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Hindi News ›   Uttar Pradesh ›   Farmers Protest: Samyukt Kisan Morcha given 144-hour ultimatum to central government, farmer leaders have political aspirations amid of assembly elections 2022

भरोसे की कच्ची 'डोर' के बीच 144 घंटे: चुनावी लपटों में उलझी भाजपा, तो किसान मोर्चे में भी उठा 'धुआं'

Jitendra Bhardwaj जितेंद्र भारद्वाज
Updated Sat, 27 Nov 2021 07:41 PM IST
सार

संयुक्त किसान मोर्चे में शामिल सभी किसान संगठन भले ही तीन कृषि कानूनों पर एकमत रहे हों, लेकिन उनकी राजनीतिक महत्वाकांक्षा से इनकार नहीं किया जा सकता। गुरनाम सिंह चढूनी व बलबीर सिंह राजेवाल सहित कई दूसरे किसान नेता अपनी राजनीतिक पारी के बारे में सोचने लगे हैं। किसान संगठन भी अब आंदोलन को लंबा खींचने के पक्ष में नहीं हैं...

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Farmers Protest: Samyukt Kisan Morcha given 144-hour ultimatum to central government, farmer leaders have political aspirations amid of assembly elections 2022
गाजीपुर बॉर्डर पर किसान आंदोलन का एक साल - फोटो : Agency

विस्तार

केंद्र सरकार और किसान आंदोलन दोबारा से भरोसे की कच्ची 'डोर' पर चलने का प्रयास कर रहे हैं। आंदोलन का एक साल पूरा होने पर किसानों ने दिल्ली की सीमाओं पर जश्न मनाया। किसानों की अच्छी खासी संख्या जुट गई। चूंकि यूपी सहित कई राज्यों का चुनाव सिर पर है, तो महज 24 घंटे में ही केंद्रीय कृषि मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर आगे आ गए और आंदोलनकारी किसानों से बड़े मन का परिचय देने की अपील की। बोले, जब पीएम साहब ने तीनों कृषि कानून वापस ले लिए हैं, तो किसान अपने घर लौट जाएं। जानकारों ने केंद्र के इस कदम को चुनावों से जोड़ा है। भाजपा इस वक्त चुनावी लपटों में उलझी है, तो वहीं किसान संगठन भी 'चुनावी' धुएं का सामना कर रहे हैं। संयुक्त किसान मोर्चा 'एसकेएम' में अब 'चुनाव' की बात खुलकर होने लगी है। यही वजह है कि एसकेएम ने केंद्र को सोचने, समझने और करने के लिए 144 घंटे दे दिए।

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पीएम हमारी चिट्ठी का जवाब दें, आंदोलन स्थगित है!

एसकेएम के वरिष्ठ सदस्य डॉ. दर्शनपाल कहते हैं, प्रधानमंत्री को जो चिट्ठी लिखी गई है, उसमें एमएसपी की कानूनी गारंटी देना, लखीमपुर खीरी की घटना के आरोपी केंद्रीय गृह राज्य मंत्री अजय मिश्रा 'टेनी' को बर्खास्त करना, आंदोलन के दौरान विभिन्न राज्यों में किसानों पर दर्ज पुलिस केस वापस हों और शहीद किसान परिवारों को मुआवजा देने जैसी कई मांग शामिल हैं। पीएम साहब ने अभी इन मागों पर कोई जवाब नहीं दिया है। केंद्र सरकार, चार दिसंबर तक उन्हें पूरा करे। आंदोलन, केवल स्थगित हुआ है, खत्म नहीं किया है। सरकार टेबल पर आकर बात करे। आगे के आंदोलन की दिशा कैसी होगी, इसकी घोषणा चार दिसंबर को करेंगे। अभी 29 नवंबर का संसद भवन ट्रैक्टर मार्च स्थगित कर दिया गया है।

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राकेश टिकैत का कहना है, अगर सरकार न्यूनतम समर्थन मूल्य पर कानून बनाने की मांग स्वीकार कर लेती है तो किसान घर जाएंगे। हां, इसके साथ ही केंद्र को संयुक्त किसान मोर्चे की दूसरी मांगें भी माननी होंगी, तभी दिल्ली के सीमाओं से वापसी करेंगे।

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केंद्र और किसानों के बीच क्यों है भरोसे की कच्ची डोर!

जय किसान आंदोलन के राष्ट्रीय अध्यक्ष अविक साहा कहते हैं, हम सरकार पर भरोसा कैसे कर लें। एक साल पहले क्या हुआ था। केंद्र की भाजपा सरकार ने तीन कृषि कानून बनाने से पहले क्या किसी किसान संगठन से पूछा था। किसानों से बातचीत के लिए क्या उन्हें न्योता भेजा गया था। उसके बाद बैठकों के ग्यारह दौर पूरे कर किसानों को आंदोलन आगे बढ़ाने के लिए मजबूर कर दिया गया। कोई एक बात ऐसी बताएं, जिससे किसान इस सरकार पर भरोसा कर लें। भरोसे की डोर कमजोर नहीं है, बल्कि टूट चुकी है।


बतौर अविक साहा, अब प्रधानमंत्री कह रहे हैं कि तीन कृषि वापस हो गए हैं तो ठीक है, जब संसद में ये कानून वापस होंगे तो किसान मान लेंगे। सब कुछ कागज पर होगा। सात सौ से अधिक किसान मारे गए। सरकार ने एक किसान की मौत पर सहानुभूति के दो शब्द तक नहीं कहे। लखीमपुर खीरी में किसानों को जीप से कुचल कर मार दिया गया। ऐसे में किस तरह इस सरकार पर भरोसा कर लें।

144 घंटे का अल्टीमेटम देने के पीछे यह है बड़ी वजह

संयुक्त किसान मोर्चे में शामिल सभी किसान संगठन भले ही तीन कृषि कानूनों पर एकमत रहे हों, लेकिन उनकी राजनीतिक महत्वाकांक्षा से इनकार नहीं किया जा सकता। गुरनाम सिंह चढूनी, बलबीर सिंह राजेवाल, राकेश टिकैत, डॉ. दर्शनपाल और योगेंद्र यादव, ये सब चुनावी राजनीति को देख चुके हैं। शुक्रवार को जो प्रेसवार्ता हुई है, उसमें राकेश टिकैत और योगेंद्र यादव नहीं थे। कई दूसरे नेता भी कहीं बाहर होने के कारण वहां नहीं पहुंच सके। गुरनाम सिंह चढूनी व बलबीर सिंह राजेवाल सहित कई दूसरे किसान नेता अपनी राजनीतिक पारी के बारे में सोचने लगे हैं। पंजाब से जुड़े अधिकांश किसान संगठनों के साथ, आम आदमी पार्टी संपर्क में हैं। किसान संगठन भी अब आंदोलन को लंबा खींचने के पक्ष में नहीं हैं। एमएसपी को लेकर मोर्चे में मतभेद जैसी खबरें चल निकलीं।

अब मोर्चे ने केंद्र सरकार को जो 144 घंटे का अल्टीमेटम दिया है, उस दौरान एसकेएम अपनी नई दिशा तय कर सकेगा। दूसरी तरफ केंद्र सरकार, चुनाव में फंसी है। उसे मालूम है कि किसानों को दोबारा से एक साल पहले वाली स्थिति में लाने का मतलब चुनाव में राजनीतिक नुकसान उठाना है। ऐसे में केंद्र सरकार भी इस मुद्दे को खत्म करना चाहती है। अगर किसान अड़ते हैं तो सरकार किसानों की बाकी बची मांगें मानने के प्रति सॉफ्ट कॉनर्र दिखाएगी।

'संयुक्त किसान मोर्चे' के नाम से नहीं लड़ेंगे चुनाव

एसकेएम के वरिष्ठ पदाधिकारी योगेंद्र यादव के अनुसार, ये पहले दिन से ही स्पष्ट मत रहा है कि मोर्चे के प्लैटफार्म पर राजनीति नहीं होगी। मोर्चे में अलग-अलग राजनीतिक विचारधारा के लोग हैं। संयुक्त किसान मोर्चे के नाम पर कोई चुनाव नहीं लड़ा जाएगा। एसकेएम ने केवल बंगाल के चुनाव में ये फैसला किया कि वहां भाजपा को हराना है। संयुक्त किसान मोर्चे ने वहां भी चुनाव नहीं लड़ा था। यादव ने कहा, 70 साल बाद किसान को एक राष्ट्रीय प्लैटफॉर्म मिला है, उसका इस्तेमाल चुनाव में करना, यह एक बहुत छोटा इस्तेमाल होगा। इस देश की राजनीति की धुरी किसान बने, यह इसका मकसद होना चाहिए।



वह जोर देकर कहते हैं, एसकेएम, चुनावी राजनीति का मंच नहीं बनेगा। कोई सदस्य अपनी पार्टी बनाए, चुनाव लड़े, इस पर मोर्चे को कोई एतराज नहीं है। बतौर यादव, इस सरकार की नीयत पर किसानों को शक तो है। ऐसा प्रयास होता है तो उसका जवाब देंगे। किसान आंदोलन के जरिए देश के किसान ने खोया आत्मसम्मान और एकता को वापस हासिल किया है। किसानों को अब अपनी ताकत का अहसास हो गया है।

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