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सीट का समीकरण: 3 दलों से 5 चुनाव जीते रामचंद्र, 2017 में BJP ने रोका विजय रथ, 2022 में बेटे ने जीता कप्तानगंज
Sun, 13 Sep 2026 06:30 AM IST
अमन तिवारी
इलेक्शन डेस्क, नोएडा
इलेक्शन डेस्क, नोएडा
Published by: अमन तिवारी
Updated Sun, 13 Sep 2026 06:30 AM IST
सार
बस्ती जिले की कप्तानगंज विधानसभा सीट 1974 में अस्तित्व में आई। शुरुआती चार में से तीन चुनाव कांग्रेस ने जीते। 1993 से 2022 के दौरान यहां से तीन बार बसपा तो दो-दो बार भाजपा और सपा को जीत मिली है।
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कप्तानगंज सीट का समीकरण
- फोटो : अमर उजाला
विस्तार
उत्तर प्रदेश में 2027 के विधानसभा चुनाव को लेकर सियासी पारा चढ़ने लगा है। भले ही चुनाव में अभी कुछ समय हो, लेकिन राज्य के हर जिले और चौपाल पर राजनीतिक चर्चाओं का दौर शुरू हो चुका है। भाजपा जहां अपनी सरकार को बरकरार रखने की रणनीति पर काम कर रही है, वहीं विपक्ष सत्ता परिवर्तन के लिए नए समीकरण बनाने में जुटा है। उत्तर प्रदेश की इसी चुनावी सरगर्मी के बीच, हम आपको राज्य की हर सीट के इतिहास और राजनीतिक परिदृश्य के बारे में विस्तार से बता रहे हैं। इसी कड़ी में आज बात बस्ती जिले की कप्तानगंज विधानसभा सीट की होगी। आइए, जानते हैं इस सीट का पूरा सियासी गणित और इतिहास।
पहले जानते हैं कप्तानगंज विधानसभा सीट के बारे में
उत्तर प्रदेश के 75 जिलों में से एक जिला बस्ती है। जिले में कुल पांच विधानसभा सीटें हैं। इनमें- हर्रैया, कप्तानगंज, रुधौली, बस्ती सदर और महादेवा शामिल हैं। सीटों के समीकरण की कड़ी में आज हम कप्तानगंज विधानसभा सीट की बात करेंगे। कप्तानगंज विधानसभा सीट परिसीमन के बाद 1974 में अस्तित्व में आई थी। इससे पहले इस क्षेत्र के हिस्से मुख्य रूप से 'बस्ती नगर' और 'हर्रैया पूर्व' विधानसभा सीटों के अंतर्गत आते थे। इस सीट से पहले विधायक राम लखन बने थे, उन्होंने कांग्रेस के टिकट पर चुनाव में जीत हासिल की थी।
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पहले जानते हैं कप्तानगंज विधानसभा सीट के बारे में
उत्तर प्रदेश के 75 जिलों में से एक जिला बस्ती है। जिले में कुल पांच विधानसभा सीटें हैं। इनमें- हर्रैया, कप्तानगंज, रुधौली, बस्ती सदर और महादेवा शामिल हैं। सीटों के समीकरण की कड़ी में आज हम कप्तानगंज विधानसभा सीट की बात करेंगे। कप्तानगंज विधानसभा सीट परिसीमन के बाद 1974 में अस्तित्व में आई थी। इससे पहले इस क्षेत्र के हिस्से मुख्य रूप से 'बस्ती नगर' और 'हर्रैया पूर्व' विधानसभा सीटों के अंतर्गत आते थे। इस सीट से पहले विधायक राम लखन बने थे, उन्होंने कांग्रेस के टिकट पर चुनाव में जीत हासिल की थी।
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कप्तानगंज विधानसभा सीट का जातीय समीकरण
कप्तानगंज विधानसभा सीट के जातिगत समीकरण की बात करें तो कुल मतदाताओं में अनुसूचित जाति (SC), कुर्मी और ब्राह्मण आबादी सबसे निर्णायक भूमिका निभाती है। क्षेत्र में सर्वाधिक आबादी अनुसूचित जाति के मतदाताओं की है, जो लगभग 21% हैं। इसके बाद कुर्मी मतदाताओं की हिस्सेदारी करीब 20% और ब्राह्मण मतदाताओं की करीब 13% है, जबकि मुस्लिम मतदाता लगभग 12% हैं। वहीं यादव मतदाताओं की संख्या करीब 7%, ठाकुर मतदाताओं की हिस्सेदारी लगभग 6%, राजभर मतदाता करीब 4%, मौर्या मतदाता लगभग 3% और बनिया मतदाता करीब 3% हैं। बाकी बचे मतदाता अन्य जातियों और समुदायों से आते हैं।
कप्तानगंज विधानसभा सीट का चुनावी इतिहास
1974: कांग्रेस ने मारी बाजी
1974 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में कप्तानगंज विधानसभा सीट से कांग्रेस के राम लखन विजयी हुए। उन्होंने नेशनल कांग्रेस ऑर्गनाइजेशन (NCO) के जितेंद्र सिंह को 12,242 वोटों के अंतर से हराया। चुनाव में राम लखन को 22,352 वोट मिले, जबकि जितेंद्र सिंह को 10,110 वोट मिले।
कप्तानगंज विधानसभा सीट के जातिगत समीकरण की बात करें तो कुल मतदाताओं में अनुसूचित जाति (SC), कुर्मी और ब्राह्मण आबादी सबसे निर्णायक भूमिका निभाती है। क्षेत्र में सर्वाधिक आबादी अनुसूचित जाति के मतदाताओं की है, जो लगभग 21% हैं। इसके बाद कुर्मी मतदाताओं की हिस्सेदारी करीब 20% और ब्राह्मण मतदाताओं की करीब 13% है, जबकि मुस्लिम मतदाता लगभग 12% हैं। वहीं यादव मतदाताओं की संख्या करीब 7%, ठाकुर मतदाताओं की हिस्सेदारी लगभग 6%, राजभर मतदाता करीब 4%, मौर्या मतदाता लगभग 3% और बनिया मतदाता करीब 3% हैं। बाकी बचे मतदाता अन्य जातियों और समुदायों से आते हैं।
कप्तानगंज विधानसभा सीट का चुनावी इतिहास
1974: कांग्रेस ने मारी बाजी
1974 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में कप्तानगंज विधानसभा सीट से कांग्रेस के राम लखन विजयी हुए। उन्होंने नेशनल कांग्रेस ऑर्गनाइजेशन (NCO) के जितेंद्र सिंह को 12,242 वोटों के अंतर से हराया। चुनाव में राम लखन को 22,352 वोट मिले, जबकि जितेंद्र सिंह को 10,110 वोट मिले।
इन चेहरों को मिली एक से ज्यादा बार जीत
- फोटो : अमर उजाला
आपातकाल का समय और 1977 का सियासी बदलाव
1974 के विधानसभा चुनाव के कुछ समय बाद जून 1975 में देश भर में आपातकाल लगा दिया गया, जो 21 महीनों तक चला। मार्च 1977 में आपातकाल हटा और आम चुनाव हुए। इन चुनावों में कांग्रेस की हार हुई और मोरारजी देसाई के नेतृत्व में पहली गैर-कांग्रेसी 'जनता पार्टी' की सरकार बनी।
सत्ता में आते ही जनता पार्टी की केंद्र सरकार ने तर्क दिया कि हालिया लोकसभा चुनावों में हार के बाद कांग्रेस शासित राज्य सरकारें जनता का विश्वास खो चुकी हैं। इसी आधार पर उत्तर प्रदेश समेत 9 राज्यों की विधानसभाओं को समय से पहले भंग कर राष्ट्रपति शासन लगा दिया गया। इसके बाद जून 1977 में हुए उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनावों में जनता पार्टी को प्रचंड बहुमत मिला और राम नरेश यादव राज्य के नए मुख्यमंत्री बने। हालांकि, अंदरूनी कलह के कारण यह सरकार भी अपना कार्यकाल पूरा नहीं कर सकी।
1974 के विधानसभा चुनाव के कुछ समय बाद जून 1975 में देश भर में आपातकाल लगा दिया गया, जो 21 महीनों तक चला। मार्च 1977 में आपातकाल हटा और आम चुनाव हुए। इन चुनावों में कांग्रेस की हार हुई और मोरारजी देसाई के नेतृत्व में पहली गैर-कांग्रेसी 'जनता पार्टी' की सरकार बनी।
सत्ता में आते ही जनता पार्टी की केंद्र सरकार ने तर्क दिया कि हालिया लोकसभा चुनावों में हार के बाद कांग्रेस शासित राज्य सरकारें जनता का विश्वास खो चुकी हैं। इसी आधार पर उत्तर प्रदेश समेत 9 राज्यों की विधानसभाओं को समय से पहले भंग कर राष्ट्रपति शासन लगा दिया गया। इसके बाद जून 1977 में हुए उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनावों में जनता पार्टी को प्रचंड बहुमत मिला और राम नरेश यादव राज्य के नए मुख्यमंत्री बने। हालांकि, अंदरूनी कलह के कारण यह सरकार भी अपना कार्यकाल पूरा नहीं कर सकी।
1977: पहली बार जनता पार्टी ने जीता चुनाव
1977 के विधानसभा चुनाव में कप्तानगंज विधानसभा सीट से जनता पार्टी (JNP) के ओम प्रकाश उर्फ मिलन सिंह विजयी हुए। उन्होंने कांग्रेस के राम लखन को 15,170 वोटों के अंतर से हराया। चुनाव में ओम प्रकाश उर्फ मिलन सिंह को 33,811 वोट मिले, जबकि राम लखन को 18,641 वोट मिले। वहीं, तीसरे स्थान पर निर्दलीय प्रत्याशी तेज बहादुर रहे, जिन्हें चुनाव में 3,801 वोट मिले।
राजनीतिक अस्थिरता का समय
हालांकि उत्तर प्रदेश में 1977 के बाद 1980 में फिर से विधानसभा चुनाव हुए, क्योंकि केंद्र में जनता पार्टी की सरकार 1980 आते-आते अंदरूनी कलह के कारण बिखर गई। पार्टी के विघटन के बाद जनवरी 1980 में लोकसभा चुनाव हुए। इस चुनाव में इंदिरा गांधी की अगुवाई वाली कांग्रेस ने प्रचंड बहुमत के साथ केंद्र की सत्ता में जोरदार वापसी की। सत्ता में आते ही इंदिरा सरकार ने तर्क दिया कि हालिया लोकसभा चुनावों में जनता पार्टी को राज्यों में बुरी तरह हार मिली है, जिससे यह स्पष्ट होता है कि राज्य सरकारों ने जनता का विश्वास खो दिया है। इसके बाद उत्तर प्रदेश समेत 9 राज्यों की विधानसभाओं को फिर भंग कर दिया गया।
विधानसभा भंग होने के बाद उत्तर प्रदेश में मई 1980 में दोबारा चुनाव कराए गए। इस चुनाव में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने भारी बहुमत हासिल किया और विश्वनाथ प्रताप सिंह (वी.पी. सिंह) उत्तर प्रदेश के नए मुख्यमंत्री बने।
1977 के विधानसभा चुनाव में कप्तानगंज विधानसभा सीट से जनता पार्टी (JNP) के ओम प्रकाश उर्फ मिलन सिंह विजयी हुए। उन्होंने कांग्रेस के राम लखन को 15,170 वोटों के अंतर से हराया। चुनाव में ओम प्रकाश उर्फ मिलन सिंह को 33,811 वोट मिले, जबकि राम लखन को 18,641 वोट मिले। वहीं, तीसरे स्थान पर निर्दलीय प्रत्याशी तेज बहादुर रहे, जिन्हें चुनाव में 3,801 वोट मिले।
राजनीतिक अस्थिरता का समय
हालांकि उत्तर प्रदेश में 1977 के बाद 1980 में फिर से विधानसभा चुनाव हुए, क्योंकि केंद्र में जनता पार्टी की सरकार 1980 आते-आते अंदरूनी कलह के कारण बिखर गई। पार्टी के विघटन के बाद जनवरी 1980 में लोकसभा चुनाव हुए। इस चुनाव में इंदिरा गांधी की अगुवाई वाली कांग्रेस ने प्रचंड बहुमत के साथ केंद्र की सत्ता में जोरदार वापसी की। सत्ता में आते ही इंदिरा सरकार ने तर्क दिया कि हालिया लोकसभा चुनावों में जनता पार्टी को राज्यों में बुरी तरह हार मिली है, जिससे यह स्पष्ट होता है कि राज्य सरकारों ने जनता का विश्वास खो दिया है। इसके बाद उत्तर प्रदेश समेत 9 राज्यों की विधानसभाओं को फिर भंग कर दिया गया।
विधानसभा भंग होने के बाद उत्तर प्रदेश में मई 1980 में दोबारा चुनाव कराए गए। इस चुनाव में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने भारी बहुमत हासिल किया और विश्वनाथ प्रताप सिंह (वी.पी. सिंह) उत्तर प्रदेश के नए मुख्यमंत्री बने।
इन पार्टियों को मिली एक से ज्यादा बार जीत
- फोटो : अमर उजाला
1980 का चुनाव
1980 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में कप्तानगंज विधानसभा सीट से भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस (इंदिरा) के अंबिका सिंह विजयी हुए। उन्होंने जनता पार्टी (एससी) के सताया राम को 6,479 वोटों के अंतर से हराया। चुनाव में अंबिका सिंह को 23,091 वोट मिले, जबकि सताया राम को 16,612 वोट मिले।
1985: कांग्रेस ने दोहराई जीत
इस चुनाव में भी कांग्रेस की अंबिका सिंह ने लगातार दूसरी बार जीत दर्ज की। चुनाव में उन्होंने लोकदल के राम प्रसाद चौधरी को 6,276 वोटों से हराया।
1989 और 1991 में निर्दलीय ने मारी बाजी
वहीं 1989 और 1991 के चुनाव की बात करे तो, निर्दलीय उम्मीदवार कृष्ण किंकर सिंह विजयी हुए। 1989 के चुनाव में कृष्ण किंकर सिंह ने जनता दल के सुरपाल पांडे को 27,992 वोटों से हराया, जबकि 1991 के चुनाव में उन्होंने जनता पार्टी के राम प्रसाद चौधरी को 15,304 वोटों से हराया।
1980 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में कप्तानगंज विधानसभा सीट से भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस (इंदिरा) के अंबिका सिंह विजयी हुए। उन्होंने जनता पार्टी (एससी) के सताया राम को 6,479 वोटों के अंतर से हराया। चुनाव में अंबिका सिंह को 23,091 वोट मिले, जबकि सताया राम को 16,612 वोट मिले।
1985: कांग्रेस ने दोहराई जीत
इस चुनाव में भी कांग्रेस की अंबिका सिंह ने लगातार दूसरी बार जीत दर्ज की। चुनाव में उन्होंने लोकदल के राम प्रसाद चौधरी को 6,276 वोटों से हराया।
1989 और 1991 में निर्दलीय ने मारी बाजी
वहीं 1989 और 1991 के चुनाव की बात करे तो, निर्दलीय उम्मीदवार कृष्ण किंकर सिंह विजयी हुए। 1989 के चुनाव में कृष्ण किंकर सिंह ने जनता दल के सुरपाल पांडे को 27,992 वोटों से हराया, जबकि 1991 के चुनाव में उन्होंने जनता पार्टी के राम प्रसाद चौधरी को 15,304 वोटों से हराया।
1993: पहली बार जीती सपा
वहीं 1993 के चुनाव में कप्तानगंज विधानसभा सीट से समाजवादी पार्टी के राम प्रसाद चौधरी विजयी हुए। उन्होंने भारतीय जनता पार्टी के शीतला को 33,848 वोटों के बड़े अंतर से हराया। चुनाव में राम प्रसाद चौधरी को 55,755 वोट मिले, जबकि शीतला को 21,907 वोट मिले। वहीं, तीसरे स्थान पर निर्दलीय प्रत्याशी कृष्ण किंकर रहे, जिन्हें चुनाव में 20,744 वोट मिले।
1996: कप्तानगंज सीट पर बसपा की हुई एंट्री
इन चुनावों के बाद राम प्रसाद चौधरी बहुजन समाज पार्टी में शामिल हो गए और 1996 के चुनाव में कप्तानगंज विधानसभा सीट से जीत दर्ज की।
2002 में भाजपा ने जीत चुनाव
इस चुनाव में राम प्रसाद चौधरी ने भाजपा के टिकट पर चुनाव लड़कर जीत हासिल की। इस दौरान उन्होंने समाजवादी पार्टी के महेश सिंह को 4,019 वोटों से हराया।
वहीं 1993 के चुनाव में कप्तानगंज विधानसभा सीट से समाजवादी पार्टी के राम प्रसाद चौधरी विजयी हुए। उन्होंने भारतीय जनता पार्टी के शीतला को 33,848 वोटों के बड़े अंतर से हराया। चुनाव में राम प्रसाद चौधरी को 55,755 वोट मिले, जबकि शीतला को 21,907 वोट मिले। वहीं, तीसरे स्थान पर निर्दलीय प्रत्याशी कृष्ण किंकर रहे, जिन्हें चुनाव में 20,744 वोट मिले।
1996: कप्तानगंज सीट पर बसपा की हुई एंट्री
इन चुनावों के बाद राम प्रसाद चौधरी बहुजन समाज पार्टी में शामिल हो गए और 1996 के चुनाव में कप्तानगंज विधानसभा सीट से जीत दर्ज की।
2002 में भाजपा ने जीत चुनाव
इस चुनाव में राम प्रसाद चौधरी ने भाजपा के टिकट पर चुनाव लड़कर जीत हासिल की। इस दौरान उन्होंने समाजवादी पार्टी के महेश सिंह को 4,019 वोटों से हराया।
2022 का नतीजा
- फोटो : अमर उजाला
2007 और 2012 का चुनाव में बसपा का दबदबा
2002 के चुनाव के बाद 2007 में राम प्रसाद चौधरी ने एक बार फिर से बहुजन समाज पार्टी का हाथ थामा और साल 2007 और 2012 के चुनाव में लगातार जीत हासिल की। 2007 के चुनाव में उन्होंने निर्दलीय उम्मीदवार कृष्ण किंकर सिंह राणा को 18,520 वोटों के भारी अंतर से हराया। वहीं 2012 के चुनाव में उन्होंने सपा के त्र्यंबक नाथ को 11,070 वोटों के अंतर से हराया। इस चुनाव में कांग्रेस के कृष्ण किंकर सिंह राणा 46,636 वोटों के साथ तीसरे नंबर पर रहे। 1996 से लेकर 2012 के बीच इस विधानसभा सीट पर राम प्रसाद चौधरी का एकछत्र राज रहा। इस दौरान उन्होंने पार्टियां तो बदलीं, लेकिन इसका असर नतीजों पर नहीं पड़ा और वे लगातार चुनाव जीतते रहे।
2017: भाजपा ने फिर जीत चुनाव
2012 के बाद उत्तर प्रदेश में 2017 में चुनाव हुए। इन चुनावों में राज्य में भाजपा का बोलबाला रहा, क्योंकि राज्य के चुनावी नतीजों में भाजपा ने पूर्ण बहुमत के साथ सरकार बनाई थी। इसका असर बस्ती की कप्तानगंज विधानसभा सीट पर भी देखने को मिला। 2017 के चुनाव की बात करें तो कप्तानगंज विधानसभा सीट से भारतीय जनता पार्टी के चंद्र प्रकाश उर्फ सीए चंद्र प्रकाश शुक्ल विजयी हुए। उन्होंने बहुजन समाज पार्टी (बसपा) के राम प्रसाद चौधरी को 6,827 वोटों के अंतर से हराया। चुनाव में चंद्र प्रकाश को 70,527 वोट मिले, जबकि राम प्रसाद चौधरी को 63,700 वोट मिले। वहीं, तीसरे स्थान पर कांग्रेस के कृष्ण किंकर सिंह राणा रहे, जिन्हें 60,142 वोट मिले।
2022 में सपा की हुई वापसी
2022 के विधानसभा चुनाव में कप्तानगंज विधानसभा सीट से समाजवादी पार्टी (सपा) के कविंद्र चौधरी विजयी हुए। उन्होंने भारतीय जनता पार्टी के चंद्र प्रकाश शुक्ला को 24,179 वोटों के अंतर से हराया। चुनाव में कविंद्र चौधरी को 94,273 वोट मिले, जबकि चंद्र प्रकाश शुक्ला को 70,094 वोट प्राप्त हुए। वहीं, तीसरे स्थान पर बहुजन समाज पार्टी के प्रत्याशी जहीर अहमद रहे, जिन्हें चुनाव में 40,381 वोट मिले।
2002 के चुनाव के बाद 2007 में राम प्रसाद चौधरी ने एक बार फिर से बहुजन समाज पार्टी का हाथ थामा और साल 2007 और 2012 के चुनाव में लगातार जीत हासिल की। 2007 के चुनाव में उन्होंने निर्दलीय उम्मीदवार कृष्ण किंकर सिंह राणा को 18,520 वोटों के भारी अंतर से हराया। वहीं 2012 के चुनाव में उन्होंने सपा के त्र्यंबक नाथ को 11,070 वोटों के अंतर से हराया। इस चुनाव में कांग्रेस के कृष्ण किंकर सिंह राणा 46,636 वोटों के साथ तीसरे नंबर पर रहे। 1996 से लेकर 2012 के बीच इस विधानसभा सीट पर राम प्रसाद चौधरी का एकछत्र राज रहा। इस दौरान उन्होंने पार्टियां तो बदलीं, लेकिन इसका असर नतीजों पर नहीं पड़ा और वे लगातार चुनाव जीतते रहे।
2017: भाजपा ने फिर जीत चुनाव
2012 के बाद उत्तर प्रदेश में 2017 में चुनाव हुए। इन चुनावों में राज्य में भाजपा का बोलबाला रहा, क्योंकि राज्य के चुनावी नतीजों में भाजपा ने पूर्ण बहुमत के साथ सरकार बनाई थी। इसका असर बस्ती की कप्तानगंज विधानसभा सीट पर भी देखने को मिला। 2017 के चुनाव की बात करें तो कप्तानगंज विधानसभा सीट से भारतीय जनता पार्टी के चंद्र प्रकाश उर्फ सीए चंद्र प्रकाश शुक्ल विजयी हुए। उन्होंने बहुजन समाज पार्टी (बसपा) के राम प्रसाद चौधरी को 6,827 वोटों के अंतर से हराया। चुनाव में चंद्र प्रकाश को 70,527 वोट मिले, जबकि राम प्रसाद चौधरी को 63,700 वोट मिले। वहीं, तीसरे स्थान पर कांग्रेस के कृष्ण किंकर सिंह राणा रहे, जिन्हें 60,142 वोट मिले।
2022 में सपा की हुई वापसी
2022 के विधानसभा चुनाव में कप्तानगंज विधानसभा सीट से समाजवादी पार्टी (सपा) के कविंद्र चौधरी विजयी हुए। उन्होंने भारतीय जनता पार्टी के चंद्र प्रकाश शुक्ला को 24,179 वोटों के अंतर से हराया। चुनाव में कविंद्र चौधरी को 94,273 वोट मिले, जबकि चंद्र प्रकाश शुक्ला को 70,094 वोट प्राप्त हुए। वहीं, तीसरे स्थान पर बहुजन समाज पार्टी के प्रत्याशी जहीर अहमद रहे, जिन्हें चुनाव में 40,381 वोट मिले।