहां से लोकदल के टिकट पर फागू चौहान जीते। इसके बाद इस सीट की पहचना फागू चौहान के नाम से हो गई। चौहान यहां से छह बार जीतकर विधानसभा पहुंचे। 1985 में जीतने बाद 1989 में उन्हें जनता दल के टिकट पर हार का सामना करना पड़ा। 

1991 में फागू चौहान जनता दल के टिकट पर जीते तो अगले चुनाव में उन्हें बसपा के अछैबर भारती से हार मिली। 1996 के विधानसभा चुनाव में फागू चौहान पहली बार भाजपा उम्मीदवार के तौर पर मैदान में थे। इस चुनाव में उन्हें तीसरी बार जीत मिली। इसके बाद 2002 में एक बार फिर वह भाजपा के टिकट पर विधानसभा पहुंचे। वहीं, 2007 एक बार फिर फागू चौहान ने पाला बदला और बसपा के टिकट पर जीतकर पांचवीं बार विधानसभा पहुंचे। 

2012 में यहां से सपा के सुधाकर सिंह को जीत मिली। उन्होंने बसपा के टिकट पर मैदान में उतरे फागू चौहान को हराया। 2017 के चुनाव में फागू चौहान एक बार फिर भाजपा के टिकट जीतने में सफल रहे। उन्होंने बसपा के अब्बास अंसारी को मात दी। वहीं, सपा के सुधाकर सिंह तीसरे स्थान पर रहे। फागू चौहान को बिहार का राज्यपाल बना दिए जाने के बाद खाली हुई सीट पर वर्ष 2019 में हुए उपचुनाव में भाजपा के विजय राजभर विधायक चुने गए। 

2022 में भाजपा छोड़कर सपा में आए दारा सिंह चौहान यहां से जीते। उन्होंने भाजपा के विजय राजभर को हराया। अब दारा सिंह चौहान ने विधायकी छोड़कर फिर से भाजपा का दामन थाम लिया है। इस वजह से घोसी सीट पर साढ़े छह साल के भीतर चौथी बार चुनाव हो रहे हैं। 

घोसी में किस पार्टी को कितनी बार मिली सफलता?
1957 में घोसी सीट अस्तित्व में आई। तब से अब तक हुए चुनावों में चार-चार बार भाकपा और भाजपा, तीन बार कांग्रेस, दो-दो बार बसपा और सपा, एक-एक बार जनता पार्टी, लोकदल और जनता दल को जीत मिली है।   

कैसा है घोसी सीट का जातीय समीकरण?
इस सीट पर साढ़े चार लाख से ज्यादा मतदाता हैं। इनमें सबसे ज्यादा आबादी मुस्लिम और दलित मतदाताओं की है। 90 हजार से अधिक मुस्लिम मतदाता जीत-हार में बड़ी भूमिका निभाते हैं। वहीं, करीब 70 हजार से ज्यादा दलित मतदाता भी निर्णायक भूमिका में हैं। वहीं, करीब 60 हजार यादव तो 52 हजार से ज्यादा राजभर मतदाता भी यहां अहम भूमिका निभाते हैं। इसके साथ ही घोसी सीट पर क्षत्रिय, निषाद, मौर्य, भूमिहार मतदाताओं की संख्या भी 10-10 हजार से ज्यादा है।
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