पूर्व राजदूत रंजीत रे ने कहा, नेपाल-भारत विवाद के पीछे हो सकती है चीन की चाल
- नेपाल में भारत के राजदूत रहे रंजीत रे से अमर उजाला डॉट कॉम की विशेष बातचीत
- पूर्व राजनयिक ने दोनों देशों के बीच संबंध मजबूत करने के लिए राजनयिक स्तर के साथ-साथ सामाजिक और सांस्कृतिक स्तर पर संबंधों को मजबूत बनाने की वकालत की
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लद्दाख में भारत-चीन के बीच सीमा विवाद के मुद्दे पर गतिरोध जारी है। ऐसे ही समय में पड़ोसी देश नेपाल में भारत विरोधी भावनाओं का उभार देश के लिए अच्छी खबर नहीं है।
भारत-नेपाल संबंधों के विशेषज्ञों का सुझाव है कि दोनों देशों की तरफ से संबंधों को प्रगाढ़ करने की कोशिश की जानी चाहिए। इसके लिए सिर्फ राजनीतिक स्तर पर ही नहीं, सामाजिक और सांस्कृतिक स्तर पर भी मजबूत भागीदारी को बढ़ावा दिया जाना चाहिए।
भारत को अपने करीबी छोटे देशों के प्रति ज्यादा सम्मानजनक और सहयोगी रुख अपनाकर उनका विश्वास जीतने की कोशिश करनी चाहिए, तभी दोनों देशों के बीच संबंधों को मजबूत बनाया जा सकेगा।
नेपाल में भारत के लंबे समय तक राजदूत रहे रंजीत रे ने सोमवार को अमर उजाला डॉट कॉम से विशेष बातचीत की। उन्होंने कहा कि लिपुलेख और कालापानी विवाद पर भारत का पक्ष बहुत मजबूत है।
भारत-चीन के बीच हुए पंचशील समझौते के समय भी इसे भारत और नेपाल के बीच सीमा रेखा की तरह स्वीकार किया गया था। इसके पहले ईस्ट इंडिया कंपनी और भारत के बीच हुए समझौते के दौरान भी काली नदी को भारत-नेपाल के बीच की लाइन के रूप में स्वीकार किया गया था, इसलिए भारत के दावे को नकारना संभव नहीं होगा।
लेकिन इसके बाद भी राष्ट्रीय राजनीतिक मजबूरियों के चलते नेपाल का कोई भी राजनीतिक दल इस मुद्दे पर भारत के रुख का समर्थन करने की हिम्मत नहीं जुटा पायेगा।
ऐसे में बेहद सधी बातचीत और आपसी विश्वास बहाली के जरिये ही इस मुद्दे का समाधान खोजने की कोशिश की जानी चाहिए।
हालांकि, अभी दोनों देशों के बीच बातचीत होने का भी कोई माहौल नहीं है।
क्या भारत-नेपाल के बीच बढ़े विवाद के पीछे चीन की कोई भूमिका हो सकती है? अमर उजाला के इस सवाल पर पूर्व राजदूत रंजीत रे ने कहा कि इस संभावना से बिलकुल इनकार नहीं किया जा सकता।
चीन नेपाल में लगातार विभिन्न तरीकों से अपना दखल बढ़ा रहा है।
सिर्फ आर्थिक मामलों में ही नहीं, माना जाता है कि नेपाल के दो कम्युनिस्ट पार्टियों का विलय कर उन्हें एक बनाने के पीछे भी चीन ने बड़ी भूमिका निभाई है।
इस समय जबकि चीन के साथ भारत का तनाव अपने चरम पर है, चीन की कम्युनिस्ट पार्टी और नेपाल की कम्युनिस्ट पार्टी के बीच लगातार बातचीत जारी है।
भारत के लिए यह एक बड़ा संकेत माना जा सकता है।
क्या भारत ने भी की गलतियां?
नेपाल के मामले में भारत ने भी कई गलतियां की हैं। हमने उसे बिना किसी विशेष प्रयास के हमेशा अपने ही पाले में बने रहने की गलतफहमी पाल ली थी जिसकी कीमत भारत को चुकानी पड़ रही है।
जबकि ऐसे संबंधों को हमेशा बराबरी के पैमाने पर कसते रहने की जरूरत होती है।
रे ने कहा कि नेपाली राजनयिकों की अकसर शिकायत रही है कि भारत उसे अपना भाई मानने की कोशिश करता है जिसमें हमेशा एक बड़ा भाई और एक छोटा भाई होता है।
जबकि नेपाल जैसे देश भारत के साथ बराबरी का मैत्रीपूर्ण संबंध चाहते हैं। भारत को बदले समय में अपने रुख में बदलाव करना चाहिए।
नये युवाओं की उम्मीदों को समझे भारत
नेपाल और भारत के पुराने राजनयिकों के संबंध बड़े करीबी हुआ करते थे, जबकि आज दोनों देशों की नई पीढ़ी आपस में कम करीबी संबंध रखती हैं।
भारत को इस मोर्चे पर अपनी सहभागिता बढ़ानी चाहिए।
इसके लिए केवल राजनीतिक स्तर पर ही नहीं, छात्रों, सामाजिक संगठनों, सामुदायिक कार्यक्रमों और सांस्कृतिक दौरे बढ़ाकर एक दूसरे के करीब जाने की कोशिश की जानी चाहिए।