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अमेरिका के रक्षा मंत्री लॉयड ऑस्टिन भारत को क्या देकर गए और क्या ले गए?

Sun, 21 Mar 2021 12:49 PM IST
शशिधर पाठक Published by: प्रियंका तिवारी Updated Sun, 21 Mar 2021 12:49 PM IST
सार

  • शुक्रवार को प्रधानमंत्री मोदी और एनएसए डोभाल से की थी चर्चा
  • विदेश मंत्री से की एक घंटे की बात, रक्षा मंत्री से चर्चा
  • अमेरिका का एक प्रतिनिधिमंडल चीन में, चल रही है पड़ोसी देश से हॉट टॉक
  • पूर्वी लद्दाख से लेकर दक्षिण चीन सागर, हिंद महासागर तक है भारत की चिंताएं

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From diplomats to foreign affairs experts are involved in assessing the visit of US Defense Minister Lloyd Austin to India
अमेरिका के रक्षा सचिव लॉयड जेम्स ऑस्टिन और पीएम मोदी - फोटो : ANI

विस्तार

चीन में अमेरिका के प्रतिनिधि, राजनयिक पड़ोसी देश के समकक्षों से चर्चा कर रहे हैं। इसी चर्चा के दौरान अमेरिका के रक्षा सचिव लॉयड ऑस्टिन भारत दौरा पूरा करके अपने देश लौट रहे हैं। ऑस्टिन ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार (एनएसए) अजीत डोभाल, विदेश मंत्री एस जयशंकर और रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह के साथ भेंट करके विभिन्न मुद्दों पर चर्चा की है। चर्चा में दोनों देशों के बीच में रक्षा सहयोग, द्विपक्षीय, क्षेत्रीय, अंतरराष्ट्रीय मुद्दे हिस्सा बने हैं। अपने आखिरी वक्तव्य में ऑस्टिन ने खुले हिंद महासागर के पुरजोर समर्थन को अमेरिका के राष्ट्रपति जो बाइडन नीति का प्रमुख हिस्सा बताया है। ऐसे में राजनयिक से लेकर विदेश मामलों के जानकार रक्षा मंत्री ऑस्टिन के दौरे का आकलन करने में जुटे हैं। 

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अमेरिकी रक्षा सचिव ऑस्टिन के वक्तव्य की दो बातें महत्वपूर्ण हैं। उन्होंने भारत के साथ समग्र प्रगतिशील साझेदारी पर जोर दिया और हिंद महासागरीय क्षेत्र (विशेषकर दक्षिण चीन सागर) में उत्पन्न चुनौती को रेखांकित किया। ऑस्टिन ने इस मामले में भारत समेत तमाम समान विचारधारा के देशों के साथ इस क्षेत्र में स्वतंत्र, भय रहित नौवहन तथा वायु क्षेत्र के इस्तेमाल को बाइडन-हैरिस प्रशासन की प्रमुखता बताया। उन्होंने सीधे तौर पर इसमें चीन का नाम तो नहीं लिया, लेकिन परोक्ष रूप से उसे सीधे भारत से आगाह किया। अमेरिका में जो बाइडन प्रशासन के सत्ता संभालने के बाद लॉयड ऑस्टिन का यह पहला दौरा है इसलिए अभी किसी बड़े नतीजे पर पहुंचना जल्दबाजी होगी।

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चीन में अमेरिका का प्रतिनिधि मंडल और हॉट टॉक

इसे कोई संयोग नहीं कहा जा सकता। यह अमेरिका के रणनीतिकारों की योजना का हिस्सा है। ऑस्टिन जब भारत में थे तो 18 मार्च को चीन में अमेरिकी राजनयिकों का प्रतिनिधिमंडल पहुंचा था। चीन के साथ विभिन्न मुद्दों पर दोनों पक्षों में हॉट टॉक हुआ। चीन के विदेश मंत्री वांग यी, एनएसए यांग जिची, अमेरिका के विदेश मंत्री ब्लिंकेन और एनएसए सुलविन से जमकर उलझे। इसमें चीन ने खुलकर अमेरिका के अपने विरुद्ध प्रयासों और मुद्दों पर चर्चा की। चीन के राजनयिकों ने साफ किया कि अमेरिका के इस निरर्थक दबाव के आगे उनका देश अपना नजरिया नहीं बदलेगा। अमेरिका ने भी तिब्बत, हांगकांग समेत चीन को चुभने वाले मुद्दों पर खुलकर अपना प्रयास जारी रखने की प्रतिबद्धता दोहराई। एक तरह से देखा जाए तो यह अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की नीतियों को जो बाइडन प्रशासन द्वारा जारी रखने का प्रयास है।

अमेरिका ने इसके बहाने दुनिया को संदेश दिया है कि वह चीन के खिलाफ खुलकर मैदान में आ गया है और चीन को आगे बढ़ने से रोक चाहता है। कूटनीति, अर्थ नीति, व्यापार नीति और अंतरराष्ट्रीय संबंधों को समझने वालों का कहना है कि अमेरिका चीन के साथ एक झटके में किसी संबंध को खत्म कर लेने की स्थिति में नहीं है। उसे चीन के इंजीनियरों समेत तमाम क्षेत्रों में आपसी सहयोग की आवश्यकता है। इधर, चीन को भी अमेरिका की जरूरत है लेकिन चीन जहां अब अमेरिका से बराबरी करने में लगा है, वहीं अमेरिका चीन के रास्ते में रोड़ा बन रहा है। इसलिए बहुत जल्दबाजी में कोई नतीजा निकाल लेना अच्छा नहीं रहेगा। अभी अमेरिका जो कर रहा है, उसका उद्देश्य दक्षिण चीन सागर से लेकर हिंद प्रशांत महासागर तक अपने व्यापारिक हितों की रक्षा करना है।

चीन विरोधी गुट का हिस्सा बनने से बचना भारत की बड़ी जिम्मेदारी

रूस के विदेश मंत्री सर्गेई लावरोव राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के माउथ पीस माने जाते हैं। लावरोव ने कुछ महीने पहले भारत के संबंध में बयान देकर कहा था कि वह (भारत) चीन विरोधी गुट के प्रयास में उलझ रहा है। लावरोव के इस बयान को तब कूटनीति के जानकारों ने बड़ी गंभीरता से लिया था। यह चीन, पाकिस्तान, ईरान के गहराते संबंध की तरफ इशारा कर रहा था। इसका सीधा अर्थ है कि भारत और रूस के बीच में दूरी का बढ़ना, अमेरिका के निकट आना और अफगानिस्तान पर टिकी चीन, रूस, ईरान की निगाह। अंदरखाने में भारत के रणनीतिकार बदल रहे परिदृश्य को साफ समझ रहे थे। राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल की अचानक अफगानिस्तान यात्रा, पाकिस्तान के साथ संबंध का संकेत देना और अफगानिस्तान वार्ता में भारत को हिस्सा बनाना इसी का हिस्सा था। 

पूर्व विदेश सचिव शशांक, विदेश और खासकर दक्षिण एशिया के मामले को गहराई से समझने वाले प्रो. सुखदेव मुनि या फिर रक्षा और सामरिक रणनीति, विदेश नीति पर निगाह रखने वाले सेना से रिटायर मेजर जनरल अशोक मेहता इसे बड़ी भूल सुधार मान रहे हैं। कुछ राजनयिकों का कहना है कि अपने क्षेत्रीय, अंतरराष्ट्रीय और सामरिक हितों को देखते हुए भारत को चीन विरोधी गुट के साथ खुलकर खड़े होने का निर्णय संवेदनशील होकर लेना चाहिए। रूस के साथ संतुलित रिश्ते की अभी भी जरूरत है। मध्य एशिया तक भारत को पहुंचाने के अपने रास्ते बंद नहीं करने चाहिए और यह रास्ता अफगानिस्तान के साथ हितों के सधने के बाद संभव है।

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दक्षिण एशिया में ध्यान देने की आवश्यकता

अमेरिका और जो बाइडन प्रशासन लगातार भारत और पाकिस्तान में संवाद की शुरुआत कराने का श्रेय ले रहा है। भारत के कुछ जानकारों को इससे कुछ रिश्ते सुधरने की उम्मीद भी दिखाई दे रही है। अमेरिका के साथ कई बड़े रक्षा समझौते हो चुके हैं। अब इसे आगे बढ़ाने की जरूरत है। अभी इस बारे में लॉयड ऑस्टिन ने कुछ खास नहीं कहा है। वह काट्सा (काउंटरिंग अमेरिकाज एडवर्सरीज थ्रू सैंक्शंस एक्ट) के बारे में भी कुछ नहीं बोले। 

एक अनुमान है कि एनएसए डोभाल से उनकी भारत के सामने आसन्न बड़ी चुनौती पर वार्ता हुई होगी। रक्षा मंत्री से भविष्य के सहयोग पर विमर्श हुआ होगा। चर्चा में पाकिस्तान और चीन से जुड़े मुद्दे भी रहे ही होंगे। कूटनीति के जानकार कहते हैं कि संवाद बंद होते ही सभी रास्ते बंद हो जाते हैं। इसलिए पाकिस्तान के साथ जो पिछले चार-पांच साल से कर रहे थे, ऐसा नहीं होना चाहिए। भारत को पहले की तरह पड़ोसी नीति को संवेदनशीलता के साथ आगे बढ़ाते रहना चाहिए।

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