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किसान आंदोलन: भाजपा को ‘दो लोगों’ की छवि खराब होने का डर, इसलिए नहीं सुन रहे किसानों की बात, दिमाग में है '2024'

Wed, 26 May 2021 04:32 PM IST
Harendra Chaudhary जितेंद्र भारद्वाज, अमर उजाला, नई दिल्ली
जितेंद्र भारद्वाज, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: Harendra Chaudhary Updated Wed, 26 May 2021 04:32 PM IST
सार

ऑल इंडिया किसान खेत मजदूर संगठन ने 26 मई को देशभर में 'काला दिवस' अभियान शुरू कर दिया है। किसानों, खेत मजदूरों तथा आंदोलन के समर्थक श्रमिकों, छात्रों, युवाओं व महिला संगठनों समेत नागरिकों ने अपने घरों, वाहनों तथा ट्रैक्टरों पर काले झंडे लगाए हैं। मोहल्लों तथा कॉलोनियों में प्रधानमंत्री के पुतले फूंके गए हैं...

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Farmers protest against farm laws completed six months, farmers burn effigy of Central government
प्रदर्शन करते किसान - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

किसान आंदोलन को छह माह पूरे हो गए हैं। आंदोलन की गूंज देश-विदेश तक पहुंच चुकी है। सरकार के साथ 11 दौर की बैठकें हुईं, मगर बात नहीं बनी। सुप्रीम कोर्ट का दखल हुआ, कमेटी बनी, लेकिन अभी तक अन्नदाता सड़क पर है। लालकिला परिसर में ट्रैक्टर घुस गए, राष्ट्रीय झंडे का अपमान और पुलिस के साथ झड़प, ऐसी कई निंदनीय घटनाएं भी आंदोलन में देखने को मिलीं। आंदोलन स्थलों पर अनेक किसान मारे गए। अब काला झंडा दिखाने और पुतला फूंकने की मुहिम शुरू हुई है। किसानों ने कहा, जब तक तीनों कृषि कानून रद्द नहीं होंगे, वे एक कदम भी पीछे नहीं हटेंगे।

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किसान आंदोलन को लेकर अखिल भारतीय किसान संघर्ष समन्वय समिति 'एआईकेएससीसी' के वरिष्ठ सदस्य अविक साहा कहते हैं, भाजपा के अधिकांश नेता चाहते हैं कि किसानों की बात सुनी जाए। कृषि कानूनों को रद्द कर देना चाहिए, लेकिन उन्हें डर है, कहीं प्रधानमंत्री की छवि खराब न हो जाए। सारी लड़ाई एक दो लोगों की 'छवि' पर आकर अटक गई है। बतौर साहा, इसे दूसरे शब्दों में 'अहं' भी बोल सकते हैं। नतीजा, केंद्र सरकार और भाजपाई चाहकर भी 60 करोड़ किसानों की बात नहीं सुन रहे, जबकि उनके दिमाग में '2024' है।

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भाजपाई चाहते हैं किसानों की बात समय रहते सुन ली जाए  

अविक साहा ने अमर उजाला डॉट कॉम के साथ इस मुद्दे पर विस्तृत बातचीत की है। उनका कहना है, किसान आंदोलन अब देश का सबसे बड़ा आंदोलन बन चुका है। खास बात ये है कि सत्ताधारी पार्टी के अधिकांश पदाधिकारी और मंत्री चाहते हैं कि किसानों की बात समय रहते सुन ली जाए। अन्यथा साठ करोड़ किसान, उनके परिवार के सदस्य, रिश्तेदार और जानकार, ये आंकड़ा '2024' के लोकसभा चुनाव में बहुत बड़ा हो जाएगा। पश्चिम बंगाल, जहां पर भाजपा ने बाजी लगा दी, लेकिन हाथ में हार ही आई। अगले साल उत्तर प्रदेश और पंजाब का चुनाव परिणाम, भाजपाई देख रहे हैं। केंद्र सरकार भी चाहती है कि मामला निपट जाए। अगर ऐसा नहीं है तो किसानों को क्यों 18 माह तक कृषि कानूनों को लागू न करने का प्रस्ताव दिया गया। सुप्रीम कोर्ट की कमेटी गठित हो, केंद्र सरकार ऐसा चाहती थी।

'अपमान' 'अहं' 'लांछन' से डरती है दुनिया की सबसे बड़ी राजनीतिक पार्टी ...

किसान नेता अविक साहा आगे कहते हैं, भाजपा में इस समय जो माहौल बना हुआ है, वहां नेताओं को केवल एक-दो लोगों की चिंता करना सिखाया जा रहा है। किसान आंदोलन और कोरोना संक्रमण से पार्टी की साख व भविष्य पर संशय के बादल मंडरा रहे हैं, लेकिन इसके बावजूद उन्हें केवल दो ही लोगों को देखना है। पार्टी सोचती है कि कानूनों को वापस लेने से उनकी छवि बिगड़ जाएगी। उनका अपमान हो सकता है। लांछन और अंह भी उनके दिमाग में चलता रहता है। साहा कहते हैं, आखिर ऐसी कौन सी पार्टी होगी जो सीधे तौर से साठ करोड़ किसानों को नाराज करने का जोखिम उठाएगी। भाजपा दुनिया की सबसे बड़ी राजनीतिक पार्टी है, लेकिन उसे अपने प्रधानमंत्री की छवि और उनका 'अहं' ध्यान में रखना है। यह उसकी इच्छा नहीं, बल्कि मजबूरी है। जिस रोज भाजपा नेताओं को अपनी ताकत का अहसास हो जाएगा, वे किसानों से बात करने के लिए दौड़े चले आएंगे।

भाजपा नेताओं के लिए हिम्मत दिखाने का वक्त है: साहा

सबसे बड़ी राजनीतिक पार्टी को 'मोदी-शाह' के चलते आज विरोध का सामना करना पड़ रहा है। बड़े-बड़े नेताओं को सार्वजनिक कार्यक्रमों में जाने से झिझक होने लगी है। वजह, वहां उन्हें काले झंडे दिखाए जाते हैं। यह विरोध आने वाले बुरे राजनीतिक वक्त का सिग्नल है। अगर वे उस नुकसान को झेलने के लिए तैयार हैं तो कृषि कानूनों पर बात न करें। यदि वे राजनीतिक चोट नहीं सहना चाहते हैं तो अपने नेताओं का विरोध कर किसानों से बात करने के लिए आगे आ जाएं। इससे न तो देश का नुकसान होगा और न ही पार्टी का। एक आदमी की जिद्द की खातिर, देश व पार्टी को हानि पहुंचाना, फायदे का सौदा नहीं कहा जा सकता। अगर भाजपा, किसानों की मांग नहीं मानती है तो उसे उत्तर प्रदेश और पंजाब के विधानसभा चुनाव के बाद 2024 के लोकसभा चुनाव में अपने नेताओं के अंह और जिद का खामियाजा भुगतना पड़ेगा। अविक साहा कहते हैं, अगर देश के मौजूदा राजनीतिक परिदृश्य को देखें तो हो सकता है कि आने वाले निकटवर्ती समय में भाजपा खुद ही ऐसे नेताओं से निजात पा ले। पार्टी के भीतर से ऐसी बहुत सी आवाजें बाहर निकलने के लिए बेताब हैं।

देश में 'काला दिवस' की शुरुआत हो चुकी है ...  

ऑल इंडिया किसान खेत मजदूर संगठन ने 26 मई को देशभर में 'काला दिवस' अभियान शुरू कर दिया है। किसानों, खेत मजदूरों तथा आंदोलन के समर्थक श्रमिकों, छात्रों, युवाओं व महिला संगठनों समेत नागरिकों ने अपने घरों, वाहनों तथा ट्रैक्टरों पर काले झंडे लगाए हैं। मोहल्लों तथा कॉलोनियों में प्रधानमंत्री के पुतले फूंके गए हैं। संगठन के राष्ट्रीय अध्यक्ष सत्यवान और महासचिव शंकर घोष ने बताया, भाजपा की मोदी सरकार द्वारा बनाए गए कृषि कानून किसानों को बर्बाद करने वाले हैं। मोदी सरकार की मंशा किसानों को उजाड़ कर सिर्फ कॉरपोरेट घरानों का खजाने भरने की है। नए कृषि कानूनों से प्राइवेट मंडियां स्थापित होंगी और इसके चलते सरकारी मंडिया बंद हो जाएंगी। नतीजा, सरकारी खरीद समाप्त होगी।

तब किसानों के साथ खुली लूट होगी और देश के गरीबों के लिए राशन प्रणाली भी खत्म हो जाएगी। यही नहीं, बिजली सेक्टर को प्राइवेट कंपनियों के हाथ में सौंप देने के कारण वह गरीब नागरिकों की पहुंच से बाहर हो जाएगी। लाखों नौकरियां देने वाले रेलवे, एयरपोर्ट, बैंक, बीमा, बीएसएनएल, बीपीएल व कोयला खानें आदि देश की आम जनता के धन से बने उद्योगों, कंपनियों तथा उद्यमों को कौड़ियों के मूल्य पर कॉरपोरेट घरानों के हाथों में बेचा जा रहा है। लागत से डेढ गुना रेट पर एमएसपी देने का झूठा वादा कर किसानों को छला गया है। कुंभ मेले तथा चुनावों में लाखों की भीड़ जुटाकर मोदी सरकार ने खुद कोरोना महामारी को फैलाया है, लेकिन अपने महा-अपराध का दोष उल्टे आंदोलनरत किसानों पर मंढ़ने की कुचेष्टा इस सरकार की रही है।

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