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महामारी में देशभर के किसान करेंगे संसद के सामने हल्लाबोल, कृषि उत्पाद बाजार समिति खत्म करने के फैसले से हैं नाराज

Sat, 12 Sep 2020 06:08 PM IST
Harendra Chaudhary डिजिटल ब्यूरो, अमर उजाला, नई दिल्ली
डिजिटल ब्यूरो, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: Harendra Chaudhary Updated Sat, 12 Sep 2020 06:08 PM IST
सार

मोदी सरकार ने खेत-खलिहान-अनाज मंडियों पर तीन अध्यादेशों का क्रूर प्रहार किया है। ये काले कानून, देश में खेती व करोड़ों किसान-मजदूर-आढ़ती को खत्म करने की साजिश के दस्तावेज हैं...

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Farmers will protest outside Parliament against the anti farmer Ordinances introduced by Narendra Modi government
all india kisan sangharsh coordination committee - फोटो : PTI (File Photo)

विस्तार

कोरोना संक्रमण फैलने के बाद पहली बार संसद के सामने किसानों का हल्लाबोल होगा। केंद्र सरकार के तीन अध्यादेशों के विरोध में अखिल भारतीय किसान संघर्ष समन्वय समिति (एआईकेएससीसी) ने 14 सितंबर को देशभर के किसानों को दिल्ली बुलाया है। इसके अलावा जिला एवं तहसील स्तर पर भी किसान-विरोध प्रदर्शन करेंगे। एआईकेएससीसी के संयोजक सरदार वीएम सिंह का कहना है कि केंद्र सरकार अन्नदाता के साथ धोखाधड़ी कर रही है। आत्मनिर्भरता का नारा देकर विदेशी कंपनियों और भारतीय कॉरपोरेट जगत को किसानों के साथ लूट मचाने का निमंत्रण दे रही है।

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हरियाणा में किसानों पर लाठियां भांजी

वीएम सिंह के मुताबिक सरकार ने किसानों को बर्बाद करने की ठान ली है। किसानों को ठीक से न्यूनतम समर्थन मूल्य नहीं दिया गया। अब केंद्र सरकार ने किसानों के अलावा उनकी पैदावार को भी दूसरों के हवाले करने का मन बना लिया है। मोदी सरकार कोरोना का बहाना बनाकर अपने किसान विरोधी और कॉरपोरेट पक्षधर फैसलों पर किसानों के विरोध को रोकने का प्रयास कर रही है। हरियाणा में किसानों पर लाठियां भांजी गई। किसानों के हित की बात करने की बजाए सरकार ने किसान विरोधी तीन अध्यादेश और नया बिजली बिल पेश करने की तैयारी की है।

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सोमवार को करोड़ों की संख्या में किसान जिला एवं तहसील मुख्यालयों को घेरने के लिए आगे बढ़ेंगे। मोदी सरकार का बिजली कानून, सभी लोगों के लिए बिजली दर 10 रुपये यूनिट से ज्यादा कर देगा। उपभोक्ताओं के साथ धोखाधड़ी करने के लिए प्रीपेड मीटर लगाए जाएंगे। गरीबी रेखा के नीचे रहने वाले लोगों व किसान उपभोक्ताओं को मिलने वाली छूट समाप्त होगी। एआईकेएससीसी ने सभी सांसदों व पार्टियों को लिखकर निवेदन किया है कि वे इन किसान विरोधी कदमों को वापस कराएं।
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कांग्रेस पार्टी के महासचिव रणदीप सिंह सुरजेवाला का कहना है कि मोदी सरकार पहले जमीन हड़पने का अध्यादेश लाई थी, अब खेती हड़पने के तीन काले कानून लाई है। खेत-खलिहान को पूंजीपतियों के हाथ गिरवी रखने का घिनौना षडयंत्र रचा जा रहा है। हरित क्रांति को हराने की भाजपाई साजिश को कामयाब नहीं होने दिया जाएगा। मोदी सरकार ने खेत-खलिहान-अनाज मंडियों पर तीन अध्यादेशों का क्रूर प्रहार किया है। ये काले कानून, देश में खेती व करोड़ों किसान-मजदूर-आढ़ती को खत्म करने की साजिश के दस्तावेज हैं। कृषि उत्पाद बाजार समिति यानि एपीएमसी (एग्रीकल्चरल प्रोड्यूज मार्केट कमेटी) को खत्म करने से ‘कृषि उपज खरीद व्यवस्था’ पूरी तरह नष्ट हो जाएगी। ऐसे में किसानों को न तो ‘न्यूनतम समर्थन मूल्य’ मिलेगा और न ही बाजार भाव के अनुसार फसल की कीमत।

बिहार का उदाहरण सामने है...

सुरजेवाला के मुताबिक इसका जीता जागता उदाहरण भाजपा शासित बिहार है। साल 2006 में एपीएमसी एक्ट यानि अनाज मंडियों को खत्म कर दिया गया। आज बिहार के किसान की हालत बद से बदतर है। किसान की फसल को दलाल औने-पौने दामों पर खरीदकर दूसरे प्रांतों की मंडियों में मुनाफा कमा एमएसपी पर बेच देते हैं। अगर पूरे देश की कृषि उपज मंडी व्यवस्था ही खत्म हो गई, तो इससे सबसे बड़ा नुकसान किसान-खेत मजदूर को होगा और सबसे बड़ा फायदा मुट्ठीभर पूंजीपतियों को।

किसान को खेत के नजदीक स्थित अनाज मंडी-सब्जी मंडी में उचित दाम किसान के सामूहिक संगठन तथा मंडी में खरीददारों की परस्पर बोलियों के आधार पर मिलता है। मंडी में पूर्व निर्धारित ‘न्यूनतम समर्थन मूल्य’ किसान की फसल के मूल्य निर्धारण का बेंचमार्क है। यही एक उपाय है, जिससे किसान की उपज की सामूहिक तौर से ‘प्राइस डिस्कवरी’ यानि मूल्य निर्धारण हो पाता है।

अनाज-सब्जी मंडी व्यवस्था किसान की फसल की सही कीमत, सही वजन व सही बिक्री की गारंटी है। अगर किसान की फसल को मुट्ठीभर कंपनियां मंडी में सामूहिक खरीद की बजाय उसके खेत से खरीदेंगे, तो फिर मूल्य निर्धारण, वजन व कीमत की सामूहिक मोलभाव की शक्ति खत्म हो जाएगी। स्वाभाविक तौर से इसका नुकसान किसान को होगा।

सफेद झूठ बोल रही है केंद्र सरकार

मोदी सरकार का दावा कि अब किसान अपनी फसल देश में कहीं भी बेच सकता है, पूरी तरह से सफेद झूठ है। आज भी किसान अपनी फसल किसी भी प्रांत में ले जाकर बेच सकता है, परंतु वास्तविक सत्य क्या है। कृषि सेंसस 2015-16 के मुताबिक देश का 86 फीसदी किसान पांच एकड़ से कम भूमि का मालिक है। जमीन की औसत मल्कियत दो एकड़ या उससे कम है। ऐसे में 86 फीसदी किसान अपनी उपज नजदीक अनाज मंडी-सब्जी मंडी के अलावा कहीं और ट्रांसपोर्ट कर न ले जा सकता या बेच सकता है। मंडी प्रणाली नष्ट होते ही सीधा प्रहार स्वाभाविक तौर से किसान पर होगा। मंडियां खत्म होते ही अनाज-सब्जी मंडी में काम करने वाले लाखों-करोड़ों मजदूरों, आढ़तियों, मुनीम, ढुलाईदारों, ट्रांसपोर्टरों व शेलर आदि की रोजी रोटी और आजीविका अपने आप खत्म हो जाएगी।

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