मानसून सत्र में सरकार की टेंशन बढ़ाएंगे दो किसान विधेयक, 22 दलों का मिला साथ
18 जुलाई से शुरू होने वाला संसद का मानसून सत्र बेहद हंगामेदार रहने वाला है। किसान संगठनों से जुड़े दो सांसद 'किसान ऋण माफी' और 'एमएसपी' से जुड़े दो प्राइवेट मेंबर बिल पेश करने वाले हैं, जिन्हें अभी तक 22 राजनीतिक दलों का समर्थन मिल चुका है। वहीं भारतीय किसान यूनियन समेत गुजरात के किसान संगठन भी एमएसपी को लेकर लामबंद हैं और बड़ा आंदोलन छेड़ने की योजना बना रहे हैं।
मंडियों में एमएसपी से नीचे खरीद
स्वाभिमानी शेतकारी संगठन (एसएसएस) के नेता और लोकसभा सांसद राजू शेट्टी ने बताया कि किसान मोदी सरकार के न्यूनतन समर्थन मूल्य को छलावा बताया है। सरकार ने एमएसपी के तहत डेढ़ गुना ज्यादा कीमत देने का एलान किया है, लेकिन असलियत यह है कि सरकारी मंडियों में ही एमएसपी से नीचे खरीद हो रही है। शेट्टी ने कहा कि एमएस स्वामीनाथन के नेतृत्व में बने राष्ट्रीय किसान आयोग ने सी-2 पर पचास फीसद अधिक कीमत देने की सिफारिश की थी, जबकि सरकार ने ए-2 (एफएल) को आधार बनाया है।
संसद में लाएंगे दो प्राइवेट बिल
शेट्टी ने बताया कि आगामी 18 जुलाई से शुरू होने वाले मानसून सत्र में वे किसान मुक्ति विधेयक लाने वाले हैं। ये दोनों ही बिल प्राइवेट मेंबर बिल हैं, जिनमें से एक सीपीआई(एम), केरल से राज्यसभा सांसद केके रागेश का है। शेट्टी के मुताबिक "किसानों के पूर्ण कर्ज माफी अधिकार बिल-2018" और "किसानों की फसलों के लिए न्यूनतम समर्थन मूल्य" बिलों को मानसून सत्र में पेश किया जाएगा।
उन्होंने बताया कि किसान फसलों को एमएसपी से नीचे भाव में बेचने को मजबूर हैं। उन्होंने मांग की कि एमएसपी की कीमतें तय करने के लिए एक स्वतंत्र कमेटी बनाई जाए, और बाजार में एमएसपी से नीचे खरीदने वालों को अपराध की श्रेणी में लाया जाए। वहीं, शेट्टी ने पूर्ण कर्ज माफी विधेयक के बारे में बताते हुए कहा कि देश का किसान कर्ज के बोझ तले दबा हुआ है।
साहूकारों और बैंकों के कर्ज के कारण ही देश के किसान आत्महत्या करने पर मजबूर हो रहे हैं जबकि केंद्र सरकार को देश के किसानों की कोई चिंता नहीं है। उन्होंने कहा कि अगर सरकार इन विधेयकों को पास नहीं करती है, तो हम देश के हर गांव में मुहिम चलाएंगे और किसानों को अपने साथ लेकर आएंगे।
गुजरात के किसान संगठन खफा
वहीं गुजरात के किसान संगठन गुजरात के खेदुत समाज के अध्यक्ष जयेश पटेल का कहना है कि 2014 में मोदी ने किसानों से वादा किया था कि अगर वे सत्ता में आए तो किसानों को लागत का 50 फीसदी देंगे। लेकिन सरकार ने धोखा करते हुए अनुमानित बढ़ोतरी कर दी है।
उन्होंने कहा कि हमें सी2+ एफएल+50 फीसदी (लागत+फैमिली लेबर) के मुताबिक कीमतें दी जाएं। उन्होंने कहा कि गुजरात में मोटा धान का आज का बाजार भाव 2,100 प्रति क्विंटल है, जबकि सरकार का एमएसपी रेट 1750 रुपए प्रति क्विटंल है। वहीं गुजरात में 2010-11-12 में कपास का रेट 6 से 8 हजार रुपए क्विंटल था, जो अब 5310 रुपए हो गया है।
सरकार के पास दाल खरीद का बजट नहीं
जयेश के मुताबिक गुजरात में मूंगफली का इस साल उत्पादन 32 लाख क्विंटल हुआ है, सरकार ने उसे 900 रुपए एमएसपी का रेट देते हुए 500 करोड़ रुपए का बजट रखा है। उन्होंने सवाल किया कि 500 करोड़ रुपयों में मात्र 5-6 लाख क्विंटल की ही खरीद हो सकती है। ऐसे में किसानों को कम कीमत में बाजार में मंगूफली बेचनी पड़ेगी।
उन्होंने बताया कि आजतक सोयाबीन को एमएसपी रेट पर खरीदा ही नहीं गया, जबकि पहले सोयाबीन 5 हजार रुपए में बिक जाती थी, लेकिन अब 3 हजार में भी कोई लेने को तैयार नहीं है। कमोबेश यही हाल दालों का है और किसानों के घरों में दालों का स्टॉक पड़ा है, क्योंकि सरकार के पास खरीद का बजट ही नहीं है।
गुजरात में लोकसभा में आधी होंगी सीटें
उन्होंने कहा कि किसानों की समस्याओं को लेकर हम गुजरात के गांवों में जाने वाले हैं। सरकार किसानों को मात्र 8 घंटे ही बिजली दे रही है, यहां तक कि 31 मार्च के बाद सिंचाई का पानी किसानों की बजाय उद्योगों को दे दिया जाता है। उन्होंने कहा कि मोदी से किसान इतना नाराज है कि भाजपा को इसका असर आगामी लोकसभा चुनावों में देखने को मिल सकता है। जयेश के मुताबिक 2014 में भाजपा ने 26 सीटें जीती थीं, लेकिन किसानों की अनदेखी सरकार पर भारी पड़ सकती है और सरकार मात्र 13 सीटें ही इस बार निकाल पाएगी।
भारतीय किसान यूनियन भी शुरू करेगी पदयात्रा
वहीं भारतीय किसान यूनियन भी सरकार के एमएससपी के फॉर्मूले से सहमत नहीं है। भारतीय किसान यूनियन के राष्ट्रीय प्रवक्ता राकेश टिकैत ने बोला कि सरकार डिजिटल इंडिया से देश को जोड़ रही है, लेकिन किसानों की अनदेखी कर रही है। उन्होंने कहा कि सरकार ने अपनी घोषणाओं का पूर्ण रूप से अनुपालन नहीं किया।
उन्होंने कहा कि सरकार की किसान विरोधी नीतियों के खिलाफ 23 सितंबर को हरिद्वार के चौधरी महेन्द्र सिंह किसान घाट से पदय़ात्रा शुरू करने वाले हैं, जो 2 अक्टूबर को दिल्ली पहुंचेगी। उन्होंने एलान किया किसान आंदोलन ने प्रधानमंत्री के दिमाग में 'किसान' शब्द घुसा दिया है, और चुनावों तक 'किसान' शब्द सरकार की डिक्शनरी से बाहर नहीं आने देंगे।