किसान संसद: 500 संगठन, साझा झंडा तक नहीं, विचारधारा भी अलग, इसके बावजूद किसान 'एक' हैं
अविक साहा कहते हैं, ये राष्ट्रव्यापी आंदोलन है। ये बात सही है कि किसान आंदोलन का एक झंडा नहीं है, एक चिन्ह नहीं है। संगठन अलग हैं, लेकिन मकसद एक है। यही वह रामबाण है जो किसानों को 'एक' बनाए रखता है...
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किसान आंदोलन को शुरू हुए करीब आठ माह हो गए हैं। कभी तेज तो कभी धीमी चाल से ये आंदोलन आगे बढ़ रहा है। छह माह से किसानों का दिल्ली में प्रवेश बंद था। संसद सत्र के दौरान केंद्र ने 200 किसानों को जंतर-मंतर पर बैठने की इजाजत दे दी। देश के विभिन्न हिस्सों से किसान एवं उनके प्रतिनिधि जंतर-मंतर पर पहुंचने शुरू हो गए हैं। किसान आंदोलन में पांच सौ से अधिक संगठन शामिल हैं, मगर आज तक इनका अपना साझा झंडा या निशान तक नहीं है। सभी संगठनों या जत्थेबंदियों का अपना अलग झंडा है। अलग पहचान है, अलग विचारधारा है।
भले ही राकेश टिकैत आज आंदोलन का प्रमुख चेहरा बने हैं, लेकिन दूसरे संगठनों के आंदोलन स्थलों पर उनका नाम नहीं है। आंदोलन की सभी प्रेस रिलीज में टिकैत का नाम नहीं रहता। संयुक्त किसान मोर्चा, जो प्रेस बयान जारी करता है, उसमें राकेत टिकैत का नाम शामिल नहीं किया जाता। राकेश टिकैत के साथ जो झंडा रहता है, उस पर उनके भाई का फोटो रहता है। वह झंडा भारतीय किसान यूनियन का है। इतनी विविधताओं के बावजूद इन संगठनों ने 'किसान संसद' आयोजित कर दिखाई। संयुक्त किसान मोर्चा के वरिष्ठ सदस्य अविक साहा कहते हैं, संगठन अलग हैं, लेकिन मकसद एक है। यही वह रामबाण है जो किसानों को 'एक' बनाए रखता है।
किसान संगठनों को राजनीति तो करनी नहीं थी...
अविक साहा कहते हैं, ये राष्ट्रव्यापी आंदोलन है। ये बात सही है कि किसान आंदोलन का एक झंडा नहीं है, एक चिन्ह नहीं है। कुछ संगठन खास विचारधारा से बंधे हैं। कई दफा बयान भी अलग हो जाता है। किसान संगठनों के कई नेता सार्वजनिक मंच से ऐसी बात कह देते हैं, जिसका आंदोलन या इसकी मांगों से कोई मतलब नहीं होता। खुद राकेश टिकैत के बयान चर्चित रहे हैं। पिछले दिनों कुछ पदाधिकारी बोले, किसान संगठनों को चुनाव के लिए तैयार रहना चाहिए। एक सदस्य का निलंबन करना पड़ा। हालांकि संयुक्त किसान मोर्चे ने साफतौर पर कह दिया है कि कोई भी सदस्य अपनी बात रख सकता है। यह उसका निजी विचार माना जाएगा, मोर्चे का नहीं। अगर किसानों से जुड़ा कोई संगठन चुनाव लड़ने की बात करता है तो वह कर सकता है। लेकिन संयुक्त किसान मोर्चे के बैनर तले चुनाव लड़ने की बात नहीं होगी। इस साल 26 जनवरी की लालकिले की घटना के बाद कई किसान संगठन, इस आंदोलन से अलग हो गए थे।
टिकैत के साथ रहता है 'भारतीय किसान यूनियन' का झंडा
किसान आंदोलन का प्रमुख चेहरा बने राकेश टिकैत गुरुवार सुबह जब गाजीपुर बॉर्डर से निकले तो उनके साथ भाकियू के झंडे लहरा रहे थे। इन झंडों पर भाकियू का चिन्ह और उनके भाई नरेश टिकैत का फोटो रहता है। उनके पिता महेंद्र सिंह टिकैत उत्तर प्रदेश के लोकप्रिय किसान नेता रहे हैं। वे भाकियू के अध्यक्ष भी थे। दूसरी तरफ जब योगेंद्र यादव, किसान संसद में भाग लेने के लिए निकले तो उनके साथ जय किसान आंदोलन का झंडा था। लाल झंडा भी बखूबी दिखाई दे रहा था। किसानों की बस जब जंतर-मंतर के लिए रवाना हुई तो उसकी खिड़की से ये अलग-अलग झंडे दिखाए जा रहे थे। अविक साहा कहते हैं, यही तो किसान आंदोलन की खूबसूरती है। पांच सौ से अधिक संगठन हैं। इनमें केरल, उत्तर पूर्व के राज्य, तेलंगाना, महाराष्ट्र और कश्मीर तक के किसान संगठन या कमेटियां शामिल हैं। शुरू में यह बात कह दी गई थी कि भले ही कोई किसी भी विचारधारा से जुड़ा हो, लेकिन वह किसान हितों के लिए तीनों कृषि बिलों के खिलाफ सरकार से लड़ने का जज्बा रखता है तो उसका स्वागत है। किसान संगठनों के बीच कई बार मुद्दों पर असहमति रहती है तो बातचीत के जरिए उसका समाधान निकाल लिया जाता है।
किसान आंदोलन में इन संगठनों का रहा है अहम योगदान...
राकेश टिकैत, बलबीर सिंह राजेवाल, डॉ दर्शन पाल, गुरनाम सिंह चढूनी, हन्नान मोल्ला, जगजीत सिंह डल्लेवाल, जोगिंदर सिंह उगराहां, शिवकुमार शर्मा (कक्का जी), युद्धवीर सिंह और योगेंद्र यादव सहित अनेक दूसरे पदाधिकारी विभिन्न किसान संगठनों के साथ जुड़े हुए हैं। इन सभी पदाधिकारियों के अपने अपने संगठन हैं। किसान मजदूर संघर्ष कमेटी और अन्य जत्थेबंदियां भी इस आंदोलन में सक्रिय हैं। किसान शक्ति संघ के अध्यक्ष चौधरी पुष्पेंद्र सिंह, भारतीय किसान यूनियन एकता उगराहां, भारतीय किसान यूनियन क्रांतिकारी, किसान मजदूर संघर्ष कमेटी के सतनाम सिंह पन्नू, क्रांतिकारी किसान यूनियन के संस्थापक डॉक्टर दर्शन पाल, भारतीय किसान यूनियन लक्खोवाल के अध्यक्ष अजमेर सिंह लक्खोवाल, भारतीय किसान यूनियन सिद्धपुर के जगजीत सिंह दलेवाल, जम्हूरी किसान सभा के प्रेसिडेंट सतनाम सिंह अजनाला, महिला किसान अधिकार मंच की संस्थापक सदस्य कविता कुरुगंटी और राष्ट्रीय किसान महासंघ के राष्ट्रीय संयोजक शिवकुमार शर्मा उर्फ 'कक्का' जी प्रमुख हैं। अखिल भारतीय किसान खेत मजदूर संगठन के वरिष्ठ पदाधिकारी सत्यवान सहित अनेक छोड़े बड़े संगठन, इस आंदोलन को आगे बढ़ा रहे हैं। किसान संसद में भाग लेने के लिए बंगाल, ओडिशा, बिहार, उत्तर प्रदेश, पंजाब, राजस्थान, महाराष्ट्र, हरियाणा, दिल्ली, आंध्र प्रदेश, हिमाचल, तमिलनाडु और कर्नाटक राज्यों के किसान दिल्ली पहुंच रहे हैं।