तमिलनाडु के तूतीकोरिन में स्टरलाइट कॉपर विवाद की वजह से एक बार फिर अनिल अग्रवाल चर्चा में हैं। राज्य के लोगों ने कंपनी पर पर्यावरण को नुकसान पहुंचाने के साथ ही प्रदूषण के लिए जिम्मेदार बताया गया था। पुलिस और प्रदर्शनकारियों के बीच हुई हिंसक झड़प में 13 लोगों को अपनी जान गंवानी पड़ी थी। जिसके बाद राज्य सरकार ने इस प्लांट को बंद करने का आदेश दिया था। इसके अलावा राज्य में अपनी शाखा खोलने के लिए कंपनी को जमीन आंवटित हुई थी उसे भी विवाद की वजह से रद्द कर दिया गया।
स्टरलाइट विवाद सामने आने के बाद बहुत से लोग जानना चाहते हैं कि आखिर यह अनिल अग्रवाल कौन हैं। तो आपको यह जानकर हैरानी होगी कि आज मेटल किंग बन चुके अग्रवाल किसी समय पर स्क्रैप डीलर हुआ करते थे। उनका जन्म और परवरिश पटना के एक मारवाड़ी परिवार में हुआ था। उनके पिता का नाम द्वारका प्रसाद अग्रवाल है जो एक छोटे से एल्युमिनियम कंडक्टर बिजनेस के मालिक थे। अनिल ने पटना के मिलर हाईस्कूल में पढ़ाई की है। यूनिवर्सिटी में पढ़ने की बजाए उन्होंने अपने पिता के बिजनेस को प्राथमिकता दी और एल्युमिनियम कंडक्टर बनाए। 19 साल की उम्र में वह करियर बनाने के लिए पटना से मुंबई चले गए।
1970 के मध्य में अनिल ने स्क्रैप मेटल की ट्रेडिंग करनी शुरू कर दी। वह दूसरे राज्यों के केबल कंपनियों से मेटल इकट्ठा करके उसे मुंबई में बेचा करते थे। 1976 को उन्होंने शमशेर स्टरलिंग कॉरपोरेशन को अधिग्रहित कर लिया। यह कंपनी एनामेल्ड कॉपर का निर्माण करती थी। 1986 में उन्होंने जैली फील्ड केबल को बनाना शुरू किया और स्टरलाइट कंपनी की नींव रखी। जल्द ही उन्हें लगा कि उनके बिजनेस का मुनाफा कच्चे माल की कीमत की वजह से अस्थिर हो रहा है। इसलिए वह खुद मेटल निर्माण के क्षेत्र में उतर गए।
2003 में अतंर्राष्ट्रीय बाजार में उतरने के लिए अग्रवाल ने वेदांता रिसोर्सिस की नींव रखी। वह कई राष्ट्रवादी मुहिमों से जुड़ रहे हैं। उन्होंने कई सरकारी अभियानों की फंडिंग की है। लाखों डॉलर वह बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ जैसे सरकारी कार्यक्रमों पर खर्च करते रहे हैं। फिर भी उनका नाम अकसर विवादों से जुड़ता रहा है। लांजीगढ़ से लंदन तक और अब तूतीकोरिन तक वेदांता की कई मामलों को लेकर निंदा होती रही है। ब्रिटिश सरकार, राहुल गांधी, पॉप आइकन्स, ग्रीन लॉबिस्ट से लेकर संवेदनशील पूंजीवादी समूहों तक के वह निशाने पर रहे हैं।
ओडिशा, तमिलनाडु समेत कई राज्यों में सामुदायिक हितों को नजरअंदाज करने के आरोप अग्रवाल की कंपनी पर लगते रहे हैं। तूतीकोरिन भी इससे कुछ अलग नहीं है। साल 1994 तक तूतीकोरिन प्रोजेक्ट की कड़ी स्क्रूटनी होती थी, लेकिन फिर धीरे-धीरे यह ढीला होता गया। इंडस्ट्री फ्रेंडली कहे जाने वाले 3 राज्यों ने अनिल अग्रवाल को रिजेक्ट कर दिया था। इसके बाद तमिलनाडु की उस समय मुख्यमंत्री रहीं जयललिता ने उन्हें अपने राज्य में आमंत्रण दिया था।