Bharat Bandh: किसानों के भारत बंद को सरकारी कर्मियों का मिला साथ, 8वें वेतन आयोग और OPS से इंकार पर हैं नाराज
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संयुक्त किसान मोर्चा 'एसकेएम' की तरफ से 16 फरवरी को 'भारत बंद' का आह्वान किया गया है। एसकेएम के अधिकांश घटक दल, राष्ट्रव्यापी बंद में शामिल होंगे। अब किसानों के भारत बंद को सरकारी कर्मचारियों का साथ मिल गया है। केंद्र सरकार के पुरानी पेंशन बहाली और 8वें वेतन आयोग के गठन से इंकार करने से गुस्साए देशभर में लाखों की संख्या में सरकारी कर्मचारी, 16 फरवरी को राष्ट्रव्यापी हड़ताल पर रहेंगे। देश की 10 केंद्रीय ट्रेड यूनियन से जुड़े करोड़ों की संख्या में मजदूरों ने भी 16 फरवरी की राष्ट्रव्यापी हड़ताल का आह्वान किया है। अखिल भारतीय राज्य सरकारी कर्मचारी महासंघ के राष्ट्रीय अध्यक्ष सुभाष लांबा ने बताया, 16 फरवरी को हड़ताली कर्मचारी अपने-अपने कार्यालयों पर प्रदर्शन करने के उपरांत जिला मुख्यालयों के लिए कूच करेंगे।
बतौर सुभाष लांबा, संयुक्त किसान मोर्चा ने केंद्र सरकार की वादाखिलाफी के खिलाफ 16 फरवरी को ग्रामीण भारत बंद का एलान किया है। कर्मियों, मजदूरों व किसानों के आह्वान पर इस राष्ट्रव्यापी हड़ताल व भारत बंद से जनजीवन अस्त-व्यस्त होने की प्रबल संभावना है। लांबा ने कहा, उन्होंने पंजाब, चंडीगढ़, राजस्थान, तेलंगाना, आंध्र प्रदेश, उत्तर प्रदेश और पश्चिम बंगाल आदि राज्यों का दौरा किया है। यह हड़ताल एतिहासिक एवं अभूतपूर्व होगी। केंद्र एवं राज्य कर्मियों में सरकार के रवैए के खिलाफ भारी आक्रोश है। 16 फरवरी को जिला मुख्यालयों पर कर्मचारी, मजदूर व किसान संयुक्त रूप से रैलियों एवं प्रदर्शन करेंगे। केंद्र सरकार के पुरानी पेंशन बहाली व 8वें पे कमीशन के गठन से इंकार करने से कर्मियों में भारी आक्रोश है। केंद्र एवं राज्य कर्मचारी, उक्त मांग के लिए 8 दिसंबर, 2022 से निरंतर आंदोलन कर रहे हैं। इसके बावजूद केंद्र सरकार, कर्मचारियों की मांगों एवं आंदोलन की अनदेखी कर रही है।
लांबा ने बताया, सार्वजनिक क्षेत्र को मजबूत करने की बजाय सरकार, पीएसयू का निजीकरण कर रही है। सरकारी विभागों का डाउन साइजिंग कर रही है। केंद्र एवं राज्य सरकारों एवं पीएसयू में करीब एक करोड़ पद रिक्त हैं। बेरोजगारी चरम पर है, लेकिन सरकार इन पदों को नियमित भर्ती से भर कर बेरोजगारों को स्थाई रोजगार नहीं दे रही। स्वीकृत रिक्त पदों के विरुद्ध भी मामूली संख्या में आउटसोर्स, दैनिक वेतनभोगी, ठेका संविदा आधार पर कर्मियों को लगाया जा रहा है। जहां न तो समान काम, समान वेतन दिया जा रहा है और न ही सेवा सुरक्षा दी जा रही है। ट्रेड यूनियन एवं लोकतांत्रिक अधिकारों पर निरंतर हमले किए जा रहे हैं।
जम्मू-कश्मीर प्रशासन ने आदेश जारी कर धरने प्रदर्शन व हड़ताल पर प्रतिबंध लगा दिया है। केंद्र सरकार ने दर्जनों यूनियन एवं एसोसिएशन की मान्यता रद्द कर दी है। त्रिपुरा एवं पश्चिम बंगाल में कर्मचारियों एवं नेतृत्वकारी पदाधिकारियों का उत्पीड़न किया जा रहा है। बिना अपील दलील के कर्मचारियों की सेवा बर्खास्त करने वाले संविधान के अनुच्छेद 311(2) ए,बी,सी को निरस्त करने, 18 महीने के बकाया डीए-डीआर का भुगतान करने व आयकर छूट की सीमा बढ़ाने के लिए कर्मियों द्वारा आंदोलन किया जा रहा है। इसके अलावा महंगाई पर रोक लगाने, सार्वजनिक वितरण प्रणाली को मजबूत करने, लेबर कोड्स, नेशनल एजुकेशन पालिसी व बिजली अमेंडमेंट बिल को वापस लेने आदि मांगों को हड़ताल में प्रमुखता से उठाया जा रहा है।