किसान आंदोलन पर खट्टर बोले- किसानों के पास कोई मुद्दा नहीं, कर रहे अपना नुकसान
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
देश का अन्नदाता कथित किसान विरोधी नीतियों के विरोध में सड़कों पर उतर आया है। शुक्रवार से शुरू हुआ आंदोलन के दूसरे दिन भी जारी है। कर्जमाफी और स्वामीनाथन आयोग की सिफारिशें लागू करने सहित 32 मांगों के समर्थन में राजस्थान, पंजाब, हरियाणा, महाराष्ट्र, मध्यप्रदेश और उत्तरप्रदेश में किसानों ने सड़कों पर दूध बहाया और सब्जियां फेंकीं। इसकी वजह से आने वाले दिनों में शहरों में दूध-सब्जी की कीमतों में तेजी आने की आशंका है।
वहीं, किसान आंदोलन पर हरियाणा के मनोहर लाल खट्टर ने बयान देकर इस मामले को और गहरा दिया है। उन्होंने कहा, 'हड़ताल से किसान अपना ही नुकसान कर रहे हैं। किसानों के पास कोई मुद्दा नहीं है। उनका मकसद, अनावश्यक ही मीडिया और लोगों का ध्यान अपनी ओर खींचना है। अगर वे अपने उत्पाद नहीं बेच रहे हैं तो इसमें उन्हीं का नुकसान है।'
#WATCH: Haryana CM Manohar Lal Khattar speaks on farmers' strike, says, 'they don't have any issues, they are just focusing on unnecessary things, not selling produce will bring losses to farmers.' (01.06.2018) pic.twitter.com/CFY7dzgj2g
विज्ञापन विज्ञापन— ANI (@ANI) June 2, 2018
उल्लेखनीय है कि राष्ट्रीय किसान संघ के बैनर तले 110 और किसान एकता मंच के बैनर तले 62 किसान संगठनों ने सरकारी नीतियों के विरोध में शुक्रवार को 1 से 10 जून तक ‘गांव बंद’ आंदोलन का ऐलान किया था। महासंघ के अनुसार, किसान सब्जियों के न्यूनतम मूल्य, खाद्यान्न के समर्थन मूल्य और किसानों के लिए न्यूनतम आय समेत कई मुद्दों को लेकर विरोध प्रदर्शन कर रहे हैं।
शुक्रवार को किसानों के आंदोलन के साथ बंद का असर 7 राज्यों में दिखा। हालांकि कोई हिंसक घटना होने की सूचना नहीं मिली। हालांकि कुछ ऐसे संगठन भी इसके पक्ष नहीं हैं। एआईकेएससीसी के वीएम सिंह ने कहा कि उनका संगठन बंद के पक्ष में नहीं है, क्योंकि इससे किसानों को सीधे तौर पर आर्थिक नुकसान होता है। कई अन्य संगठन भी हड़ताल को समर्थन नहीं दे रहे हैं। यूपी, दिल्ली समेत पूरे उत्तर भारत में हालात सामान्य हैं और महासंघ के आह्वान का कोई असर नहीं है।
दूसरी ओर, महाराष्ट्र और मध्य प्रदेश में राज्य सरकारों ने स्थिति की गंभीरता को देखते हुए शहरों में पुलिस की तैनाती कर दी गई। माना जा रहा है कि अगर 10 दिन तक किसानों का यह आंदोलन चलता है तो शहर में सब्जियों और खाद्य पदार्थ को लेकर संकट खड़ा हो सकता है। आंदोलन के दौरान किसानों ने कोई भी उत्पाद बाजार तक पहुंचाने से मना किया है, चाहे वह सब्जी हो दूध हो या फिर कुछ और। पुणे में किसानों ने खेडशिवापुर टोल प्लाजा पर 40 हजार लीटर दूध बहाया और सरकार के खिलाफ विरोध प्रदर्शन किया।
पंजाब में कई इलाकों में विरोध प्रदर्शन किया गया। फरीदकोट में किसानों ने सड़कों पर फल और सब्जियों को फेंककर विरोध जताया। जबकि होशियारपुर में किसानों का जबर्दस्त प्रदर्शन किया। सड़कों पर दूध के टैंकर खाली कर दिए और सब्जियां भी फेंकी। बरनाला में निषेधाज्ञा तोड़कर ट्रैक्टर-ट्रालियों में सवार होकर किसान डीसी कॉम्प्लेक्स पहुंचे। वहां किसानों की पुलिस मुलाजिमों से धक्कामुक्की हुई। पुलिस ने हल्का बल प्रयोग कर उन्हें खदेड़ दिया। हड़ताल के पहले दिन मंडी में खूब सब्जियां बिकीं। लुधियाना में रोजाना की तुलना में महज चालीस फीसदी ही सब्जियां मंडी में पहुंची। मुक्तसर में किसान आंदोलन फीका रहा।
मध्य प्रदेश में दिखा सर्वाधिक असर
उत्तर प्रदेश भी प्रभावित
किसान आंदोलन के पहले दिन उत्तर प्रदेश में भी असर देखने को मिला। आगरा में किसानों ने जमकर उत्पाद मचाया। उन्होंने अपने वाहनों की मुफ्त आवाजाही के लिए टोल बूथ पर कब्जा कर लिया और तोड़फोड़ की। मुरादाबाद में आंदोलनकारी किसानों ने गांवों से शहरों में दूध नहीं जाने दिया। सड़क पर सब्जियां फेंक दी। टमाटर रखकर प्रदर्शन किया। भारतीय किसान यूनियन के कार्यकर्ताओं ने अतरासी-अमरोहा मार्ग पर सुदनपुर में रोड जाम कर प्रदर्शन किया। किसानों का कहना है कि आज टमाटर खरीदने को कोई तैयार नहीं है। टमाटर की लागत कीमत भी नहीं मिल रही है। संभल के किसानों ने मुबारकपुर में गन्ना जलाया। गांव खिरनी में सड़क पर सब्जियां बिखेर दीं। मुरादाबाद केबिलारी में शहरों में दूध की आपूर्ति रोक दी और दूध फेंका। सब्जी फेंकी। मुरादाबाद में सब्जियों की आवक कम रही।
किसानों ने आरोप लगाया कि स्वामीनाथन आयोग के सिफारिशों के बारे तो सरकार बात ही नहीं कर रही है। वर्ष 2006 में आई सिफारिशों को 11 सितंबर, 2007 को ही तत्कालीन यूपीए सरकार ने स्वीकर किया था। उसके बाद एनडीए सरकार ने भी किसानों के सुधार की बात कही पर चुनावी जुमले की तर्ज पर छोड़ दिया गया। किसानों की मांग फसल की लागत का डेढ़ गुना लाभकारी मूल्य मुहैया कराने, कर्ज माफी, छोटे किसानों को तय आय मुहैया कराने, फल, दूध, सब्जी को समर्थन मूल्य के दायरे में लाकर डेढ़ गुना लाभकारी मूल्य दिए जाने की है।
10 जून को भारत बंद
किसानों के आंदोलन को देखते हुए सुरक्षा के कड़े प्रबंध किए गए हैं। किसान 1 से 10 जून तक के दिनों को अलग-अलग ढंग से विरोध करेंगे। 1 से 4 जून तक वे विरोध प्रदर्शन करेंगे। 5 जून को ‘धिक्कार दिवस’ मनाएंगे, 6-7 जून को ‘शहादत दिवस’ मनाया जाएगा, 8-9 जून को ‘असहयोग दिवस’ और 10 जून को भारत बंद का ऐलान किया गया है। राष्ट्रीय किसान संघ ने व्यापारी संगठनों से 10 जून के भारत बंद में शामिल होने की अपील की है।