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Gen. S Padmanabhan: पूर्व आर्मी चीफ पाकिस्तान के खिलाफ 'ऑपरेशन कबड्डी' चाहते थे, कारगिल का बदला लेने की सोच!
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जनरल एस. पद्मनाभन
- फोटो :
Amar Ujala
विस्तार
कारगिल युद्ध समाप्त होने के बाद एक अक्तूबर 2001 को दक्षिणी कमान के जीओसी लेफ्टिनेंट जनरल सुंदरराजन पद्मनाभन को 19वां आर्मी चीफ नियुक्त किया गया। सोमवार को उनका चेन्नई में निधन हो गया। जनरल पद्मनाभन सेना के उन काबिल अफसरों में से थे, जिन्होंने कश्मीर घाटी में 15 कोर के कमांडर रहते हुए न केवल आतंकवाद पर विजय पाई, बल्कि दिसंबर 2001 में, संसद पर हमले के बाद, 'ऑपरेशन पराक्रम' की रणनीति भी तैयार की थी। वहीं, अगर 9/11 का आतंकी हमला न हुआ होता, तो पाकिस्तान के खिलाफ 'ऑपरेशन कबड्डी' भी शुरू कर दिया होता। उनके बारे में कहा जाता है कि अगर उन्हें उत्तरी कमान से ट्रांफसर करके दक्षिणी कमान न भेजा जाता तो, शायद कारगिल की स्थिति कुछ अलग ही होती।कुशल सैन्य रणनीतिकार थे जनरल पद्मनाभन
रक्षा विशेषज्ञ विक्रमजीत सिंह बताते हैं कि जब वे नॉर्दन कमांड के कमांडर के थे, तो अगस्त 1997 में, ताशी नामगियाल ने बटालिक के याल्डोर में पाक सेना के गश्ती दल की घुसपैठ के बारे में सूचना दी थी। उस समय लेफ्टिनेंट जनरल पद्मनाभन ने 9 महार को याल्डोर में स्पेशल फॉरवर्ड पेट्रोल बेस का आदेश दिया था। हालांकि, 1998 में मेजर जनरल बधवार ने उस पेट्रोल बेस हटा दिया। जिसके बाद अगले साल पाक ने बटालिक पर हमला कर दिया था। उनका मानना है कि कारगिल युद्ध के हालात अलग हो सकते थे, अगर जनरल पद्मनाभन को नॉर्दन कमांड से ट्रांसफर करके दक्षिणी कमान नहीं भेजा जाता। वह बेहद कुशल सैन्य रणनीतिकार थे। सेना मुख्यालय ने उनकी जगह लेफ्टिनेंट जनरल एचएम खन्ना को नॉर्दन कमांड को जिम्मा सौंपा था। लेकिन कारगिल युद्ध की शुरुआत में ही लेफ्टिनेंट जनरल एचएम खन्ना पांच दिन 13-18 मई, 1999 को छुट्टी पर पुणे चले गए। जिसके परिणाम भारतीय सेना को बाद में भुगतने पड़े। क्योंकि युद्ध पर उनकी कोई पकड़ नहीं थी।
सितंबर 2001 में शुरू होना था ऑपरेशन
कारगिल युद्ध में योजना और रणनीतिक स्तर पर शामिल नहीं हो पाने की टीस तत्कालीन लेफ्टिनेंट जनरल पद्मनाभन को भी थी। एक अक्तूबर 2001 को आर्मी चीफ का पदभार संभालने के बाद जनरल पद्मनाभन ने पाकिस्तान के खिलाफ एक बड़े ऑपरेशन की तैयारी की थी। 'ऑपरेशन कबड्डी' के तहत सितंबर 2001 में एलओसी पर घुसपैठ रोकने के लिए एक बड़ी प्लानिंग की गई। जिसके तहत सीमा पार से घुसपैठ को खत्म करने के लिए 25-30 पाकिस्तानी चौकियों को कब्जे में लेने की योजना बनाई गई। कहा जाता है कि अगर यह योजना सफल हो जाती तो 2016 में सर्जिकल स्ट्राइक से पहले नियंत्रण रेखा पार करके पाकिस्तानी इलाकों पर कब्जा करने की यह सबसे बड़ी योजना होती।
2016 की सर्जिकल स्ट्राइक से बड़ा था ऑपरेशन
जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के प्रोफेसर हैप्पीमॉन जैकब की किताब "लाइन ऑन फायर: सीजफायर वायलेशंस एंड इंडिया-पाकिस्तान एस्केलेशन डायनेमिक्स" में उन्होंने लिखा है कि 'ऑपरेशन कबड्डी' पाकिस्तान द्वारा किए गए "भूमि हड़पने" की सभी प्रयास से कहीं बड़े स्तर पर होता, जिसकी वजह से 1999 में कारगिल युद्ध हुआ था। ऑपरेशन कबड्डी का उद्देश्य नियंत्रण रेखा की ज्योग्राफी को बदलना था, ताकि वहां टैक्टिकल पॉइंट्स पर पहुंच बनाई जा सके, ताकि सेना को पाकिस्तान की तरफ से होने वाली घुसपैठ से निपटने में मदद मिलती। वह कहते हैं कि 2016 में हुई सर्जिकल स्ट्राइक में पाकिस्तानी सेना के किसी भी जवान की मौत नहीं हुई थी और न ही किसी की जमीन पर कब्ज़ा किया गया था। लेकिन 'ऑपरेशन कबड्डी' में सीधा चौकियों पर कब्जा करना था, जैसा कि मुशर्रफ ने कारगिल युद्ध में करने की कोशिश की थी।
ये अफसर थे शामिल
किताब में लिखा है कि ऑपरेशन के रणनीतिकारों में शामिल दो अफसरों- लेफ्टिनेंट जनरल रुस्तम के. नानावटी, (उत्तरी सेना कमांडर, 2001-2003) और लेफ्टिनेंट जनरल एचएस पनाग, सेना की उत्तरी कमान और मध्य कमान के जनरल ऑफिसर कमांडिंग इन चीफ (जीओसी इन सी) 2006-2008) ने जून 2001 में नई दिल्ली में सेना प्रमुख (सीओएएस) के कार्यालय में आयोजित बैठक में इस पर चर्चा की। बैठक की अध्यक्षता तत्कालीन भारतीय सेना प्रमुख जनरल सुंदरराजन पद्मनाभन ने की थी। इस योजना में जम्मू-कश्मीर के लद्दाख क्षेत्र के बटालिक सेक्टर से लेकर जम्मू सेक्टर के चंब-जौरियां तक 25 से 30 पाकिस्तानी सैन्य चौकियों पर कब्जा करना था, जिसमें प्रत्येक ब्रिगेड को एक या दो चौकियों पर कब्जा करने का जिम्मा सौंपा गया था।
9/11 के हमलों ने बदले हालात
किताब में उन्होंने लिखा है कि इन चौकियों पर “कई चरणों” में एक सरप्राइज ऑपरेशन के तहत एक तय समय सीमा में पूरा किया जाना था, ताकि पूर्ण रूप से युद्ध ने छिड़ जाए। इसमें शामिल यूनिट्स को 1 सितंबर, 2001 को ऑपरेशन कबड्डी के लिए तैयार किया गया, लेकिन 9/11 के हमलों के बाद बदले भू-राजनीतिक हालात ने इस ऑपरेशन को रोक दिया। क्योंकि अगर किया जाता तो इसे “एक त्रासदी का लाभ उठाना” माना जाता और “अंतर्राष्ट्रीय समुदाय इसे गलत नजरों से देखता। हालांकि दिसंबर 2001 में, संसद पर हमले के बाद, सेना ने 'ऑपरेशन पराक्रम' के लिए कमर कस ली थी, जिसके बाद पाकिस्तानी सेना के साथ कई महीनों तक गतिरोध चला था।
एलओसी पार टैक्टिकल पॉइंट्स पर कब्जा
हालांकि इस बात पर कोई स्पष्टता नहीं है कि ऑपरेशन के लिए राजनीतिक मंजूरी थी या नहीं। ऑपरेशन कबड्डी के तहत जो रणनीति बनाई गई थी, उसमें नियंत्रण रेखा के पार सैन्य और आतंकवादी ठिकानों को नष्ट करने के लिए गोलीबारी, नियंत्रण रेखा के पार घात लगा कर छापेमारी मारना, और नियंत्रण रेखा (एलओसी) के पार टैक्टिकल पॉइंट्स पर कब्जा करने के लिए कंपनी, बटालियन और ब्रिगेड के आक्रामक हमले शामिल थे। अगर यह ऑपरेशन अपने अंजाम तक पहुंचा होता, तो भारतीय सेना की आतंकवाद विरोधी (काउंटर इनसर्जेंसी) में बड़ा सुधार होता।